धनबाद, बनखंडी मिश्रा।1971 ई. में देश में पांचवां आम चुनाव हुआ था। चुनाव से पूर्व ही देश की राजनीति में काफी उथल-पुथल की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन को अभी पांच साल भी पूरे नहीं हुए थे कि इंदिरा गांधी को अपनी ही पार्टी यानी कांग्रेस में प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा। नीलम संजीव रेड्डी, एस निजलिंगप्पा, के. कामराज, मोराजी देसाई जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने, इंदिरा गांधी के 'मनमौजी फैसले' स्वीकारने से इनकार कर दिया था। 

कांग्रेस से निकाल दी गई थीं इंदिराः 1969 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और इंदिरा गांधी के बीच विवाद काफी बढ़ गया था। नौबत यहां तक आ गई कि कांग्रेस पार्टी से इंदिरा को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यहीं कांग्रेस दो फाड़ हो गई। अधिकांश कांग्रेसी इंदिरा गांधी के साथ रहे। इंदिरा गांधी के धड़े को कांग्रेस (आर) एवं इंदिरा के विरोधियों की पार्टी को कांग्रेस (ओ) कहा जाने लगा।

1971 से ही टूटा लोकसभा और विधानसभा चुनाव का आपसी तालमेलः 1967 तक देश में आम चुनाव और राज्य की विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ होते थे। कायदे से अगला चुनाव 1972 ई. में होना चाहिए था। लेकिन, कांग्रेस के अंदर ही उपजे विवाद की वजह से, अपनी हिलती कुर्सी के कारण, इंदिरा गांधी ने चालाकी से 1971 में ही आम चुनाव करवाने व्यवस्था कर ली। बस, यहीं से आम चुनाव और राज्य की विधानसभाओं के लिए होने वाले चुनावों का तालमेल टूट गया। तब से आजतक, चुनाव अलग-अलग ही होते रहे हैं। आर्थिक और मानव संसाधन का बेजा खर्च होता रहा है।

गरीबी हटाओ के नारे ने इंदिरा को दिलाई थी जीतः चुनाव से पहले राजनीतिक तौर पर कमजोर लग रही इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस (आर) ने 1971 के चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया। इस चुनाव में इंदिरा ने 'गरीबी हटाओ' का आकर्षक और लुभावना नारा दिया। 1966 के पंजाब रिऑर्गनाइजेशन एक्ट के तहत, हिमाचल प्रदेश का गठन हो चुका था। इस इलाके के छह सीटों को घटाकर चार कर दिया गया था। इसलिए इस बार लोकसभा की 520 सीटों की जगह, कुल 518 सीटों पर चुनाव हुए, जिनमें 352 सीटों पर इंदिरा की कांग्रेस ने कब्जा जमाया।

अबतक का यह सबसे संक्षिप्त चुनाव था: 1971 का आम चुनाव सबसे कम दिनों के खर्च में संपन्न हुआ था। आजाद भारत में अब तक का यह पहला चुनाव था, जो महज दो सप्ताह में पूरा हो गया था। यह चुनाव एक अन्य मामलों में ऐतिहासिक रहा कि दो राजनीतिक- स्वतंत्र पार्टी (देश के पहले और अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी द्वारा गठित) एवं जनसंघ (मौजूदा भाजपा की मूल पार्टी) का यह अंतिम चुनाव रहा।

धनबाद में फिर कायम हुई थी कांग्रेस की बादशाहत: 1967 के आम चुनाव में धनबाद की परंपरागत सीट कांग्रेस के हाथों से निकल गई थी। रामगढ़ राज की रानी ललिता राज लक्ष्मी ने जनक्रांति दल की टिकट पर चुनाव लड़कर कांग्रेस से धनबाद सीट झटक लिया था। लेकिन, महज चार साल बाद ही, 1971 ई. में, कांग्रेस ने पुन: इसे जीतने में सफलता हासिल कर ली।

बिनोद बिहारी महतो को 70,923 वोटों से हराकर रामनारायण बने थे सांसद: 1971 के आम चुनाव में धनबाद से रामनारायण शर्मा ने जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में वे कांग्रेस के उम्मीदवार थे। उन्होंने 107308 वोट प्राप्त किए थे। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी झामुमो के संस्थापक सदस्य रहे बिनोद बिहारी महतो को महज 36,385 मत प्राप्त हुए थे। बिनोद सीपीएम के प्रत्याशी थे। दबंग मजदूर नेता एसके राय 16243 वोट लाकर चैथे नंबर पर रहे थे। चुनावी मैदान में राय ने सीपीआइ की ओर से ताल ठोका था।

मजदूर आंदोलनों में अपनी सक्रियता की वजह से लोकप्रिय हुए थे आरएन शर्मा: 1971 के चुनाव में धनबाद से सांसद के तौर पर निर्वाचित हुए रामनारायण शर्मा स्वतंत्रता सेनानी थे। वे मूल रूप से सारण जिले के थे। आजादी की लड़ाई के दौरान लगभग साढ़े तीन साल वे कारावास में रहे। 31 अगस्त 1915 को जन्मे शर्मा धनबाद जिला कांग्रेस कमिटी और बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के महासचिव रहे। वे इंटक के कार्यकारी अध्यक्ष रहे थे। इसके अतिरिक्त वे डीवीसी कर्मचारी संघ, बोकारो स्टील वर्कर्स यूनियन एवं हिंदुस्तान जिंक वर्कर्स यूनियन, टुंडु के भी अध्यक्ष थे। इंडियन नेशनल माइन वर्कर्स फेडरेशन, फर्टिलाइजर फैक्टरीज वर्कर्स यूनियन, प्रोविडेंट फंड समेत कई संगठनों के नेता थे। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की बैठकों में भाग लेने के लिए उन्होंने डेनमार्क, पिट्सबर्ग, अमेरिका, इंगलैंड, आयरलैंड, फ्रांस, बेल्जियम, नार्वे, यूगोस्लाविया जैसे देशों का दौरा किया था। मजदूरों के प्रखर नेता रहे शर्मा को अपनी श्रमिक राजनीति का लाभ उस चुनाव में मिला और वो जीत दर्ज करने में कामयाब रहे।

नहीं काम आया धनबल, तीसरे नंबर पर रहे थे प्राण प्रसादः 1971 के चुनाव में जब श्रमिक नेता और खादी ग्रामोद्योग से जुड़े रामनारायण शर्मा को कांग्रेस ने उतारा, तो कई खान मालिकों और पूंजीपतियों को यह बात नागवार गुजरी थी। उनलोगों ने शर्मा के खिलाफ मेसर्स बर्ड्स कंपनी लिमिटेड के सिजुआ क्षेत्र के महाप्रबंधक प्राण प्रसाद को चुनाव में खड़ा किया था। देश की इस प्रमुख कोयला कंपनी को अपनी वित्तीय संपदा का दंभ था। प्राण प्रसाद की ओर से चुनाव में खूब पैसे खर्च किए गए। बिल्कुल कागज के टुकड़ों की तरह नोट उड़ाए गए थे। प्रचार के लिए हेलीकॉप्टर भी खूब उड़ान भरते थे। लेकिन, 'गुलाब के फूल' चुनाव चिन्ह से मैदान में उतरे प्राण प्रसाद जनता का भरोसा नहीं जीत पाए थे।

Posted By: mritunjay

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