'घूसखोर पंडत' टाइटल विवाद पर खुलकर बोले मनोज बाजपेयी और नीरज पांडे, कहा -'सीख क्या ही होती है...'
मनोज बाजपेयी की फिल्म 'गजब रात' आज नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुकी है। हाल ही में अभिनेता और डायरेक्टर ने ...और पढ़ें

मनोज बाजपेयी और नीरज पांडे से बातचीत/फोटो- इंस्टाग्राम
HighLights
मनोज बाजपेयी- नीरज पांडे 'गजब रात' के लिए फिर साथ
घूसखोर पंडत शीर्षक विवाद पर खुलकर की चर्चा
व्यक्तिगत ब्रांडिंग से अधिक कहानी को महत्व दिया
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। अय्यारी’ के करीब आठ साल बाद अभिनेता मनोज बाजपेयी और निर्माता-निर्देशक नीरज पांडेय की जोड़ी एक बार फिर साथ लौटी है, इस बार फिल्म ‘गजब रात’ के साथ। नेटफ्लिक्स (Netflix) पर रिलीज हो रही इस फिल्म ने अपने पुराने शीर्षक ‘घूसखोर पंडत’ को लेकर खासा विवाद भी खड़ा किया। दोनों ने हाल ही में फिल्म के बारे में खास बातचीत की।
स्पेशल 26 आप दोनों की एकसाथ पहली फिल्म थी। आप दोनों को पहली मुलाकात याद है?
नीरज : अभी अहसास हुआ उसमें भी आप (मनोज) कर्नाट प्लेस (दिल्ली) में भाग रहे थे, इसमें भी आप यहां पर भाग रहे हैं।
मनोज : स्पेशल 26 में मजा तो बहुत आया था। पटकथा मैंने पढ़ी हुई थी, मुझे लगा कि रोल बीस दिन के आसपास चलेगा। मैं सेट पर गया तो पता चला 8-9 दिन, में काम खत्म कर दिया। मैंने कहा रोल है ना मेरा? खैर,तो इन लोगों की यूनिट क्लॉकवर्क के तरीके से काम करती है यानी बिल्कुल नियमित होके काम करते हैं और कॉल टाइम जितने बजे का होता है, उसके आधा घंटे के भीतर काम भी शुरू हो जाता है। फिल्म ए वेडनेस डे देखने के बाद मैंने इन्हें फोन किया था। मैंने इनसे कहा भी था कि कोई रोल हो तो बताइए। फिर स्पेशल 26 की स्क्रिप्ट आ गई थी मेरे घर पर। वहां से हमारे साथ आने की शुरुआत हुई।
नीरज : शूट के बाद मैंने इनसे पूछा था कि आपने जो सीन्स स्क्रिप्ट में पढ़े थे सब शूट हुए कि नहीं? बोले हां तो हो गया। बस बात खत्म। अममून ये होता है कि आप जब कई कलाकारों के साथ काम कर रहे हैं तो आपका दिन में एक-दो सीन निकल जाता है फिर बाकी लोगों का होता है,लेकिन जब इनका काम था तो सिर्फ इनका ही काम था,उस दिन और किसी का नहीं था।

फिल्म का शीर्षक पहले घूसखोर पंडत था जिस पर काफी विवाद हुआ था। उस प्रकरण से क्या सीख रही...
मनोज : सीख क्या ही होती है आप हमेशा एक नई –नई गलतियां तो करते रहते हैं जिंदगी में, लेकिन अंत में सच्चाई ये है कि फिल्म आपने दर्शकों के लिए बनाई है और उसमें से किसी वर्ग को लगता है, लोगों को आपत्ति है।
नीरज: आप सिर्फ कहानी के बारे में न सोचें जब आप शीर्षक के बारे में सोच रहे होते हैं। वो हमारा ट्रेलर भी नहीं था, वो मात्र घोषणा थी तो जाहिर-सी बात है, यह उन चीजों में से एक है, जहां आपको संवाद के मामले में बहुत सावधान रहना पड़ता है, ताकि किसी भी मोड़ पर कोई गलतफहमी न हो।
फिल्म सत्या में सारे पात्र ग्रे थे लेकिन उनकी स्वीकृति थी। वहां पर नायक को बदलना नहीं पड़ा। अब सिनेमा में वो आजादी नहीं है....
मनोज : मैं ऐसी कोई फिल्म नहीं करता हूं जिसमें, उस तरह की आजादी की कमी का अहसास हो और दूसरा ये है कि अगर मुझे भरोसा हैं कि ये कहानी कहनी है, या मैं इसका हिस्सा होना चाहता हूं, तो आज तक कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं इसका हिस्सा नहीं हो सकता। सत्या आज से करीब 28 साल पहले बनी थी, और मुझे पक्का यकीन है कि सत्या को आप आज भी बना सकते हो। शूल को भी बना सकते हो।

अंत में तो यही है ना कि अच्छाई की बुराई पर जीत होती है। इसमें मुझे लगता नहीं कि किसी को कोई दिक्कत होनी चाहिए लेकिन जैसा कि नीरज जी ने कहा, समय, हर समय एक जैसा रहता नहीं है। दुनिया में बहुत सारे बदलाव हो रहे होते हैं। उस दौरान में लोग बहुत ज्यादा संवदेनशील होते हैं तो उन चीजों का अगर सम्मान करते हैं, तो उसके साथ चलते रहिए। क्योंकि आखिरकार मुझे दर्शक तक पहुंचना है। अगर मैं समझौता नहीं कर रहा हूं और पहुंच जा रहा हूं तो क्या दिक्कत है।
वास्तविक लोकेशन पर शूट करना अभिनय में कितना मदद करता है?
मनोज : लोकेशन के मामले में ये (नीरज) हर जगह घूमते हैं, लेकिन उसमें मैं जरूर नहीं होता हूं। लेकिन मुझे ज्यादा याद भी नहीं कि मैंने बहुत ज्यादा इधर-उधर घूम के शूटिंग की है। हिंदुस्तान में बहुत घूमा हूं। जब आप जगह पर होते हो तो एक मिथक का चक्कर नहीं होता है जगह को ले करके। कई बार हमने शूटिंग मुंबई में की है, लेकिन वो वास्तव में दृश्य दिल्ली का है। तो वहां पर आपको लोगों को भी भरोसा दिलाना है कि दिल्ली का है और खुद को भी कि ये मैं जिस जगह प्रवेश कर रहा हूं, ये दिल्ली में है।
ये शुरुआती कुछ घंटे की बात होती है, बाकी फिर आप कर लेते हैं। लेकिन जब आप वास्तविक लोकेशन में होते हैं, वास्तविक चिल्लमचिल्ली हो रही होती है, लोगों को सामने से हटा रहे होते हैं, वही गलियां, वही लोग आपके सामने से जा रहे होते हैं, ऐसा लगता है सब कहानी का हिस्सा हैं।
नीरज - बहुत जरूरी है, कि आप जहां की बात कर रहे हैं, लोग भी उस जगह को देखें। कहानीकार के रूप में ज्यादा सहज महसूस करता हूं। कुछ चीजें जो होती हैं सिर्फ परफार्मेंस के आधार पर नहीं कम्युनिकेट करते हैं आप। आप विजुअल के जरिए भी बताते हैं।

आजकल कलाकारों की ब्राडिंग और कलाकारों के मार्केटिंग पर ज्यादा फोकस करने की चर्चा हो रही है...
मनोज : नीरज जी कहानी को ज्यादा अहमियत देते हैं, और कहानी ब्रांड होती है। मेरा भी मानना है कि अगर आप काम को लेकर आगे बढ़ें, तो आपकी अपनी ब्राडिंग काम के कारण होती है। आपके कारण आपकी काम की ब्रांडिंग नहीं हो सकती। इस मामले में मेरा दो सौ प्रतिशत विश्वास है मेरा। काम से बड़ा मैं नहीं। तो काम अगर बड़ा है, काम अच्छा है, तो वो मेरे लिए बहुत बेहतर है। बतौर कलाकार मुझे काम ही आगे लेके जा सकता है। मैं काम को आगे नहीं लेके जा सकता।
कभी आप दोनों ने कभी किसी को घूस दी या किसी ने आपसे घूस मांगी?
नीरज : मुझसे से तो आज तक किसी ने घूस नहीं मांगी।
मनोज : (हंसते हुए मेरे से तो आज तक नीरज की ओर देखते हुए) यह कहें चेहरा ही कुछ ऐसा है… कई बार, ये होता है कि लोग कहते हैं कि आप मत जाइए, कि उसके मन में जो है, वो आपसे नहीं कह पाएगा तो आपका काम रुक जाएगा। मैं कहता हूं कि मेरा काम है तो मैं ही जाऊंगा, आप क्यों जाएंगे मेरा काम करने के लिए? पर आज तक हमारा काम तो रुका नहीं है।
फिल्म में एक संवाद है कि जहां हम काम करते हैं, वहां पर चार दोस्त बनते हैं, आठ दुश्मन बनते हैं। तो इस इंडस्ट्री में दोस्त ज्यादा बनते हैं या कंप्टीशन ज्यादा रहता है?
कंप्टीशन की बात आप सोचते नहीं हो। मैंने बिल्कुल नहीं सोचा है अपने जीवन में। और ये भी कभी नहीं सोचा है कि सिर्फ मैं ही हूं। आप ज्यादा अच्छे से अच्छे डायरेक्टर्स की कहानियां का हिस्सा होना चाहते हो वो संघर्ष मेरा है। तो उसके लिए जितनी कोशिश हो सकती है, हम करते हैं। दूसरा दुश्मन की बात है ना, किसी भी पेशे में कोई भी दुश्मनी स्थायी नहीं होती है क्योंकि वो काम की वजह से दुश्मनी हुई है और काम की वजह से ही वो खत्म भी हो जाती है।

जहां तक बात है दोस्ती जी, तो हमारा कोई और जगह नहीं है जहां हम जा करके लोगों से मिलते हैं तो जो दोस्तियां भी होंगी, वो यहीं पर आपकी बनेंगी और ये आपके ऊपर है कि उस दोस्ती को आप आगे लेके जा रहे हो, सिर्फ काम के लिए लेके जा रहे हो या एक व्यक्ति से मिले हो जिससे आपको मिलना ज्यादा पसंद है। कई बार आपको काम को अलग करके भी चलना पड़ता है। ये सारा चुनाव आपका होता है। मेरा क्या है कि मैं दोस्तों के साथ उम्मीद नहीं रखता हूं, मैं जिद करता हूं। मैं नीरज पांड़े को तंग करूंगा कि जल्दी से कहानी सोचिए। अरे मेरे साथ काम क्यों नहीं कर रहे। वो जिद हो सकती है अपेक्षा नहीं हो सकती। अपेक्षा है तो फिर संबंध नहीं।
नीरज : बिल्कुल आपकी जिद का आपका अधिकार है, मतलब उम्मीद आप बिल्कुल रखिए।
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