दुमका, जेएनएन। झारखंड ही नहीं देश की निगाह संताल परगना के हाईप्रोफाइल सीट दुमका पर आकर टिक गई है। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन जनता के लिए संघर्ष करते करते उनकी बदौलत ऐसी ताकत बन गए कि लगातार आठ बार से यहां का प्रतिनिधित्व सदन में कर रहे हैं।
दुमका सीट झामुमो का अभेद दुर्ग की तरह है, जिसे भेदने की कोशिश कई दफा हुई लेकिन भाजपा दो बार ही इस पर सफल हो पाई। उसके बाद से यह झामुमो का यह गढ़ किला बन चुका है। झामुमो से दोनों बार बाबूलाल मरांडी ही कमल फूल लेकर दिल्ली गए थे। यह अलग बात है कि 2014 में वह अपनी नई पार्टी से चुनाव लड़े तो 1.57 लाख वोट लाकर तीसरे पायदान पर रहे थे। आज महागठबंधन के प्लेटफार्म पर अपना वोट गुरुजी के लिए मांग रहे हैं।
झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन अपनी जमीन पर किसी का पांव जमने नहीं देंगे के तर्ज पर काम कर रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री रघुवर दास दुमका एवं राजमहल सीट को मोदी की झोली में डालने के लिए दुमका में लगातार कैंप करते रहे हैं। केवल कैंप ही नहीं किए हैं एक-एक बूथ का मैनेजमेंट पर नजर बनाए हैं। दूसरा मोदी फैक्टर पर पूरा भरोसा है। भाजपा मोदी फैक्टर को पीएम आवास, उज्ज्वला, शौचालय, किसान सम्मान योजना एवं आयुष्मान भारत के नए लाभुकों के तौर पर देख रही हैं। राजनीतिक पंडित भी मानते हैं कि दुमका सीट प्रतिष्ठा की सीट बन गई है। एक तरफ शिबू सोरेन, हेमंत सोरेन एवं बाबूलाल मरांडी सरीखे पूर्व मुख्यमंत्री हैं तो दूसरी तरफ सरकार के मुखिया रघुवर दास हैं। झामुमो की ताकत जल, जंगल व जमीन और झारखंड आंदोलन की है। सीएनटी-एसपीटी एक्ट से आदिवासी जमीन की रक्षा को अपना कवच मान रही है।
शुक्रवार को प्रचार का चक्र थम जाएगा। 2014 में बाबूलाल ने त्रिकोणात्मक बना दिया 2014 के लोकसभा चुनाव में बाबूलाल मरांडी मैदान में आकर खेल को त्रिकोणात्मक बना दिए थे। बावजूद झामुमो को 3.35 लाख। भाजपा को 2.96 लाख और झाविमो को 1.57 लाख वोट आया था। त्रिकोण हो जाने पर गुरुजी के जीत का फासला बढ़ गया था। 2009 में शिबू सोरेन और सुनील सोरेन के बीच सीधी लड़ाई होने पर जीत का फासला घटा था। झामुमो की झोली में 2009 में 2.08 लाख वोट तो भाजपा को 1.89 लाख वोट आए थे। 2019 के चुनाव में एक बार फिर झामुमो और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई है। फर्क यह है कि सीधी लड़ाई में शिबू को बाबूलाल के वोट का सहारा है और उसी आधार पर अभेद दुर्ग को संजोने का पूरा भरोसा। भाजपा झामुमो के किला को मोदी फैक्टर से ध्वस्त करने में जुटी है।
वार रूम के रणनीतिकारों का मानना है कि लोकसभा के छह विधानसभा में 4.78 लाख लाभुकों के घर में मोदी सीधे पहुंचे हैं। चुनावी सभा में सीएम समेत सारे स्टार प्रचारक मोदी के नाम पर ही वोट मांग रहे हैं। तो 2014 में मोदी लहर थी लेकिन इस बार मोदी का काम बोल रहा है। दुमका से 15 किलोमीटर दूर फिटकोरिया गांव की उíमला देवी कहती हैं कि पहाड़ पर गैस चूल्हा से खाना बना रहे हैं। बिजली आ गई है। ईज्जत घर बन गया है। मोदी हाउस बन गया है। क्या यह विकास नहीं है। यही तो विकास है। अब आप खुद समझ लीजिए कि वोट किसको जाएगा। श्रीडंगालपाड़ा में आदिमजनजाति के लोग रहते हैं। बालेश्वर टूडू कहते हैं कि मोदी सरकार में गरीबों को पूछा गया है। तो सीधा है, जो हमको पूछेगा हम भी उसको याद करेंगे। लेकिन जामा के कुकुरतोला गांव की मीरूनी किस्कू कहती हैं कि गैस चूल्हा तो मिल गया लेकिन और सुविधाएं नहीं मिली है। सुने हैं कि सिलेंडर भरवाने का पैसा नहीं लगेगा, लेकिन अभी उसको कुछ मालूम नहीं है।
वोट समेटने व खींचने की जोर आजमाईशः बाबूलाल मरांडी के चुनाव में खड़ा होने पर शिकारीपाड़ा में 47 हजार वोट लाकर सबसे आगे रहे थे। यह वोट जेएमएम में शिफ्ट कराना है। उस राह में परितोष सोरेन रोड़ा बनकर भाजपा को मजबूत कर रहे हैं। जामा विधानसभा में आठ हजार का फासला झामुमो और भाजपा के बीच है। पिछले लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव में भाजपा के सुरेश मुर्मू महज दो हजार के माíजन से हारे थे। यह भाजपा मान रही है कि यहां वोट बैंक बढ़ा है। सारठ में 22 हजार वोट झाविमो को मिला था। यह वोट संप्रति सूबे के मंत्री रणधीर सिंह भाजपा में शिफ्ट कराने में मेहनत कर रहे हैं। तो बाबूलाल उसे बचाने में लगे हैं। नाला में पिछले चुनाव में 800 वोट से भाजपा झामुमो से आगे रही है। दुमका सीट पर तीन हजार वोट भाजपा को अधिक है। सीएम ने सीटिंग विधायकों से कहा है कि लीड बढ़ना चाहिए। वरना सभी अपने को आउट समझें। इधर झामुमो अपने जल, जंगल व जमीन से संघर्ष को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं।

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