जम्मू, अश्विनी शर्मा। जम्मू कश्मीर में छह सीट पर हो रहे लोकसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के सियासी समीकरण बिगाड़ रहे हैं। राज्य में पांच चरण में होने वाले मतदान में 59 निर्दलीय उम्मीदवार जम्मू से लद्दाख तक भाग्य आजमा रहे हैं। कई तो राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। सबसे अधिक निर्दलीय जम्मू-पुंछ क्षेत्र से हैं। यहां 20 निर्दलीय मैदान में हैं। इसके बाद देश की वीआइपी सीट में शुमार ऊधमपुर-डोडा और संवेदनशील सीट अनंतनाग-पुलवामा संसदीय क्षेत्र हैं। अनंतनाग में तीन चरण में मतदान होगा। दोनों क्षेत्रों में 12-12 प्रत्याशी निर्दलीय हैं। बारामुला से 9 और सबसे कम 4 उम्मीदवार लद्दाख से हैं। हालांकि, बढ़ती निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या से कई दिक्कतें भी आती हैं क्योंकि ईवीएम का प्रयोग अधिक होता है।

जम्मू-पुंछ सीट पर बात करेंं तो यहां डोगरा स्वाभिमान से लाल सिंह, रिफ्यूजी संगठन राजीव चुन्नी, पुंछ से परसीर्न सिंह शामिल हैं। लाल सिंह भाजपा से नाता तोड़कर डोगरा स्वाभिमान संगठन बनाकर जम्मू और ऊधमपुर में पकड़ मजबूत की है। रिफ्यूजी संगठन से राजीव चुन्नी जोकि गुलाम कश्मीर के रिफ्यूजियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी आबादी पांच लाख से अधिक है। वह भी मैदान में हैं। पुंछ से स. परसीर्न सिंह जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव मेंं आठ हजार से अधिक वोट हासिल किए थे। वह सातवें स्थान पर रहे थे। उनके पिता पत्रकार रह चुके हैं। ऊधमपुर-डोडा सीट से डोगरा स्वाभिमान से लाल सिंह, बारामुला से इंजीनियर रशीद, अनंतनाग से डॉ. रिदवाना, सुरेंद्र्र सिंह और लद्दाख से सज्जाद कारगिली और असगर शामिल हैं। अगर पिछले लोकसभा चुनाव के इतिहास पर गौर करें तो जम्मू से लद्दाख तक कई निर्दलीय जीत चुके हैं। फिलहाल जम्मू कश्मीर में तीन चरण के मतदान हो चुके हैं। इनमें जम्मू-पुंछ, बारामुला-कुपवाड़ा, ऊधमपुर डोडा-श्रीनगर-बड़गाम के अलावा अनंतनाग शामिल है। 29 अप्रैल को अनंतनाग के कुलगाम में दूसरे और छह मई को शोपियां में तीसरे चरण का मतदान होना है। अंतिम पांचवें चरण में चुनाव छह मई को ही लद्दाख में होगा।

2019 के चुनाव में इतने निर्दलीय

  1. बारामुला               9
  2. ऊधमपुर-डोडा       8
  3. श्रीनगर-बड़गाम     8
  4. अनंतनाग             12
  5. लद्दाख                 2
  6. जम्मू-पुंछ              20

पहले नहीं थी चिंता

ईवीएम से पहले चुनाव में उम्मीदवारों की संख्या अधिक होने पर कोर्ई चिंता नहीं होती थी क्योंकि पहले बैलेट पेपर से मतदान होता था। मौजूदा समय में ज्यादा उम्मीदवार होने से ईवीएम को लेकर दिक्कतें होती हैं। 15 से अधिक उम्मीदवार होने पर दूसरी ईवीएम का इस्तेमाल करना पड़ता है।

बंट जाते हैं वोट

निर्दलीयों की संख्या बढ़ने से राष्ट्रीय और बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों के वोट बंट जाते हैं। इससे कई बार उम्मीदवार कुछ वोटों के अंतर से हार जाते हैं। पिछले बार 2014 में लद्दाख से भाजपा के उम्मीदवार थुपस्तांग छिवांग ने निर्दलीय उम्मीदवार गुलाम रजा को 36 वोट से हरा दिया था। छिवांग दो बार सांसद रह चुके हैं। अन्य क्षेत्रों में मुकाबला कांटे का रहा था।

कश्मीर में 29 निर्दलीय

कश्मीर के लोगों में लोकतंत्र में उत्साह इस कदर है कि बारामुला, श्रीनगर और अनंतनाग संसदीय क्षेत्रों में इस बार के चुनाव में 29 निर्दलीय मैदान में हैं। देश की सबसे संवेदनशील सीट अनंतनाग-पुलवामा में 12, श्रीनगर में 8 तो बारामुला में 9 निर्दलीय उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इनमें युवाओं की संख्या अधिक है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक अच्छे संकेत हैं।

कई बार विपक्षियों के वोट काटने के लिए उतारे जाते हैं

कई बार पार्टियां अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए रणनीति के तहत खुद कई क्षेत्रों में विपक्षियों के वोट तोड़ने के लिए भी निर्दलीयों को उतारती हैं। कई बार तो इसका फायदा होता है तो कई बार नुकसान भी झेलना पड़ता है। जम्मू-पुंछ संसदीय क्षेत्र में सबसे अधिक निर्दलीय उम्मीदवार हैं। हर कोई जीत और अधिक वोट पाने के लिए पूरा जोर लगा रहा है। जम्मू-पुंछ से नेशनल कांफ्रेंस का कांग्रेस से गठजोड़ है। इस कारण नेकां ने जम्मू में अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है। वहीं पीडीपी भी बाहर से कांग्रेस को अपना समर्थन दे रही है।

Posted By: Rahul Sharma