नवादा [जागरण स्पेशल]। नवादा लोकसभा सीट पर नामांकन प्रक्रिया पूरी होते ही राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। यहां कुल 18 प्रत्यााशियों ने चुनाव लड़ने के लिए ताल ठोकी है। कांग्रेस-राजद गठबंधन के तहत यहां से राजद उम्मीदवार मैदान में है। इसी तरह भाजपा-लोजपा के गठबंधन के तहत यहां से लोजपा ने अपना प्रत्याशी खड़ा किया है। चुनावी पंडितों के मुताबिक, इस सीट पर मुख्य लड़ाई राजद और लोजपा के बीच ही है। लंबे समय तक कांग्रेस में रहीं निवेदिता और पूर्व मंत्री केबी प्रसाद के निर्दलीय के तौर पर चुनाव मैदान में उतरने से संघर्ष त्रिकोणीय हो सकता है। ऐसे में यह तय है कि इस लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव बेहद रोमांचक होगा। आइए नजर डालते हैं नवादा लोकसभा सीट के अब तक के सियासी सफर पर-

कांग्रेस के दोनों जीते थे पहले चुनाव में
देश की पहली लोकसभा के गठन के लिए 1952 में हुए चुनाव के दौरान नवादा लोकसभा सीट का अस्तित्व नहीं था। यह क्षेत्र गया पूर्व लोकसभा क्षेत्र का हिस्साा था। पहले चुनाव के दौरान पूरे देश में कांग्रेस का सिक्का कायम था। इस लोकसभा क्षेत्र का विस्तार ज्यादा होने के चलते यहां से कांग्रेस के दो उम्मीादवार बृजेश्वर प्रसाद और रामधानी दास चुनाव मैदान में उतरे और दोनों ही विजयी हुए। इस सीट से कांग्रेस को टक्कर देने के लिए सोशलिस्ट पार्टी ने भी दो उम्मीदवार रक्षा राम और गोपाल कृष्ण महाजन को चुनाव लड़ाया, लेकिन दोनों को हार का सामना करना पड़ा। 1957 के चुनाव में स्वतंत्र नवादा लोकसभा सीट का गठन किया गया। यहां से कांग्रेस ने एक बार फिर से दो उम्मीदवार सत्याभामा देवी और रामधानी दास को उतारा और दोनों को जीत हासिल हुई। यहां से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने भी अपने दो-दो उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाया, लेकिन सबको हार का मुंह देखना पड़ा।

दूसरे स्थान के लिए जनसंघ और भाकपा में दिखा कड़ा संघर्ष
1962 के चुनाव में विपक्षी दलों ने पिछली बार की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन वे कांग्रेस को हराने में नाकाम रहे। कांग्रेस उम्मीदवार रामधानी दास पर जनता ने विश्वास जताया और उन्हें लगातार तीसरी बार सांसद बनाया। कांग्रेस को 99106 वोट हासिल हुए। दूसरे स्थान के लिए जनसंघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में कांटे की टक्कार हुई। जनसंघ उम्मीदवार को 27712 वोट मिले, जबकि भाकपा प्रत्याशी को 26733 वोट ही हासिल हो पाए। दोनों के बीच वोटों का फासला महज एक हजार के करीब रहा।

जब निर्दलीय ने कांग्रेस को आईना दिखाया
1967 का लोकसभा चुनाव बेहद रोचक साबित हुआ, क्योंकि इस बार कांग्रेस को यहां से हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस को यह हार किसी दल ने नहीं, बल्कि निर्दलीय प्रत्याशी के हाथों मिली। निर्दलीय उम्मीादवार के रूप में नवादा सीट से महंत सूर्य प्रकाश नारायण पुरी चुनाव लड़े। उन्हें 110766 वोट हासिल हुए। दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस प्रत्याशी जीपी सिन्हा को 90546 वोटों से संतोष करना पड़ा। 1971 के चुनाव में कांग्रेस ने पिछली हार से सबक लेते हुए रणनीति और प्रत्याशी दोनों बदले। नए प्रत्याशी सुखदेव प्रसाद वर्मा पर दांव खेला, जो सही साबित हुआ। पिछली बार विजेता बने निर्दलीय प्रत्याशी महंत सूर्य प्रकाश नारायण पुरी को हार का सामना करते हुए दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।

जब दो हिस्सों में बंटी कांग्रेस
1977 के चुनाव में भी नवादा लोकसभा की जनता ने अपना मूड बदलते हुए कांग्रेस को समर्थन नहीं दिया। जनता ने भारतीय लोकदल प्रत्याशी नथूनी राम को विजेता बनाया। 1980 के चुनाव के दौरान कांग्रेस में विघटन हो गया और वह दो हिस्‍सों में बंट गई। इस सीट से कांग्रेस आई के उम्मीदवार कुंवर राम 183736 वोट पाकर विजेता बने। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रेम प्रदीप 127549 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। 1984 के चुनाव में कांग्रेस-आई के टिकट पर फिर से कुंवर राम चुनाव लड़े और जीते। यहां से माकपा उम्मीेदवार प्रेम प्रदीप दूसरे स्थान पर रहे।

1989 में माकपा ने कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेला
1989 के लोकसभा चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस को घुटनों पर ला दिया और खुद विजेता बनी। नवादा लोकसभा सीट से माकपा प्रत्याशी प्रेम प्रदीप ने पिछली हार से सबक लेते हुए चुनाव के दौरान जनता से जबर्दस्त सामंजस्य बनाया। इसका उसे जीत के रूप में फायदा मिला। प्रदीप को 310370 वोट मिले। कांग्रेस को तीसरा स्थान मिला, जबकि भाजपा यहां अपना जनाधार मजबूत करते हुए दूसरे स्थान पर रही। 1991 के चुनाव में भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी जीत बरकरार रखी। हालांकि 1992 के उपचुनाव में भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत करते हुए जीत हासिल की। यहां से भाजपा प्रत्याशी कामेश्वर पासवान ने माकपा के उम्मीदवार और तत्कालीन सांसद को एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से शिकस्त दी। इस चुनाव में तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी रहा, जबकि कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया।

पहले राजद ने भाजपा को हराया फिर भाजपा ने राजद को
1998 के चुनाव के दौरान राष्ट्रीय जनता दल ने बिहार में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की, जिसका फायदा उसे जीत से मिला। राजद उम्मीदवार मालती देवी ने 405495 वोट पाकर तत्कालीन भाजपा सांसद और उम्मीदवार कामेश्वर पासवान को धूल चटा दी। इन दोनों के बीच हार का अंतर करीब एक लाख वोटों का रहा। 1999 में नवादा सीट पर फिर से हुए चुनाव में राजद ने तत्कालीन सांसद मालती देवी को टिकट न देकर विजय कुमार चौधरी को चुनाव मैदान में उतारा। राजद का यह फैसला गलत साबित हुआ और उसे भाजपा प्रत्याशी संजय पासवान के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा। यह सीट जीतकर भाजपा ने राजद से पिछली हार का बदला चुकता कर लिया। विजेता प्रत्याशी संजय को 453943 वोट मिले, जबकि दूसरे स्थान पर रहे विजय को 369858 वोट मिले।

आखिरी तक राजद और भाजपा में चलती रही जंग
2004 के लोकसभा चुनाव में नवादा सीट पर राजद ने वापसी की और भाजपा के तत्कालीन सांसद को करारी शिकस्त दी। राजद ने इस बार वीरचंद्र पासवान पर दांव खेला, जो सही साबित हुआ। वीरचंद्र 489992 वोट पाकर विजेता बने, जबकि भाजपा प्रत्याशी संजय को 433986 वोट हासिल हुए। 2009 के चुनाव में भाजपा ने इस सीट को फिर अपने नाम कर लिया। यहां से भाजपा उम्मीदवार भोला सिंह ने 130608 वोट पाकर जीत हासिल की। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने इस सीट पर अपना परचम फहराया। भाजपा के दिग्गज नेता गिरिराज सिंह ने सभी विरोधियों को पटखनी देते हुए जीत अपने नाम की। राजद प्रत्यानशी राजबल्‍लभ प्रसाद दूसरे स्था‍न पर, जबकि जदयू प्रत्याशी कौशल यादव तीसरे स्थांन पर रहे।

बौद्ध और जैन मुनियों की शरणस्थली रहा है नवादा
नवादा जिला दक्षिण बिहार का एक खूबसूरत शहर है। यह अनेक ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे हुए है। खुरी नदी के उत्तर में जो आबादी बसी है, उसे प्राचीन काल में नव आबाद कहा गया। यही बाद में नवादा के रूप में जाना जाने लगा। नवादा को एलियट मार्केट के नाम से भी जाना जाता था। 26 जनवरी 1973 को गया जिले से अलग होकर नवादा एक स्वतंत्र जिला बना। नवादा के उत्तर में नालंदा, दक्षिण में झारखंड का कोडरमा जिला, पूर्व में शेखपुरा व जमुई और पश्चिम में गया स्थित है। नवादा संसदीय सीट के दायरे में छह विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें नवादा जिले की पांच विधानसभा सीटें और शेखपुरा जिले की एक विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। प्राचीन समय में यह शक्तिशाली मगध साम्राज्य का अंग रहा है। यहां वृहद्रथ, मौर्य, गुप्त एवं कण्व शासकों ने शासन किया है। यह क्षेत्र महाभारत कालीन राजा जरासंध के शासन का हिस्सा था। बोधगया एवं पारसनाथ से निकटता के चलते यह क्षेत्र बौद्ध भिक्षुओं एवं जैन मुनियों की तपस्या स्थली रहा है।

Posted By: Amit Singh