एक्टिंग के 30 साल और 'जीरो' स्ट्रगल! इस वजह से 'अस्सी' के एक्टर Kumud Mishra नहीं भागते हैं फिल्मों के पीछे
रंगमंच के मंझे कलाकार जब स्क्रीन पर चमकते हैं, तब अभिनय की रंगत ही कुछ और होती है। कुछ ऐसे ...और पढ़ें

30 साल के करियर पर बोले कुमुद मिश्रा। फोटो क्रेडिट- एक्स

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स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। अभिनेता कुमुद मिश्रा (Kumud Mishra) ने अभिनय जगत में अपने तीस सालों का लंबा और समृद्ध सफर तय कर लिया है। थिएटर से शुरू हुई उनकी यह यात्रा आज फिल्मों और टेलीविजन तक फैली हुई है, जहां वे हर किरदार में अपनी सादगी, गहराई और ईमानदार अभिनय से अलग पहचान बना चुके हैं।
हाल ही में रिलीज फिल्म 'वध 2' में जेलर की भूमिका के जरिए उन्होंने एक बार फिर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। फिल्मों में उनकी शुरुआत श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म 'सरदारी बेगम' (Sardari Begum) से हुई थी। इसके बाद करीब 11 सालों के ब्रेक के बाद वे फिल्मों में दिखाई दिए।
फिल्मों के लिए कुमुद मिश्रा ने नहीं किया संघर्ष
फिल्मों में काम पाने के संघर्ष को लेकर वह कहते हैं, "संघर्ष तो बिल्कुल नहीं था। मैं थिएटर में सक्रिय था और जीविका चलाने के लिए टेलीविजन में काम कर रहा था। मैं बहुत महत्वाकांक्षी नहीं हूं। शायद यह भी एक कारण रहा होगा कि फिल्मों की ओर तेजी से बढ़ने की कोशिश नहीं की। मेरी ज्यादा दिलचस्पी थिएटर में रही तो मैं उसे लगाातार करता रहा। उन सालों में टेलीविजन ने आर्थिक स्थिरता दी, जिससे बिना ज्यादा दबाव के अपना मनपसंद काम कर सका।"
आज के लेखकों पर कुमुद मिश्रा की राय
आज के फिल्म उद्योग में सकारात्मक बदलावों पर बात करते हुए अस्सी एक्टर कुमुद मिश्रा विशेष रूप से नए लेखकों और निर्देशकों की भूमिका को रेखांकित करते हैं। उनके अनुसार नई पीढ़ी के स्क्रिप्ट राइटर बेहतरीन और जटिल किरदार गढ़ रहे हैं, जो कलाकारों के लिए चुनौतीपूर्ण और रोचक दोनों होते हैं। वह 'वध 2' के लेखक और निर्देशक जसपाल सिंह संधू जैसे रचनाकारों का उदाहरण देते हैं जो सूक्ष्मता और गहराई के साथ पात्र रच रहे हैं।
कुमुद मिश्रा का मानना है कि पिछले कुछ सालों में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि अब किसी फिल्म या सीरीज में छोटे किरदार भी बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं। अगर स्क्रिप्ट मजबूत है तो हर भूमिका कहानी को आगे बढ़ाने में अहम होती है। दर्शक अब बेहद सजग हैं। वे हर किरदार पर ध्यान देते हैं। इसलिए कलाकार के लिए कोई भी भूमिका छोटी नहीं रह जाती, उसे पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी से निभाना पड़ता है।
किताब और थिएटर से खुद को रिचार्ज करते हैं कुमुद
लगातार विविध भूमिकाओं में नजर आने वाले कुमुद खुद को कैसे ‘रीचार्ज’ करते हैं? जवाब में वह कहते हैं, "सबसे पहले एक अच्छी स्क्रिप्ट ही कलाकार को ऊर्जा देती है। इसके अलावा किताबें सबसे बड़ी साथी हैं। पढ़ना न केवल बौद्धिक विस्तार का माध्यम है बल्कि अभिनय को भी नई दृष्टि देता है। इसके अलावा थिएटर भी लगातार ऊर्जा देता है। इन दिनों मैं एक नए नाटक विभूति रचनावली की तैयारी में जुटा हूं, जिसे अभिषेक मजूमदार ने लिखा और निर्देशित किया है।
इस नाटक में मेरे साथ संदीप शिखर भी अभिनय करेंगे। संदीप कमाल के कलाकार हैं और बैंगलोर में रहते हैं। यह एक व्यक्ति की आत्मखोज की यात्रा पर आधारित कथा है, जो रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के आश्रम से जुड़ती है। ऐसे विषय कलाकार को भीतर से झकझोरते हैं और नई संवेदनशीलता प्रदान करते हैं।
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बाइक राइड करने के शौकीन हैं कुमुद
कुमुद को बाइक से भी यात्राओं का शौक है। यह भी उन्हें रीचार्ज करता है। वह कहते हैं कि मुझे बाइक यात्राओं का खासा शौक है। मैं अपने दो-तीन मित्रों के साथ अक्सर 15-20 दिनों की लंबी यात्राओं पर निकल जाता हूं। लेह-लद्दाख से लेकर राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश तक कई यात्राएं कर चुका हूं।
दक्षिण भारत में मुंबई से केरल और कन्याकुमारी तक की यात्रा भी की है। भारत जितना विशाल है, उतना ही अद्भुत भी, एक ही जगह पर बार-बार जाने पर भी हर बार कुछ नया देखने-समझने को मिल जाता है।
चुनौतीपूर्ण रहा था कुमुद मिश्रा का ये किरदार
फिल्म 'राम सिंह चार्ली' के बाद केंद्रीय भूमिकाओं के प्रस्तावों पर वह कहते हैं कि मेरे पास एक दिलचस्प फिल्म 'नजरअंदाज' आई थी, जिसमें भूमिका चुनौतीपूर्ण थी, हालांकि फिल्म दर्शकों तक अपेक्षित तरीके से नहीं पहुंच पाई। कलाकार का काम है अपने हिस्से की भूमिका को पूरी क्षमता और ईमानदारी से निभाना। मेरे लिए किसी भूमिका को बेहतर तरीके से निभा पाना ही सबसे अहम उपलब्धि है।
