रांची, [प्रदीप सिंह]। Lok Sabha Election 2019 - राजनीति और क्रिकेट में गजब का सामंजस्य है। कौन कब हिट हो जाए और कौन कब हिट विकेट, यह कहना मुश्किल है। तभी तो दिल्ली, दरभंगा से होते हुए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर कीर्ति झा आजाद जब धनबाद की पॉलिटिकल पिच पर उतरे तो पहला क्रिकेट विश्वकप देश के नाम करने वाली टीम में शामिल इस धुरंधर को यह समझ में नहीं आ रहा कि आखिर कैसे बल्ला घुमाएं।

सामने राजनीति के धुरंधर पशुपतिनाथ सिंह हैट्रिक मारने को बेताब हैं। मोदी लहर में उनके समक्ष ज्यादा चुनौती भी नहीं दिखती। उधर सिंह मेंशन की राजनीतिक पिच भी फिरकी ले रही है। कोयले की राजधानी में इस घराने का प्रभाव कम कर नहीं आंका जा सकता। लिहाजा हाई प्रोफाइल कीर्ति झा आजाद का मैच धनबाद के सियासी समर में उलझा हुआ नजर आता है।

हालांकि मंगलवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का सफल रोड शो इन्हें ताकत दे रहा है लेकिन उसकी काट में बुधवार को भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को उतार दिया। इससे हिसाब-किताब बराबर हो गया है। सबकुछ फिक्स है सर। कोई रोक नहीं पाएगा मोदी को। हमलोग को सांसद से क्या लेनादेना है। देश में लहर है मोदीजी की। हमलोग उन्हें देख रहे हैं। धनसार के वीरेंद्र प्रसाद बेफ्रिकी से कहते हैं। कोई नहीं टक्कर में।

कोई फैक्टर भी काम नहीं कर पाएगा। हमलोग तो दिल्ली देख रहे हैं। मन बना लिया है कि फिर से मोदीजी को प्रधानमंत्री बनाना है। सबकुछ इस लहर में उड़ जाएगा। उनकी बात को थोड़ा बहुत काटते हैं प्रमोद। वे कहते हैं- आपलोग एक साइड देख रहे हैं। कौनो लहर-उहर नहीं है। खाली हवा-पानी दे रहा है लोग। सब पता चल जाएगा, जरा रिजल्टवा आने दीजिए। देखिएगा, कौन कहां जाता है। हमलोगों को अपने काम से मतलब है। लेकिन रोजगार करना मुश्किल हो गया है।

सिंह मेंशन का दम

कोयले की राजधानी धनबाद के सियासी गणित पर सिंह मेंशन का प्रभाव रहा है। खासकर झरिया, निरसा और धनबाद का शहरी क्षेत्र। संजीव सिंह झरिया से भाजपा के विधायक हैं। वे फिलहाल मुकदमे में उलझकर जेल की सलाखों के भीतर हैं। उनके भाई सिद्धार्थ गौतम ने चुनाव में ताल ठोक दी है।

उनकी मां और झरिया की पूर्व विधायक कुंती सिंह उनका साथ दे रही हैं लेकिन भाभी ने भाजपा का समर्थन किया है। इस परिवार से जुड़े लोगों का प्रभाव भी चुनाव में असर दिखाएगा। गौतम, पीएन सिंह और कीर्ति झा आजाद की लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

चुनावी तपिश में बुझ रही झरिया की आग

धनबाद का नाम लेते ही सबसे पहले जेहन में उभरता है झरिया। नीचे धरती में कोयले के अकूत भंडार में लगी आग और उसको चुनौती देता मानव। झरिया मेन मार्केट में वेल्डिंग की दुकान चलाने वाले मो. मुन्ना के आंखों में दहशत घटना के चार साल बाद भी कायम है। एक टीले की ओर इशारा करते हुए मुन्ना बताते हैं- मेरे भैया बबलू खान और भतीजा रहीम सुबह सात बजे वहीं खड़े थे।

एकाएक जोरदार आवाज के साथ जमीन फटी और दोनों समा गए उसमें। मैं चिल्लाता रहा। मशीन आई। कई दिन तक लोग खोजते रहे लेकिन हमें लाश नहीं मिली। बाद में सैकड़ों ट्रक बालू लाकर भर दिया गया गड्ढे को। सरकार से पांच लाख मुआवजा मिला। लेकिन बीसीसीएल ने एक लाख देकर हाथ खड़े कर दिए। अभी भी डेंजर है भैया। लेकिन क्या करें, कहां जाएं परिवार लेकर। मजबूरी है, बारिश में बहुत ज्यादा खतरा रहता है। सबसे ज्यादा जमीन फटती है तब।

कहते हैं- जो होगा देखा जाएगा, अल्लाह मालिक है। यानी इस जलजले से निपटने या बचाने की कोई ठोस रणनीति बन ही नहीं पाई। पुनर्वास काफी दूर हुआ है और लोग वहां जाना नहीं चाहते। झरिया की त्रासदी कभी चुनाव में मुद्दे के तौर पर नहीं उभरती। आवाज उठती है तो बस नकारात्मक। धनुवाडीह कोलियरी के एक तरफ खनन तो दूसरी तरफ भयंकर आग। यह भी संयोग है कि यही आग और कोयले का भंडार लोगों का पेट भी भरती है।

लोग जान की बाजी लगाकर कोयला निकालने जाते हैं और अगर किस्मत ने दगा दिया तो अंतिम संस्कार के लिए घरवालों को लाश तक नहीं मिल पाती। धरती का दावानल उन्हें अपनी आगोश में ले लेता है। असवा देवी कहती है- इस बार वोट नहीं देंगे सर। घरों के आसपास के दरारों को दिखाती है। उसकी हां में हां मीना, सुनमुनिया, सुरो, दुखनी, रजिया, गंगिया भी मिलाती है। इनका रोना है कि बच्चों की शादी करना मुश्किल है।

असंगठित मजदूरों का कोई रखवाला नहीं

कोलियरी की एक बड़ी आबादी असंगठित मजदूरों की है। ये जान जोखिम में डालकर कोयले का खनन तो करते हैं लेकिन इनकी मेहनत का बड़ा हिस्सा दबंगों की जेब में जाता है। विरोध करने पर हत्या होना आम बात है। कई संगठन इनका हमदर्द होने का दावा करते हैं लेकिन इनका काम भी मेंबरशिप के पैसे वसूलने तक ही सीमित है। इलाकावार सबका रेट तय है।

इसी के अनुसार मजदूरों की मेहनत की बोली लगती है। जाहिर है, दबंगों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। इससे ये तो फलते-फूलते हैं लेकिन असंगठित मजदूरों का जीवन स्तर नहीं सुधरता। कोलियरी के लोग बताते हैं कि अभी स्थिति और खराब होगी। आऊटसोर्सिंग करा रही कंपनियों को मजदूरों से कोई लेना-देना नहीं है।

1991 में खुला भाजपा का खाता

धनबाद से पहला और दूसरा चुनाव कांग्रेस के पीसी बोस ने जीता। 1962 में भी इस सीट से कांग्रेस के पीआर चक्रवर्ती जीते। 1967 में निर्दलीय प्रत्याशी ललिता राज्य लक्ष्मी ने जीत हासिल की। 1971 में कांग्रेस ने वापसी की और राम नारायण शर्मा जीते। 1977 में कम्युनिस्टों का कब्जा हुआ और एके रॉय जीते। 1980 में भी एके रॉय जीतने में कामयाब हुए। 1984 में कांग्रेस ने फिर वापसी की और शंकर दयाल सिंह जीतने में कामयाब रहे।

1989 में फिर एके रॉय जीते। 1991 में धनबाद सीट पर पहली बार भाजपा का खाता खुला। रीता वर्मा लगातार चार बार 1991, 1996, 1998 और 1999 में जीत हासिल करने में सफल रहीं। 2004 में कांग्रेस के चंद्रशेखर दूबे जीते। 2009 में भाजपा ने फिर वापसी की। 2014 में भी पशुपतिनाथ सिंह ने जीत हासिल करने में कामयाबी पाई।

दबदबा शहरी वोटरों का

धनबाद संसदीय क्षेत्र में 62 फीसद शहरी और 38 प्रतिशत ग्रामीण वोटर हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति के वोटरों की तादाद 24 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में लोग यहां आकर बसे हैं। इस संसदीय क्षेत्र में बोकारो, सिन्दरी, निरसा, धनबाद, झरिया, चंदनक्यारी (सुरक्षित) विधानसभा सीट है।

फिलहाल पांच विधानसभा सीटों बोकारो, धनबाद, सिंदरी, चंदनक्यारी और झरिया पर भाजपा का कब्जा है जबकि एक सीट निरसा माकर्सवादी समन्वय समिति के पास है। पिछले चुनाव में भाजपा के पशुपति नाथ सिंह ने कांग्रेस के अजय कुमार दूबे को लगभग 2.92 लाख वोटों से हराया था।

जीत के 5 मंत्र

1. शहरी वोटर : शहरी वोटरों का झुकाव तय करेगा प्रत्याशियों की किस्मत। स्थानीय निकायों पर है भाजपा का दबदबा। ज्यादा विधानसभा सीटों पर भी उसका असर।

2. खनन क्षेत्र : अधिकांश इलाकों में खनन। इससे जुड़े संगठनों के भी प्रभावी भूमिका के आसार। राजनीतिक दलों का है इनपर हाथ।

3. मजदूर संगठन : छोटे-बड़े श्रमिक संगठन भी तय करेंगे जीत-हार का अंतर। समर्थन पाने वाले रहेंगे बेहतर स्थिति में।

4. विस्थापन-पुनर्वास : खनन से विस्थापित लोगों का पुनर्वास एक बड़ी समस्या। झरिया एक्शन प्लान की सफलता-असफलता का भी असर।

5. रेल लाइन : चंद्रपुरा रेल लाइन भूगर्भ आग के कारण बंद हो गई थी। चुनाव के ऐन पहले इसे खोला गया, इसका चुनाव में पड़ेगा असर।

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Posted By: Sujeet Kumar Suman

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