हृदयनारायण दीक्षित। जनगणमन विकल्पहीन नहीं है। राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रों में विकल्प ही विकल्प हैं। यहां ढेर सारे देवता हैं। जिसे चाहें, उसे नमस्कार करें। तमाम ‘विश्वास’ हैं। अंत:करण की संवैधानिक स्वतंत्रता है। ढेर सारे राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दल हैं। चुनाव के समय सभी दल तुलनीय हैं। उनके द्वारा खड़े किए गए हजारों प्रत्याशी भी तुलनीय हैं। प्रत्याशियों/दलों की अच्छाई, बुराई, क्षमता या अक्षमता के बीच विकल्पों की कमी नहीं है।

बावजूद इसके कुछ क्षेत्रों में चुनाव बहिष्कार की घटनाएं हैं। माओवादी संविधान में विश्वास नहीं करते। वे प्राय: हर चुनाव में बहिष्कार की बातें करते हैं। जम्मू कश्मीर में भी ऐसा कुछ सुना जाता है। चुनाव बहिष्कार की घटनाएं प्राय: स्थानीय समस्याओं को लेकर होती हैं। बिजली नहीं तो वोट नहीं/ सड़क नही/ पुल नहीं तो वोट नहीं आदि नारे लगते हैं।

इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में सभी उम्मीदवारों को खारिज करने वाला एक विकल्प ‘नोटा’ है। नोटा का पूरा नाम ‘नन ऑफ द एबव’ (इस सूची में कोई नहीं) है। यह विकल्प देकर चुनाव आयोग ने देश के उन मतदाताओं को सहूलियत दी थी, जिनके मानकों पर कोई खरा नहीं उतरता है। ऐसे में सबसे बड़ा मूलभूत प्रश्न है कि क्या देश के दलतंत्र और उम्मीदवारों के बीच वाकई विकल्पहीनता है?

मतदान का अधिकार असाधारण कर्तव्य भी है। मतदाता इस अधिकार के प्रयोग से अपने मन की सरकार चुनते हैं और विधायी संस्थाओं में अपने मन का प्रतिनिधि चुनते हैं लेकिन बात इतनी ही नही है। वे दलीय दृष्टिकोण और कामकाज परखते हुए अर्थव्यवस्था, समाजनीति गरीबी, बेरोजगारी, राष्ट्रीय सुरक्षा, सुशासन व विदेश नीति के संदर्भ में भी इस या उस दल को वोट देते हैं। वे राष्ट्रजीवन के बुनियादी सवालों से कम या ज्यादा टकराने वाले दल/प्रत्याशी को मत देते हैं। मतदान से पृथकता या नोटा का प्रयोग राष्ट्रजीवन के किसी भी सरोकार की पैरोकारी नहीं करता।

मतदान जनप्रतिनिधि और सरकार चुनने का ही अवसर है। वोट न देना अधिकार नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में एक याचिका में नोटा के बटन का निर्देश देते हुए कहा था कि, ‘इससे मतदाताओं को चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में किसी को भी वोट न देने का अवसर मिलेगा। वे वोट न देने का अधिकार पाएंगे।’ भारत में वोट की अनिवार्यता नहीं है। अनिवार्यता होती तो वोट देते समय किसी को भी वोट न देने के अधिकार का प्रश्न अंतर्निहित होता। अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही थी कि ‘जरूरी है कि उच्च नैतिक मूल्यों से युक्त लोग जनप्रतिनिधि चुने जा सकें। नोटा दलों को अच्छे उम्मीदवार खड़े करने के लिए बाध्य कर सकता है।’

कुछ लोगों ने नोटा को भारतीय जनतंत्र के परिपक्व होने का संकेत भी बताया है लेकिन नोटा के पक्ष या सभी प्रत्याशियों के विपक्ष में डाले गए वोट का चुनाव परिणामों पर कोई प्रभाव विधि मान्य नहीं है। नोटा के वोट सबसे ज्यादा हों तो भी प्रत्याशियों में प्रथम मत पाने वाले को विजयी घोषित किया जाता है। तब नोटा या चुनाव बहिष्कार का लाभ या इसका औचित्य क्या है? नोटा वोट की बर्बादी क्यों नहीं है? नोटा का इस्तेमाल करने वाले मित्र परिणामी जनतंत्र की संवैधानिक कार्यवाही से पृथक क्यों हैं। मतदान केंद्र तक न जाने वाले और मतदान केंद्र में नोटा प्रयोग करने वाले के बीच कोई आधारभूत अंतर नहीं है।

बेशक फ्रांस, बेल्जियम, पड़ोसी बांग्लादेश, कोलंबिया आदि कई देशों में नोटा है। लेकिन भारत में समूची राजनीति को ही गाली देने का फैशन है। सभी उम्मीदवारों को खारिज करने की बात इसी मानसिकता का हिस्सा है। नोटा के पक्षधरों ने श्रेष्ठ उम्मीदवारों की परिभाषा नहीं की। उन्होंने श्रेष्ठ उम्मीदवारों के लिए कभी जन अभियान भी नहीं चलाए। वे सबको खारिज ही करते हैं। संविधान (अनु0 102) में संसद सदस्यता के लिए अयोग्यता की सूची है। इसी तरह अनु0 173 में विधानमंडल के लिए प्रावधान है। शेष सभी उम्मीदवार योग्य हैं। नोटा के पक्षधरों का सपना सुंदर ही होगा लेकिन प्रकृति में कुछ भी निरपेक्ष नहीं है।

लोकतंत्र राजतंत्र के सापेक्ष श्रेष्ठतर है। यहां लोकतंत्र का चुनावी व्यवहार दलतंत्र में प्रकट होता है। यहां दल भी निरपेक्ष नहीं है। हरेक राजनीतिक दल अन्य दलों के सापेक्ष अच्छा, कम अच्छा, बुरा या कम बुरा है। यही बात लोकसभा या विधानसभा या किसी भी स्तर के चुनावी प्रत्याशियों पर भी लागू होती है। किसी का अपना पसंदीदा प्रत्याशी अन्य प्रत्याशियों की तुलना में अच्छा होता है। बुरा प्रत्याशी भी अन्य प्रत्याशियों की तुलना में ही बुरा होता है। इसलिए उपलब्ध दलीय विकल्पों और उम्मीदवारों में चयन करना ही लोकतंत्र की मजबूती है। ऐसे सतत लोकतंत्री व्यवहार से ही हमारा जनतंत्र परिपुष्ट होगा।

  विधानसभा अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश

 

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Posted By: Dhyanendra Singh