जलते रावण के सामने Madhuri ने किया था 'असली राक्षसों' का दहन, रोंगटे खड़े करता है 30 साल पुरानी फिल्म का क्लाइमैक्स
Madhuri Dixit की 30 साल पुरानी फिल्म में दिखाया विजयादशमी का ये सीन आज भी दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है।
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रोंगटे खड़े करने वाला है माधुरी दीक्षित की फिल्म का ये सीन
HighLights
रोंगटे खड़े करने वाला है माधुरी दीक्षित की फिल्म का ये सीन
30 साल पुरानी फिल्म का सीन आज भी है प्रभावशाली
माधुरी दीक्षित और ऋषि कपूर ने निभाया था लीड किरदार
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। बॉलीवुड में हमारे त्यौहारों और धार्मिक कहानियों पर बनी फिल्मों की कमी नहीं है। वहीं दर्शकों को यह फिल्में पसंद भी आती हैं क्योंकि इनसे एक अलग जुड़ाव महसूस होता है।
30 साल पुरानी माधुरी की फिल्म
ऐसी ही एक बहुचर्चित फिल्म थी वर्ष 1996 में आई 'प्रेम ग्रंथ', जिसमें बॉलीवुड की 'धक-धक गर्ल' माधुरी दीक्षित (Madhuri Dixit) और दिवंगत अभिनेता ऋषि कपूर (Rishi Kapoor) ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
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राजीव कपूर के निर्देशन में बनी यह फिल्म न केवल एक लव स्टोरी थी, बल्कि इसमें सामाजिक कुरीतियों, जातिगत भेदभाव और 'अधर्म पर धर्म' की विजय का एक अच्छा संदेश दिया गया था।
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क्या है फिल्म की कहानी?
'प्रेम ग्रंथ' (Prem Granth) की कहानी एक सीधी-साधी लड़की'कजरी' (माधुरी दीक्षित) के इर्द-गिर्द घूमती है। कजरी को गांव के ही एक ऊंची जाति के लड़के सोमनाथ (ऋषि कपूर) से प्यार हो जाता है। कजरी के जीवन में तब अंधेरा छा जाता है जब गांव का एक पावरफुल व्यक्ति ठाकुर उसके साथ दुष्कर्म करता है।
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इस घिनौने अपराध के बाद कजरी का जीवन बिखर जाता है। समाज जो पीड़ितों को सहारा देने के बजाय उन्हें ही दोषी ठहराता है, कजरी के साथ भी वही कठोर रवैया अपनाता है। लेकिन कजरी हार मानने के बजाय अपने सम्मान और न्याय के लिए खड़े होने का फैसला करती है।
रोंगटे खड़े करने वाला है क्लाईमैक्स
फिल्म का क्लाइमैक्स भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली सीन्स में से एक है। फिल्म का आखिरी सीन विजयादशमी यानी दशहरे के त्यौहार के पृष्ठभूमि में फिल्माया गया है।
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जहां एक तरफ रामलीला के मैदान में विशालकाय रावण के पुतले का दहन हो रहा होता है, वहीं दूसरी तरफ कजरी और सोमनाथ अपने जीवन के 'असली रावण' (अत्याचारी खलनायक) का अंत करते हैं।
जलते हुए रावण के पुतले के सामने विलेन का अंत दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। यह सीन सीधे तौर पर यह संदेश देता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, आखिरकार जीत सत्य और धर्म की ही होती है।
आज के संदर्भ में फिल्म की प्रासंगिकता
'प्रेम ग्रंथ' केवल 90 के दशक की एक कमर्शियल फिल्म नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक बुराइयों पर एक सीधा प्रहार थी। जिस तरह से फिल्म के क्लाईमैक्स में दशहरे और रावण दहन के साथ पाप के अंत को दिखाया गया है वह दर्शकों के दिलों को छू गया। सालों बाद भी यह सीन हिंदी सिनेमा के सबसे पावरफुल सीन्स में से एक है।
