अनुप्रिया वर्मा, मुंबई। नंदिता दास अपनी फिल्म 'मंटो' को लेकर उत्साहित हैं। उनका कहना है कि इस कहानी को कहने में उन्हें छह साल लगे हैं, क्योंकि मंटो ने काफी कुछ लिखा है, रचा है। उसे तीन घंटों में दिखाना आसान नहीं है। रिसर्च के दौरान तो उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या चीजें लें और क्या चीजें छोड़ दें।

नंदिता ने इसी दौरान फेमिनिज्म पर बात करते हुए भी कहा कि वह ह्यूमेनिटेरियन बनने में यकीन करती हैं। वह तो चाहती हैं की पुरुषों के साथ भी दोस्त बन कर काम किया जाए। मेरा मानना है कि आपको ह्यूमेनिस्ट बन कर काम करना चाहिए। अगर मर्द सही है और औरत गलत तब तो मैं मर्द की ही तरफदारी करूंगी। लेकिन हमारे समाज में इतने हद तक असमानता है कि उसे समान दर्जा दिलाने के लिए धक्का मारना पड़ता है। उस आधार पर तो हर इंसान को फेमिनिस्ट होना चाहिए। ये सोशल इनजस्टिस का सवाल है। तो जब तक महिला पुरुष एक ना हो जाएं, तब तक तो हर इंसान को फेमिनिस्ट होना चाहिए और मैं इस बात के लिए हमेशा आगे रही हूं और आगे रहूंगी। नंदिता कहती हैं कि उनसे लगातार ये सवाल किए जा रहे हैं कि उन्होंने दस साल क्यों लगा दिए, फिर से एक फिल्म बनाने में। इस पर मेरा जवाब यह है कि मुझे कुछ भी साबित नहीं करना है। मुझे कहीं नहीं पहुंचना है। मैं मंजिल पर नहीं जर्नी पर विश्वास करती हूं और उसी रूप में आगे बढ़ना चाहती हूं। मुझे ये प्रूव नहीं करना है कि मैं एक अच्छी एक्ट्रेस हूं, वरना मैं रीजनल फिल्म क्यों करती, जिसको लोग तो देखते ही नहीं हैं। नंदिता कहती हैं कि उन्हें उनकी परवरिश का काफी असर रहा है। परिवार में उन्हें अपनी बात रखने का हक था। इसलिए वह कई बातें कह पाईं। नंदिता की फिल्म मंटो जल्द ही रिलीज होने वाली है। 

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नंदिता ने कहा था कि, मुझे खुशी है कि लड़कियों को मैं इंस्पायर करती हूं। उन लड़कियों को जो सिर्फ अपने रंग के कारण सोच बैठती हैं कि वह तो दुनिया में कदमताल करने के काबिल ही नहीं हैं। उन्हें नीचा दिखाया जाता है।वह कहती हैं कि मुझे याद है कि मैं अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के समारोह में बात कर रही थीं, वहां एक लड़की ने मुझसे सवाल किया कि मैं इस रंग की होने के बावजूद इतनी कॉन्फीडेंस कैसे दिखाती हूं। नंदिता कहती हैं कि मैं उस सवाल को सुन कर हिल गयी थी, कि कितनी लड़कियों का मनोबल सिर्फ उनके रंग के कारण ही टूट जाता होगा।वह सोचती होंगी कि वह काली हैं। 

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Posted By: Rahul soni