कभी मिला नेशनल अवॉर्ड, ऑस्कर में नॉमिनेट हुई थी फिल्म; अब ऑटो रिक्शा चलाकर 150 रुपए में पाल रहा परिवार
38 साल पहले एक ऐसी फिल्म आई थी, जिसने ऑस्कर तक सफलता का परचम लहराया था। हालांकि, आज उस फिल्म का लीड एक्टर रिक्शा चलाने को मजबूर हो गया है।

आज गुमनामी में जी रहा है नेशनल अवॉर्ड विजेता एक्टर/ फोटो- Instagram

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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। 38 साल पहले इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसे चाइल्ड एक्टर ने कदम रखा था, जिसने अपनी एक्टिंग के बलबूते पर सिर्फ इंडिया में ही नहीं, बल्कि इंटरनेशनल मंच पहचान बनाई थी। मुंबई के सड़कों पर रहने वाले इस बच्चे पर एक दिन कास्टिंग डायरेक्टर की नजर पड़ी और उन्होंने उसे फिल्म का लीड एक्टर बना दिया।
मूवी ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिजनेस किया और साथ ही कई अवॉर्ड्स भी जीते। हालांकि, इस चकाचौंध के बीच बच्चे को ये नहीं पता था कि किस्मत ने उसकी जिंदगी में कुछ और ही लिखा है। कौन है वह एक्टर जिसे मिला राष्ट्रपति से नेशनल अवॉर्ड, लेकिन आज वह ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पालने को हुआ मजबूर, पढ़ें उनकी कहानी।
मुंबई की सड़कों पर रह रहे 20 बच्चों में से बना था एक्टर
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिस अभिनेता का जिक्र हम अपने इस लेख में कर रहे हैं, वह कोई और नहीं, बल्कि अभिनेता शफीक सैयद हैं, जो साल 1980 में बिना टिकट के घर से भागकर मुंबई आए थे, सिर्फ यह देखने के लिए कि यह शहर हिंदी फिल्मों की तरह सच में दिखता है या नहीं। बचपन में मुंबई आने के बाद उन्होंने चर्चगेट स्टेशन के पास 20 बच्चों के साथ ही सड़क पर अपना घर बना लिया।
इन बच्चों पर एक दिन एक महिला की नजर पड़ी, जिन्होंने शफीक के साथ-साथ 19 और बच्चों को एक्टिंग वर्कशॉप ज्वाइन करने के लिए कहा। एक तरफ जहां सभी को यह स्कैम लगा, तो वहीं शफीक जिनके पास वैसे भी खोने को कुछ नहीं था, उन्होंने हामी भर दी। बच्चों से सड़क पर अचानक टकराने वाली और शफीक की किस्मत बदलने वाली कोई और नहीं, बल्कि मीरा नायर थीं, जिन्होंने 1988 में रिलीज हुई फिल्म 'सलाम बॉम्बे' में शफीक को बतौर मेन लीड कास्ट किया।

उस साल की सबसे हिट फिल्मों में थी सलाम बॉम्बे
'सलाम बॉम्बे' जब सिनेमाघरों में आई, तो मूवी को समीक्षकों और दर्शकों दोनों से बहुत ही अच्छा रिस्पांस मिला। यहां तक कि 1989 में मूवी को बेस्ट 'फॉरेन लैंग्वेज कैटेगरी' में ऑस्कर के लिए नॉमिनेशन भी मिला था। शफीक को फिल्म में अपने अभिनय के लिए न सिर्फ सराहना मिली, बल्कि 1989 में भारत के राष्ट्रपति के हाथों उन्हें उनकी एक्टिंग के लिए 'नेशनल फिल्म अवॉर्ड' से भी सम्मानित किया गया।
'सलाम बॉम्बे' को मिलने वाली सराहना और 52 दिनों की शूटिंग के लिए तकरीबन 15 हजार की फीस मिलने से शफीक काफी खुश थे और उन्हें यह उम्मीद थी कि मूवी के हिट होने के बाद उनके लिए बॉलीवुड के दरवाजे खुलेंगे और वह ज्यादा काम करेंगे। हालांकि, शफीक सैयद का ये सपना जल्द ही टूट गया।

'दो बार सुसाइड करने की कोशिश की'
'सलाम बॉम्बे' की रिलीज के चार साल के बाद उन्हें फिल्म 'पतंग' में काम मिला, लेकिन धीरे-धीरे वह भी बंद हो गया, जिस तरफ भी वह जाते, उन्हें रिजेक्शन ही मिलता। शफीक मुंबई में सबकुछ छोड़कर अपने शहर बेंगलुरु आ गए। एक्टिंग का सपना छोड़कर शफीक ने रिक्शा ड्राइवर की जॉब शुरू की। उन्होंने अपने एक पुराने इंटरव्यू में ये बताया था कि वह अब ऑटो रिक्शा चलाते हैं और उनका पूरा परिवार उन्हीं पर आश्रित है। ऑटो चलाकर वह हर दिन 150 रुपए के आसपास की कमाई करते हैं। दो बार तंग आकर उन्होंने सुसाइड की कोशिश भी की, लेकिन वह बच गए।

शफीक ने पुराने इंटरव्यू में यह भी खुलासा किया था कि जब सलाम बॉम्बे रिलीज हुई थी, उस दौरान वह हर न्यूजपेपर में थे। हालांकि, जब मेकर्स इंटरनेशनल अवॉर्ड्स के लिए गए, तो उन्हें किसी ने फोन तक नहीं किया। उन्होंने मुंबई के कई स्टूडियो के चक्कर काटे, लेकिन किसी ने उन्हें काम नहीं दिया। आपको बता दें कि शफीक सैयद 'सलाम बॉम्बे' और 'पतंग' के अलावा 2015 में रिलीज कन्नड़ फिल्म 'केयर ऑफ फुटपाथ 2' में दिखाई दिए थे, जिसमें उन्होंने कोकोनट वेंडर की भूमिका अदा की थी।
