एनके सिंह। ये नतीजे चौंकाने वाले हैं। ये नतीजे देश की राजनीतिक दशा-दिशा बदलने वाले हैं। ये वोट जनता ने मोदी को दिए हैं, लिहाजा प्रधानमंत्री को परिणाम देने होंगे। सवाल है कि क्या सामाजिक तनाव का माहौल बना रहेगा या मोदी ऐसे तत्वों पर प्रभावी अंकुश लगाएंगे? उधर देश की सबसे पुरानी और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी में क्या मंथन शुरू होगा या अध्यक्ष राहुल गांधी के इर्द-गिर्द गणेश परिक्रमा करके फिर पांच साल के लिए पार्टी सुशुप्तावस्था में चली जाएगी?

मायावती- अखिलेश का जातिवादी पुनर्समूहीकरण अगर उत्तर प्रदेश में असफल हुआ तो क्या यह नया शुभसंकेत है? क्या देश राहुल गांधी, मायावती, अखिलेश, तेजस्वी या इन सबके कुल भावी योग को 25 लाख करोड़ रुपये के बजट वाले भारत की बागडोर नहीं देना चाहता था? कांग्रेस ने तो घोषणापत्र में हर गरीब को 72,000 रुपये सालाना तक देने का वादा किया था। फिर भी मोदी सरकार ने 2-2 हजार रुपये की मात्र दो किस्तें देकर उसे कैसे अपने पाले में कर लिया? क्या कांग्रेस के पास इस संदेश को भेजने के लिए प्रतिबद्ध कैडर नहीं था।

शायद राहुल गांधी को अभी ‘आज हैं, कल नहीं’ के भाव से राजनीति को लेने का तरीका बदलना होगा। कांग्रेस के वर्तमान नेताओं पर लोगों का ‘स्वत: विश्वास’ नहीं उमड़ता जो नेहरू-इंदिरा पर था या आज अकेले नरेंद्र मोदी पर है। जनता को जब यह पता चला कि चुनाव खत्म होने के बाद कांग्रेस के कई युवा नेता यूरोप-अमेरिका की सैर को निकल गए हैं तो लगा कि इनके लिए चुनाव भी किशोरावस्था वाले ‘लेट अस हैव फन’ टाइप का है और वह ‘फन’ खत्म हुआ तो अब नए ‘फन’ के लिए विदेश चले गए, जबकि चुनाव प्रचार में दिन-रात एक करने वाले 68 वर्षीय नरेंद्र मोदी केदारनाथ की गुफा में साधना करने गए तो मीडिया ने पूरे दिन दिखाया। अगर राहुल भी उत्तराखंड के किसी गांव में दो दिन के लिए किसी दलित के घर में ‘आध्यात्मिक शांति’ के लिए गए होते तो मीडिया उसे भी उसी शिद्दत से दिखाता। यहीं से वह अंतर शुरू होता है।

मोदी को जनता अपनी संस्कृति के नजदीक पाती है और राहुल के प्रति पाश्चात्य, संभ्रांत संस्कृति के ‘अभिजात्य लाडले’ का भाव बना हुआ है। हालांकि इसे खत्म करने की राहुल ने पिछले दो साल में कोशिश की है। बहरहाल जनता ने यह सिद्ध कर दिया कि मोदी पर पांच साल बाद भी भरोसा है। ऐसा नहीं कि विगत पांच साल में बगैर कुछ हुए यह विश्वास बना रहा।

विकास दो तरह के होते हैं-सीधी डिलीवरी देकर तात्कालिक कमियों को पूरा करना या राहत मुहैया कराना जैसे उज्ज्वला योजना, किसानों को 2,000 रुपये की दो किस्तें तत्काल देना। इन्हें कोई भी सक्षम सरकार अपने कार्यकाल के पहले तीन सालों में पूरी तरह उपलब्ध करा सकती है और व्यापक जन-संचार माध्यम के जरिये इसका अहसास भी दिला सकती है। मोदी ने यह किया, लेकिन दीर्घकालिक विकास जैसे अंतर-संरचनात्मक विकास जिसमें सिंचाई, ऊर्जा, सड़क, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के लिए संस्थागत ढांचे खड़ा करने, नए उद्योगों के लिए दक्ष मानव संसाधन का स्नोत तैयार करने में किसी भी सरकार के लिए दो शासनकाल जरूरी होता है।

फिर उस किस्म के विकास में जिसमें सामान्य जन की सोच वैज्ञानिक बनाकर उन्हें सदियों पुरानी जीवनशैली या जीवनयापन के तरीकों के दोषों से हटाकर नई सोच और यंत्रों के इस्तेमाल की ओर ले जाने में भी एक लंबा समय लगता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में सड़कें तीन गुनी रफ्तार से बनीं, शौचालय बने, बिजली सुदूर गांव तक पहुंची- इन सब ने जनता को प्रभावित किया। नोटबंदी में हुए कष्ट से ज्यादा खुशी इस बात की रही कि भ्रष्ट, धनपशु, कुकर्मी अफसर फसेंगे।

मोदी सरकार की फसल बीमा योजना एक अद्भुत योजना थी, लेकिन पिछले दो वर्षों में बीमा कवरेज लगातार गिरते हुए 2017-18 में 30 से 24 प्रतिशत पर आ गया जबकि 2017-18 का लक्ष्य 50 प्रतिशत रखा गया था। एक अच्छी योजना के जन्म से ही बीमार होने का मूल कारण राज्य सरकारों का उनींदापन था। राज्य के मुख्यमंत्रियों (और केंद्र के मंत्रियों) को भी सख्त लहजे में कहना होगा कि किसी अखलाक, पहलू खान और जुनैद के मारे जाने पर उन्हें जवाब देना होगा। यह संदेश भी देना होगा कि ‘हर तीसरे दिन किसी न किसी को पाकिस्तान भेजना’ है तो संगठन में जाएं न कि मंत्री बनें। विश्वास है कि 2019 के मोदी एक बदले हुए, ज्यादा प्रभावी और परिणाम देने वाले मुखिया साबित होंगे।

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Posted By: Dhyanendra Singh