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'बिना दिमाग वाली फिल्में नहीं...', Mrunal Thakur के बेबाक बोल, बताया- क्यों लगता है बायोपिक से डर?

By priyanka singhEdited By: Rinki Tiwari
Published: Sun, 18 Oct 2026 07:00 AM (IST)

मृणाल ठाकुर ने बताया कि वह ऐसी फिल्में चुनती हैं जिनमें अभिनय का मौका मिले और जो मनोरंजन के साथ ...और पढ़ें

मृणाल ठाकुर को रिजेक्शन के बाद मिलीं बेहतरीन फिल्में। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम

मृणाल ठाकुर को रिजेक्शन के बाद मिलीं बेहतरीन फिल्में। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम

HighLights

  1. अभिनय का मौका देने वाली फिल्में चुनती हैं मृणाल ठाकुर

  2. करियर में रिजेक्शन से नहीं डरती हैं मृणाल ठाकुर

  3. बॉलीवुड की इन हीरोइनों से मृणाल को मिलती है प्रेरणा

प्रियंका सिंह, मुंबई। ऐसी फिल्में जिसमें कहने के लिए कुछ न हो या जिसमें परफॉर्मेंस का मौका न हो, उन फिल्मों से अभिनेत्री मृणाल ठाकुर (Mrunal Thakur) दूर ही रहना चाहती हैं। कई बड़ी हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों का हिस्सा रही मृणाल पिछले दिनों रिजेक्शन जैसे गंभीर मुद्दे पर बनी फिल्म 'पूजा मेरी जान' (Pooja Meri Jaan) में दिखीं।

8 साल पहले साइन की थी 'पूजा मेरी जान'

मृणाल कहती हैं कि यह फिल्म मैंने 'लव सोनिया' फिल्म के तुरंत बाद साइन की थी, यह पहली ऐसी फिल्म थी जिसे मैंने सामने से निर्माता से मांगा था। हालांकि, आज भले ही मैं एक मुकाम पर हूं, लेकिन यह विषय अगर आज भी आता, तो मैं ऐसे ही मांग कर उसमें काम करती। मैं कमर्शियल फिल्में भी करती हूं, सारे जॉनर को एक्सप्लोर करने का प्रयास करती हूं।

अभिनय का मौका ढूंढती हैं मृणाल ठाकुर

आज इतनी फिल्म करने के बाद चाहे 'सीता रमम' हो या 'सुपर 30' यह सब कमर्शियल फिल्में हैं, लेकिन उसमें एक भी बिना दिमाग वाली फिल्म नहीं हैं। मुझे ऐसी फिल्म चुननी हैं, जहां परफॉर्म करने का मौका मिले, चाहे वह फिल्म कमर्शियल हो या ना हो। मुझे मनोरंजन के साथ गंभीर मुद्दों वाली फिल्मों को भी बैलेंस करना है। ऐसा भी नही होना चाहिए कि मैं तो केवल गंभीर किस्म की ही फिल्में करती हूं और लोगों को थिएटर में रुलाती हूं।

Mrunal Thakur Pooja Meri Jaan

इन हीरोइनों से लेती हैं प्रेरणा

मुझे इसलिए तब्बू मैम बेस्ट लगती हैं, वह मेरी प्रेरणा रही हैं। जिस तरह की फिल्में वह या विद्या (बालन) मैम, बेबो (करीना कपूर) चुनती हैं, वह मनोरंजन के साथ सामाजिक विषयों के बीच संतुलन बनाते हुए परफॉर्म करती हैं। मुझे वह रास्ता लेना है। मैं श्रीदेवी (Sridevi) मैम को भी फॉलो करती हूं। ऐसी प्रासंगिक मुद्दों वाली फिल्मों का हिस्सा बनते रहना  हैं, जिससे लोग जागरुक रहें कि समाज में क्या हो रहा है और उन गलत चीजों को ठीक करके कैसे बुराई पर अच्छाई की जीत हो।

बायोपिक से डरती हैं मृणाल

क्या इनमें से मृणाल किसी अभिनेत्री की जिंदगानी को पर्दे पर जीना चाहेंगी? इस पर वह कहती हैं कि मैं बायोपिक से थोड़ा डरती हूं। मैंने जो आखिरी बायोपिक देखी थी, वह माइकल थी, जो गायक माइकल जैक्सन (Michael Jackson) की जिंदगी पर आधारित थी। मुझे लगता है कि फिल्म में अगर सही कास्टिंग न हो, तो फिल्म सपाट लगेगी। जिनका भी मैंने नाम लिया है, वह सब बड़ी अभिनेत्रियां हैं, मैं उनकी जगह पर फिट होने की कोशिश नहीं करूंगी।

मैं चाहती हूं कि किसी फिल्मकार को अगर लगता है कि मैं किसी के रोल में फिट हो सकती हूं या बायोपिक कर सकती हूं, तो वह तय करें। मैं ऐसी बायोपिक का हिस्सा नहीं बनना चाहती हूं, जहां मुझे दर्शकों को यकीन करवाने में समय लग जाए कि मैं वह पात्र हूं, जिस पर बायोपिक बनी है। अगर आप उस व्यक्ति के जैसे नहीं लग रहे हैं, तो अच्छा होगा कि उसे वह रोल मिले जो उसके हकदार हैं।

रिजेक्शन से नहीं घबराती हैं मृणाल

फिल्म में रिजेक्शन को संभालने की बात की गई है। खुद अपने करियर में रिजेक्शन को मृणाल ने कैसे संभाला है? इसे लेकर वह कहती हैं कि कलाकार क्यों रिजेक्ट होते हैं? वो इसलिए रिजेक्ट होते हैं, क्योंकि रोल के लिए फिट नहीं होते हैं। मैं जब-जब रिजेक्ट हुई है, तब-तब अच्छी फिल्में मिलीं। जब रिजेक्ट हुई, तो 'लव सोनिया' मिली, जब रिजेक्ट हुई, तो 'सीता रमम' मिली, जो चीज मेरे लिए लिखी नहीं गई है, उसके पीछे भागकर क्या फायदा।

Mrunal Thakur Photos

मैंने अपने दिमाग में सेट कर लिया था कि एक ही निर्माता या निर्देशक या प्रोडक्शन हाउस नहीं है, जो फिल्में बना रहे हैं। कई निर्माता-निर्देशक हैं, जो फिल्म बना रहे हैं, हो सकता है वो बड़ी न हो, छोटी फिल्में हो, लेकिन बना तो रहे हैं ना। एक दरवाजा बंद होगा, तो बाकी दूसरे दरवाजे भी खुलेंगे, तो बस आपको धैर्य रखने की जरूरत है।

गंभीर मुद्दों की फिल्मों पर बोलीं मृणाल

गंभीर मुद्दों पर बनी फिल्में चुनने वाली मृणाल आगे कलाकारों के संवेदनशील होने पर कहती हैं कि कलाकार संवेदनशील होते हैं, लेकिन कई बार वह कुछ कह जाते हैं, तो उसे बढ़ा-चढ़ाकर लिखा दिया जाता है। इस कारण वह कुछ भी कहने से पहले सोचते हैं।

पिछले दिनों मैंने एक पॉडकास्ट में कुछ कहा था, मैं ईमानदारी से जवाब दे रही थी, लेकिन फिर उसे घुमाकर हेडलाइन बना दिया गया है। मैंने कहा था कि मैं अपनी मां की अलमारी से घड़ियां लेकर पहनती हूं, तो उसे लिख दिया गया कि मैं उनकी अलमारी से चुराकर घड़ियां पहनती हूं।

जब ये सब पढ़ती हूं, तो लगता है कि ये सब तो मैंने कहा ही नहीं था। अब डरती हूं, कुछ भी कहने या बताने से। मैं चाहती हूं मेरा काम बोले। ऐसी फिल्में भी चुनती हूं, जहां समाधान भी बताया जाए। अपने काम के लिए जाने जाना चाहती हूं। आज इंटरनेट और फोन बच्चों के पास भी है। ऐसे में चाहे कोई भी हो, उन्हें शब्दों का चयन सही से करना चाहिए।

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