धर्मशाला, नवनीत शर्मा। बेशक हर चुनाव का अर्थ आरोप-प्रत्यारोप और मैं सबसे अच्छा, दूसरे बुरे की स्थापित परंपरा से जुड़ता है। इस बार कुछ परंपराएं जस की तस रहीं। विभिन्न दलों से रूठे लोगों की घर वापसी कराई गई। पहाड़ में मुकाबला इस बार भी कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा। बसपा के हाथी ने पहाड़ की ओर देखा जरूर, लेकिन चढ़ पाना आसान कतई नहीं है।

स्थानीय मुद्दों ने चुनाव से पहले अवश्य चर्चा में आने की कोशिश की लेकिन अंतत: चुनाव मोदी बनाम अन्य बनकर रह गया। हिमाचल प्रदेश की संसाधन विहीनता, पर्यटन, ऊर्जा, बागवानी, कृषि और कई ज्वलंत मुद्दे बड़े नेताओं की शब्दावली से नदारद दिखे। उनका जिक्र केवल जिक्र के लिए हुआ। लेकिन बड़ी बात यह दिखी कि भाजपा के प्रत्याशियों के लिए भी स्थानीय मुद्दों या अपने कृतित्व से बढ़ कर मोदी का सहारा था। इससे ठीक उलट कांग्रेस के उम्मीदवारों या दीगर प्रत्याशियों को मोदी के विरोध का सहारा था। कहीं राष्ट्रवाद की बात मुखर थी तो प्रतिपक्ष में राष्ट्रवाद की परिभाषा पर ही चर्चा की अपेक्षा थी। एक सीधी रेखा दिखी। कुछ इस ओर थे, कुछ उस ओर।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भाजपा के स्टार प्रचारक के तौर पर उभरे। उन्होंने 106 जनसभाओं को संबोधित किया। साफ हुआ कि भाजपा हिमाचल में उन्हीं पर निर्भर थी। दूसरे बड़े नेता शांता कुमार कांगड़ा और प्रेम कुमार धूमल हमीरपुर तक सीमित रहे। अपनी जनसभाओं में राहुल गांधी बेशक वीरभद्र सिंह को गुरु बताते रहे हों, कांग्रेस के हवाले से यह चुनाव संकेत दे गया कि वीरभद्र सिंह अब अतीत हैं।  

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Posted By: Preeti jha

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