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पर्दे पर उतारा आदिवासियों का जीवन, ऋत्विक घटक के सिनेमाई सफर की रोचक कहानी

By Sanjay KrishnaEdited By: Ashish Rajendra
Published: Sun, 01 Nov 2026 04:19 PM (IST)

जल्द ही सिनेमा के महान कलाकार ऋत्विक कुमार घटक की 100वीं जयंती मनाई जाएगी। इस पर उनके करियर के सफर को विस्तार से समझते हैं।

ऋत्विक घटक का सुनहरा सफर (फोटो क्रेडिट- फेसबुक)

ऋत्विक घटक का सुनहरा सफर (फोटो क्रेडिट- फेसबुक)

HighLights

  1. ऋत्विक घटक के जन्मशताब्दी वर्ष पर आलेख

  2. आदिवासियों की कहानी के बने थे सूत्रधार

  3. सत्यजीत रे की तरह कमाया था नाम

संजय कृष्ण, रांची: आदिवासी जीवन को करीब से देखने वाले उस फिल्मकार ने करियर की शुरुआत की थी उन पर आधारित वृत्तचित्रों से और जीवन भर फिल्मों में दिखाई अभाव, विस्थापन और उत्पीड़न के चक्रव्यूह में फंसे जीवन की कुछ वैसी ही छवियां। ऋत्विक घटक के जन्मशताब्दी वर्ष पर आलेख...

ऋत्विक घटक: जिन्होंने पर्दे पर उतारा आदिवासियों का जीवन

भारतीय फिल्मकारों में ऋत्विक कुमार घटक एक अलग और विशिष्ट स्थान रखते हैं। बांग्ला सिनेमा की प्रसिद्ध त्रयी में वे सत्यजित रे और मृणाल सेन के साथ गिने जाते हैं। 1955 में जब सत्यजित रे की पहली फिल्म 'पाथेर पांचाली' पर्दे पर आई, तब ऋत्विक घटक तत्कालीन बिहार के सुदूरवर्ती इलाके (वर्तमान झारखंड) में आदिवासियों के बीच काम कर रहे थे। कोलकाता से उनका यहाँ आना अचानक नहीं हुआ था।

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ritwik kumar ghatak (1)

बिहार सरकार का जनसंपर्क विभाग अपने दक्षिणी इलाके 'छोटानागपुर' में रहने वाले आदिवासियों के जीवन, संस्कृति और मेलों से दुनिया को परिचित कराना चाहता था। इस समृद्ध विरासत को सहेजने के लिए सरकार ने वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) निर्माण का निर्णय लिया था।

वृत्तचित्र निर्माण और शुरुआती जुड़ाव

उस समय राधाकृष्ण बिहार सरकार की पत्रिका 'आदिवासी' के संपादक थे। उन्हें सिनेमा की अच्छी समझ थी और मुंबई व कोलकाता में फिल्म लेखन से जुड़े रहने के कारण सरकार ने इस काम के लिए उनका चयन किया। राधाकृष्ण के संपर्क में आए ऋत्विक घटक उस समय युवा, होनहार और काम के प्रति बेहद समर्पित थे। बिहार सरकार ने वृत्तचित्र निर्माण के लिए कोलकाता के अरोरा स्टूडियो से करार किया था।

ritwik kumar ghatak

राधाकृष्ण के लेखन के आधार पर ऋत्विक घटक ने तीन प्रमुख वृत्तचित्र बनाए: 'आदिवासियों का जीवन स्रोत', 'उरांव' और 'बिहार के पर्यटन स्थल'। इनमें से 'आदिवासियों का जीवन स्रोत' ही आज उपलब्ध है।

आदिवासी संस्कृति का गहरा अनुभव

जब ऋत्विक घटक का आदिवासी जन-जीवन से परिचय हुआ, तब उनकी उम्र 30 वर्ष थी। उन्होंने आदिवासियों के इतिहास, संस्कृति, सौंदर्य बोध, सरल जीवनशैली और अभावों के बीच भी आनंद से जीने की प्रवृत्ति को बहुत गहराई से अनुभव किया। उनके इस दृष्टिकोण को उनके लेख 'अबाउट उरांव' में भी समझा जा सकता है।

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15 मिनट की डॉक्यूमेंट्री 'आदिवासियों का जीवन स्रोत' में आदिवासियों का पूरा जीवन, मेले, विवाह, नृत्य, शिकार का उत्सव, करमा पूजा, पड़हा व्यवस्था, घर-मकान और झरने सब कुछ समेटा गया है। पार्श्व में बजता नगाड़ा, बांसुरी की कोमल धुन और मांदर-ढोल का संगीत इस वृत्तचित्र को जीवंत बनाता है। ऋत्विक घटक का मानना था कि वृत्तचित्र बनाने के लिए लोगों के प्रति गहरा प्रेम होना जरूरी है, क्योंकि वृत्तचित्र मानव जीवन के सच्चे दस्तावेज होते हैं।

विस्थापन का दर्द और फिल्मों में वापसी

ऋत्विक घटक ने भले ही आजीविका के लिए वृत्तचित्र बनाए हों, लेकिन छोटानागपुर के प्रति उनका जुड़ाव उनकी बाद की फिल्मों में भी साफ दिखा। 1957 में उन्होंने 'उरांव' का निर्देशन किया, जिसे उनकी प्रसिद्ध फिल्म 'अजांत्रिक' की शुरुआती कृति माना जाता है। इसकी शूटिंग 1955 में छोटानागपुर में हुई थी और इसके कुछ फुटेज 'अजांत्रिक' में भी इस्तेमाल किए गए।

रांची में शूटिंग के दौरान उनका उरांव और मुंडा समुदाय से गहरा रिश्ता बन गया था। इस समुदाय के बार-बार विस्थापित होने के इतिहास ने ऋत्विक को अंदर तक प्रभावित किया। वे विस्थापन के साथ विभाजन के दर्द को महसूस कर रहे थे, जो उनकी फिल्मों में बार-बार लौटकर आया।

रांची से लिखा ऐतिहासिक पत्र

22 फरवरी 1955 को ऋत्विक घटक ने रांची से अपनी भावी पत्नी सुरमा को एक पत्र लिखा था, जो उनके इस जुड़ाव को दर्शाता है। उन्होंने लिखा:

"पिछले कुछ दिनों से मैं रांची में पूरे उत्साह के साथ काम कर रहा हूं। पर क्या खुशी है, कैसे बताऊं? पूरा दिन उनके बीच बिता रहा हूं, उनकी मिट्टी का स्वाद ले रहा हूं, उनके गीतों की मधुर धुनें और उनके नृत्यों की मादक लय, उत्पीड़ित जीवन में जीने की उनकी तड़प। मैं इस हकीकत का बस एक टुकड़ा ही अपने साथ ले जा सकता हूं, लेकिन इससे मुझे पक्का यकीन हो गया है कि मैं लोगों को समझा सकता हूं। मैं फिर से वापस आना चाहता हूं, और भी बड़ी, ज्यादा यथार्थवादी और व्यापक फिल्में बनाने के लिए।"

'अजांत्रिक' और मुख्यधारा का सिनेमा

बाद में जब ऋत्विक घटक ने अपनी पहली व्यावसायिक बांग्ला फिल्म 'अजांत्रिक' (1958) बनाई, तो वे फिर से शूटिंग के लिए रांची और उसके आसपास के इलाकों में लौटे। इस फिल्म की सबसे खास बात यह थी कि पहली बार भारतीय बड़े पर्दे पर आदिवासी समाज को इतने यथार्थवादी ढंग से दिखाया गया, जिससे मुख्यधारा के दर्शक उस दौर के आदिवासी जीवन और उनकी सामूहिक संरचना को समझ सके।

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