मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। तीन दशक पहले जमीन से उखड़ी कांग्रेस को फिर अपनी बेल फैलती दिख रही है। हाल में जब सपा-बसपा ने गांठ जोड़कर पंजे वाली पार्टी के लिए केवल दो सीटें छोड़कर एकता का स्वांग रचा तो इंदिरा की पोसी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में निराशा झलक रही थी, लेकिन जब से नई सूबेदार की नियुक्ति हुई पार्टी में अचानक हर्ष और उल्लास की लहर आ गई है। तैनाती भी किसी और की नहीं, बड़े सियासी परिवार की उन मैडम की हुई जिनमें कार्यकर्ता इंदिरा की छवि देखते हैं। कार्यकर्ताओं को उम्मीद है मैडम का करिश्मा पार्टी को संजीवनी दे जाएगा।

इसी बीच दूसरी हलचल तब मच गई जब पता चला कि मैडम सूबे की राजधानी आ रही हैं और तीन दिन रुकेंगी। रोड शो भी कर सकती हैं। इससे पार्टी में बेसब्री बढ़ गई है। बेसब्री की एक वजह यह कानाफूसी भी है कि इन दिनों में टिकट भी फाइनल हो सकता है। दरअसल सूबे के दो युवाओं के साथ दिल्ली में मैडम की पहली बैठक की जारी हुई फोटो ने वायरल होकर यहां पंजे के दावेदारों के बीच यह कानाफूसी बढ़ाई है। उन्हें पता चला कि फोटो वाले युवाओं ने भीड़ में मैडम को बायोडाटा थमाया था। कई लोगों ने इस उम्मीद से बायोडाटा तैयार कर लिया है कि शायद उन्हें भी फोटो खिंचाने का मौका मिल जाए।

चाचाजी और भगवा खेमे की खुशी

साइकिल की सवारी से तौबा करने वाले चाचाजी और उनके समर्थकों के हौसले जैसे-जैसे बुलंद हो रहे हैं, भगवा दल वालों की बांछे भी खिल रही हैं। वे गठबंधन की कुछ तो गांठ ढीली करेंगे ही। सोने में सुहागा यह कि चाचाजी ने यह भी ऐलान कर दिया है कि वह सुहागनगरी से ही चुनाव लड़ेंगे। इससे एक बात तो तय हो गई है कि चुनाव में ‘फैमिली ड्रामा’ एक बार फिर देखने को मिलेगा। वर्तमान में सुहागनगरी से समाजवादी प्रोफेसर साहब के बेटे ही सांसद हैं और चाचा के चुनाव लड़ने से उनके लिए समस्या खड़ी हो सकती है। चाचाजी ने वहीं से चुनाव लड़ने का इरादा क्यों किया, यह तो वही जानें, लेकिन इसके पीछे अतीत के घावों को भी जोड़कर देखा जा रहा है। प्रगतिशील समाजवादियों की जमात में से एक ने सरगोशी के अंदाज में बता भी दिया कि अब हिसाब बराबर होगा। उसका इशारा उन दिनों की ओर था, जब कुनबे की लड़ाई में प्रोफेसर साहब ने चाचाजी को दरकिनार कर रखा था और स्थिति यहां तक आई कि उन्हें साइकिल से उतरना ही पड़ा।

नेताजी और हाऊ इज द जोश

प्रदेश के मुखिया के साथ चंद रोज पहले माननीयों ने फिल्म ‘उड़ी द सर्जिकल स्ट्राइक’ देखी। फिल्म देख चुके पड़ोसी जिले के दो माननीय एक अफसर के पास क्षेत्र के कामकाज के सिलसिले में बैठे थे। बात फिल्म पर शुरू हुई। अधिकारी ने पूछा ‘हाऊ इज जोश?’ जवाब नहीं मिला तो चेहरे पर जिज्ञासा उभर आई? नेताजी ताड़ गए। बोले, परदे पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ आसान है। असली तो हम लोगों को करनी है। क्षेत्र में और अपने लोगों में। वह भी प्रदेश में बेहद मजबूत जातीय समीकरण के खिलाफ। नौकरशाही से जो मदद मिलनी चाहिए वह मिल नहीं रही है। यह दर्द बहुतों का है, लेकिन असल बात यह है कि बड़े नेताओं को दिखाई नहीं दे रहा।

मुखिया और नायब साहब

आपदाओं से निपटने के लिए बनाई गई संस्था के नायब साहब खासे बेचैन हैं। बेचैनी का सबब यह है कि उन्हें ओहदा तो दे दिया गया है, लेकिन उसके अनुरूप अधिकार नहीं मिले हैं। सेना के आला अफसर रह चुके नायब साहब को नाफरमानी बर्दाश्त नहीं है, लेकिन अब नौकरशाही के मकड़जाल ने जैसे उनकी हसरतों पर ब्रेक लगा दिया हो। सेना की नौकरी में असंभव को संभव कर दिखाने का जज्बा रखने वाले साहब यहां भी चांद-तारे तोड़ लाना चाहते हैं, लेकिन अधिकारों के अभाव ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया है।

ऐसा नहीं है कि मौजूदा सेटअप में उनके कुछ करने के लिए गुंजाइश नहीं है, लेकिन ‘यह दिल मांगे मोर’ के अंदाज में वह कुछ और अधिकार संपन्न होना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने शासन के आला अफसरों के दरवाजे खटखटाने की कोशिश की, लेकिन नतीजा ‘वही ढाक के तीन पात’ रहा है। संस्था के अध्यक्ष सरकार के मुखिया हैं। चुटकी लेने वाले कह रहे हैं कि अब तो मुखिया जी ही नायब साहब को अपने अधिकार सौंप दें तो बात बने।

चुनावी चुनौती और बाबूगीरी का बोझ

पुलिस मुख्यालय में चुनाव का असर दिखने लगा है, लेकिन अधिकारियों की कमी तैयारियों की राह में बड़ा रोड़ा भी है। इसका खमियाजा यहां तैनात कुछ अधिकारियों को भुगतना पड़ रहा है। आलम यह है कि उनके बिस्तर दफ्तर में ही लग चुके हैं। पिछले दिनों कुछ अधिकारियों को तो मुख्यालय से फील्ड पोस्टिंग पर भी नहीं जाने दिया गया। अब उनके जिम्मे चुनाव की जिम्मेदारी तो है, लेकिन संसाधनों का टोटा भी।

लिहाजा नए अधिकारी इस सेल की ओर रुख भी करना नहीं चाहते। उनके लिए यह रास्ता दोधारी तलवार से कम नहीं। परीक्षा पास करने पर रिजल्ट तो बड़ों के खाते में होगा, लेकिन हर गड़बड़ी के लिए फिलहाल जिम्मेदार अधीनस्थ ही माने जाएंगे, परंतु चुनाव है तो ड्यूटी करनी ही पड़ेगी। एक अधिकारी ने कहा कि इससे अच्छा तो था कि किसी जिले में ही पड़े रहते। कम से कम बाबूगीरी तो न करनी पड़ती।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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