Jaya Bachchan की इस्तेमाल की हुई साड़ी पहनी, बस स्टॉप पर बदले कपड़े... 'नरम गरम' की एक्ट्रेस का खुलासा
परेश रावल की पत्नी और एक्ट्रेस स्वरूप संपत (Swaroop Sampat) ने टीवी और बॉलीवुड में काम करने को लेकर अपना अनुभव साझा किया है।
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स्वरूप संपत ने करियर पर की बात। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम
HighLights
जया बच्चन की पहनी हुई साड़ी को एक्ट्रेस ने पहना
सेट पर कपड़े बदलने के लिए नहीं होते थे वैनिटी वैन
परेश रावल से शादी का कारण किया जाहिर
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। ये जो हैं जिंदगी जैसे धारावाहिक से घर-घर लोकप्रिय हुईं अभिनेत्री स्वरूप संपत (Swaroop Sampat) का थिएटर से पुराना नाता रहा है। इन दिनों अनुपम खेर के प्रोडक्शन हाउस में नाटक जाने पहचाने अनजाने में अपने अभिनय के लिए काफी सराहना बटोर रही हैं। अभिनेता परेश रावल (Paresh Rawal) की पत्नी स्वरूप शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रही हैं।
स्वरूप संपत से हुई खास बातचीत के अंश...
आपको थिएटर ज्यादा आकर्षित करता है फिल्में कम...
मैंने एक्टिंग से ब्रेक इसलिए लिया था क्योंकि बच्चे बड़े हो रहे थे, लेकिन मेरा अपना प्रोडक्शन तो चलता ही रहा, इसलिए ऐसा नहीं था कि सब कुछ रुक गया था। घर में इन विषयों पर हर समय चर्चा होती रहती है। अनुपम जी ने नाटक का प्रस्ताव दिया। ऐसा नहीं है कि मुझे फिल्में पसंद नहीं हैं।
दरअसल, मुझे ऐसे अवसर नहीं मिले जिनके बारे में मुझे लगे कि नहीं, यह तो मुझे हर हाल में करना ही चाहिए। सच कहूं तो, मैं शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत काम कर रही थी। इस नाटक में मेरे किरदार में भावनाओं और व्यक्तित्व के इतने अद्भुत आयाम हैं कि इसने मुझे यह भूमिका स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। आगामी दिनों में हम अपने नाटक के साथ अमेरिका के दौरे पर जा रहे हैं।
नाटक में आप बहुत जल्दी-जल्दी साड़ियां बदल लेती हैं। यह आसान नहीं होता...
(हंसते हुए) मैं आपको एक बात बताऊं? यह साड़ी सिली हुई (स्टिच्ड) साड़ी नहीं थी। मैं वास्तव में साड़ी को पारंपरिक तरीके से ही पहन रही थी। सच कहूं तो, मुझे अपने मॉडलिंग के दिनों की याद आ गई। जब मैं मिस इंडिया थी तो हमने एक फैशन शो किया था। उस समय संगीता बिजलानी, कल्पना अय्यर वगैरह थीं।
साड़ियां सिली हुई नहीं होती थीं। मेकअप से पहले साड़ी पहनकर तैयार होना होता था। बेशक, हर मॉडल के साथ एक सहायक रहता था पर यह सब मुझे मेरे युवावस्था के दिनों की याद दिला गया।
थिएटर ने आपको और परेश जी को भी मिलाया था। अगर आप दोनों आज पहली बार मिलते, तो क्या एक-दूसरे को उतना ही पसंद करते?
हां, मुझे लगता है कि ऐसा ही होता। जब आप सिर्फ ब्वायफ्रेंड-गर्लफ्रेंड की तरह रेस्त्रां में मिलते हैं, तब आप हमेशा अपने सबसे अच्छे रूप में होते हैं। लेकिन जब आप साथ में थिएटर करते हैं, तब आप तनाव में काम करते हैं, मुश्किल परिस्थितियों से गुजरते हैं और एक-दूसरे के दर्द और संघर्ष को भी देखते हैं। मुझे याद है, एक बार मंच पर मेरे घुटने पर जोर से चोट लगी लेकिन मैंने नाटक जारी रखा। इसी तरह एक बार नाटक के दौरान परेश जी को मंच पर ही वर्टिगो (चक्कर आने) का अटैक आ गया। तब उन्होंने कहा कि मैं यह दृश्य बैठकर करूंगा और फिर उन्होंने उसी तरह दृश्य पूरा किया।
जब आप साथ में नाटक करते हैं, यात्राएं करते हैं और जीवन के इतने सारे अनुभव साझा करते हैं, तब आप एक-दूसरे का अच्छा-बुरा, हर रूप देखते हैं। इसीलिए मुझे सचमुच लगता है कि हम एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। हम दो अजनबी लोग नहीं थे जो सीधे शादी कर रहे थे। हमने एक-दूसरे के कमजोर और कठिन पक्ष भी देखे थे, और उसके बावजूद हम शादी करना चाहते थे। मेरे ख्याल से यही सबसे बड़ी और सबसे सुंदर बात है।
परेश की किस खूबी कि आप कायल है ?
मैं हमेशा से एक बात से बहुत प्रभावित रही हूं वो है उनकी सादगी। उन्हें पद्मश्री, राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, सांसद बने इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचे, इसके बावजूद उनमें कभी कोई दिखावा नहीं आया। जब मैंने शिक्षण कार्य शुरू किया था। उन्होंने मुझसे कहा कि इसके लिए पैसे मत लो। हमारे पास बहुत है।
ऐसा करके उन्होंने मुझे और अधिक सशक्त बनाया क्योंकि उन्होंने मुझे अपने काम को पूरी स्वतंत्रता और समर्पण के साथ करने का अवसर दिया। मैं किसी संस्था या व्यक्ति के लिए वेतन पर काम नहीं कर रही थी। मैंने जो कुछ भी किया, पूरी तरह निःशुल्क किया। मुझे लगता है कि यह उनके द्वारा दिया गया सबसे बड़ा उपहार था।
अगर आपको शिक्षा मंत्री बना दिया जाए, तो आप शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव लाना चाहेंगी?
पहले मैं यह कहूंगी कि यह बहुत कठिन पद है, लेकिन अगर मुझे अवसर मिले, तो मैं कुछ ऐसी चीजों को वापस लाना चाहूंगी जो पहले भारत की शिक्षा परंपरा का हिस्सा थीं। भारत 2600 से अधिक अनूठी कलाओं और शिल्पों का देश है। हमारे यहां संस्कृति, कला और शिल्प को उतना महत्व नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए।
बिल्कुल, विज्ञान, गणित और अन्य विषय बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन संस्कृति भी एक इंसान के व्यक्तित्व का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक और चीज है जिसे मैं सौ प्रतिशत स्कूलों में शामिल करना चाहूंगी वह है आध्यात्मिकता (Spirituality)। मैं धर्म के बाहरी प्रदर्शन की बात नहीं कर रही, बल्कि उसके अध्ययन और समझ की बात कर रही हूं। हमें बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि महान व्यक्तित्वों से क्या सीखना है। उदाहरण के लिए जैसे श्रीराम या यीशु मसीह केवल आध्यात्मिक व्यक्तित्व नहीं थे, बल्कि अत्यंत सुसंस्कृत और मजबूत चरित्र वाले व्यक्ति भी थे, लेकिन हम बच्चों को यह पहलू नहीं सिखाते।
हम बच्चों को यह नहीं बताते कि शारीरिक शक्ति भी महत्वपूर्ण है। श्रीराम के बारे में वर्णन मिलता है कि उनके भुजाएं अत्यंत शक्तिशाली थीं, लेकिन हम उस बात को याद नहीं रखते। हम उन्हें पुरुषोत्तम के रूप में पढ़ाते हैं, लेकिन एक सशक्त, अनुशासित और सक्षम व्यक्ति के रूप में नहीं। मेरा मानना है कि बच्चों को बचपन से यह सीखना चाहिए कि शारीरिक रूप से मजबूत होना भी आवश्यक है। उन्हें व्यायाम करना चाहिए, खेलना चाहिए और अपने शरीर को मजबूत बनाना चाहिए।
फिल्म नरम गरम में ऋषिकेश मुखर्जी जी के साथ काम करने की क्या यादें हैं?
वह तो हमसे पूरा का पूरा दृश्य एक ही टेक में करवा लेते थे। जब हम कहते थे कि इतने सारे पन्नों का संवाद एक ही टेक में? तो वे कहते थे, तुम सब लोग थिएटर से हो कर लोगे। दरअसल, अमोल पालेकर, दीना पाठक, उत्तपल दत्त और मैं भी थिएटर से थी। सच कहूं तो हमें इसमें बहुत मजा आता था। सब लोग मेरा बहुत ध्यान रखते थे क्योंकि मैं नई थी। उस समय तो वैनिटी वैन जैसी सुविधाएं नहीं होती थीं। कर्नाला पक्षी अभयारण्य (महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले) में हमने बस स्टॉप पर कपड़े बदले थे। बस स्टॉप पर जो छोटा-सा शेड होता है? वहीं पर पर्दे लगाकर हम कपड़े बदलते थे।
एक बार तो हमने किसी के झोपड़ी में जाकर कपड़े बदले थे। आउटडोर शूटिंग तो अपने आप में एक बड़ी चुनौती हुआ करती थी। उस समय इतना ग्लैमर भी नहीं था। मैंने अभिमान फिल्म में जया बच्चन जी द्वारा पहनी गई साड़ियां ही नरम गरम में भी पहनी थीं। अगर आप ध्यान से देखें, तो एक चेक वाली साड़ी है सफेद रंग की, जिसमें काले और लाल चेक्स हैं। वही साड़ी मैंने पहनी थी। मुझे लगता है कि सिर्फ एक पीली साड़ी नई थी, जिसे मैंने गाने में पहना था। उसके अलावा लगभग सारी साड़ियां पुरानी थीं। उस समय सादगी ही सबसे बड़ी खूबसूरती हुआ करती थी।
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उस समय फिल्मों के कलाकार टीवी में कम काम करते थे। आपने ये जो है जिंदगी किया था...
सच कहूं तो हमने उस तरह से कभी सोचा ही नहीं। शुरुआत के तीन-चार एपिसोड तक तो इंडस्ट्री के बहुत-से लोग हमें थोड़ा कमतर समझते थे। वे कहते थे कि जिन्हें फिल्में नहीं मिलतीं, वही टीवी करते हैं, लेकिन चौथे एपिसोड के बाद हमारा शो हिट हो गया। उसके बाद तो हम सचमुच बड़े सितारे बन गए थे। हम किसी पार्टी में जाते थे तो लोग हमारे लिए रास्ता छोड़ देते थे। मुझे याद है, जितेंद्र जी और दूसरे बड़े कलाकार भी हमारे पास आकर मजाक में कहते थे तुम लोग क्या कर रहे हो? हमारी मार्केट तो नीचे जा रही है। मैं आज की युवा लड़कियों से मिलती हूं, जो कहती हैं हमने ये जो है जिंदगी देखा है।
यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। मुझे लगता है कि आजकल की सामग्री में एक समस्या है। अब बहुत ज्यादा असभ्य भाषा का इस्तेमाल होने लगा है। पहले शरद जोशी जी लिखा करते थे। उनकी भाषा कितनी सुसंस्कृत और प्रभावशाली होती थी। आज वह चीज बहुत कम दिखाई देती है।
आपने उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक और द व्हाइट टाइगर जैसी फिल्मों में अपेक्षाकृत छोटे रोल किए...
आदित्य धर (फिल्म के निर्देशक) को परेश बहुत अच्छी तरह जानते थे। वे अक्सर मिलते थे और लगातार उरी के बारे में बातें करते रहते थे। इसलिए जब आदित्य धर ने मुझे फिल्म का प्रस्ताव दिया, तो मैंने तुरंत हां कह दिया। वह कहने लगे मैम आपने तो अभी भूमिका भी नहीं सुनी। मैंने कहा कोई बात नहीं। मैं यह रोल करना चाहती हूं। द व्हाइट टाइगर बेटे आदित्य के कहने पर की। मेरे लिए भूमिका का आकार कभी मायने नहीं रखता। अगर किरदार अच्छा हो और उसमें कुछ कहने या दिखाने लायक हो, तो वह मेरे लिए पर्याप्त है।
