मुशायरों के बेताज बादशाह, KL Saigal का एक कल्ट गीत लिखकर पाई सफलता; फिर क्यों खुमार बाराबंकवी ने छोड़ा बॉलीवुड?
एक रोमांटिक टर्न ने खुमार बाराबंकवी (Khumar Barabankvi) को पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर कर दिया और उन्हें देश का सबसे नामचीन शायर और गीतकार बना दिया।

एक कल्ट गीत से मशहूर हुए खुमार बाराबंकवी
HighLights
सिनेमा को कल्ट गीत से नवाजने वाले खुमार बाराबंकवी
खुमार के गजल में मिलता था जिंदगी का गहरा फलसफा
खुमार बाराबंकवी ने छोड़ी दी थी फिल्म इंडस्ट्री
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में स्थित रुदौली से निकला 'मुशायरा का एक बेताज बादशाह' जिसने भारतीय सिनेमा को दिल छू लेने वाले गजल-गीत दिए। हम बात कर रहे हैं 1919 में जन्मे खुमार बाराबंकवी (Khumar Barabankvi) की।
बाराबंकी से निकले खुमार बाराबंकवी कैसे भारतीय सिनेमा की शान बने, उनकी दास्तां बड़ी दिलचस्प है। पहले उन्होंने शेरो-शायरी लिखीं, फिर एक कल्ट गीत ने उन्हें सिनेमा में सफल गीतकार बना दिया। इस लेख में हम आपको खुमार बाराबंकवी के बारे में बताने जा रहे हैं...
परिवार से सीखी शेरो-शायरी
खुमार बाराबंकवी जिनका असली नाम मोहम्मद हैदर खान था। बचपन से ही शेरो-शायरी लिखने वाले खुमार के रग-रग में कविताएं-शायरी बसी हुई थी और इसकी वजह उनका परिवार था। पिता से लेकर चाचा और भाई तक... हर कोई कविता-शायरी और शेर लिखा करता था। ऐसे में खुमार के सिर शायरी का खुमार कैसे न चढ़ता।

पढ़ाई छोड़ शायरी में डूबे खुमार
मगर कभी किसी ने नहीं सोचा था कि खुमार बाराबंकवी कभी बाराबंकी से निकलकर देश-विदेश में 'मुशायरा के बादशाह' बन जाएंगे। उनके बोल गीत बन जाएंगे। यह सब हुआ एक रोमांटिक टर्न के बाद। कहा जाता है कि लखनऊ में एक रोमांटिक टर्न ने उन्हें पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर कर दिया और वह टूटकर शायरी लिखने लगे। हालांकि, खुमार की लव लाइफ को लेकर ज्यादा जानकारी नहीं है।
खुमार बाराबंकवी-
एक पल में एक सदी का मजा हम से पूछिए
दो दिन की जिंदगी का मजा हम से पूछिए...
गजल में छलकती निजी भावनाएं
खुमार बाराबंकवी शास्त्रीय गजल लिखा करते थे। उनका मानना था कि यह शास्त्रीय गजल उनकी भावनाओं और घटनाओं को जाहिर करने के लिए सबसे सही है। इसलिए उन्होंने गजल लिखना शुरू कर दिया जो बाद में सिनेमा की शान बन गई।
पहले कल्ट गीत से मशहूर हुए खुमार
1945 में खुमार बाराबंकवी एक मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए मुंबई आए थे और यहीं उनका सफर फिल्मों में शुरू हुआ। जब ए.आर. कारदार ने मुशायरे में खुमार बाराबंकवी की कविताएं सुनीं तो वह उनके मुरीद हो गए। उन्होंने तुरंत उनसे अपनी फिल्म 'शाहजहां' के लिए एक गीत लिखने के लिए कह दिया।
खुमार बाराबंकवी-
वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में जमाने लगे हैं...
'शाहजहां' फिल्म का गीत 'चाह बर्बाद करेगी' (Chaah Barbaad Karegi Song) लिखा। इसके बाद उन्होंने इसी फिल्म के लिए 'ऐ दिल-ए-बेकरार' (Ae Dil-E-Beqarar) भी लिखा। दोनों ही गाने सुपरहिट हो गए। इन गीतों को केएल सहगल (KL Saigal) ने गाया था।

खुमार बाराबंकवी के लिखे गीत
इसके बाद खुमार ने 'साज और आवाज', 'लव एंड गॉड', 'हलचल', 'रुखसाना' और 'मेहंदी' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे। उनका आखिरी गीत 1986 में आई फिल्म 'लव एंड गॉड' के लिए था। इसके बाद उन्होंने फिल्मों के लिए गीत और गजल लिखना छोड़ दिया।
खुमार बाराबंकवी-
हाल-ए-गम उनको सुनाते जाइए
शर्त ये है मुस्कराते जाइए...
क्यों सिनेमा से बनाई थी दूरी?
कहा जाता है कि वह फिल्मों में शायरी का गिरता स्तर देखकर परेशान हो गए थे। बाद में उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली। उन्हें मुशायरों में शामिल होना ज्यादा पसंद था। इसलिए उन्होंने 20 साल तक बॉलीवुड के लिए गीत नहीं लिखे। मगर 1986 में नौशाद के कहने पर उन्होंने 'लव एंड गॉड' के लिए आखिरी बार गाने लिखे और फिर फिल्म इंडस्ट्री हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दी।
20 फरवरी 1999 को 80 की उम्र में बाराबंकी में खुमार बाराबंकवी का निधन हो गया था।
