सिलीगुड़ी, अशोक झा । कहते है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होकर गुजरता है। लेकिन, 2019 में बंगाल के सहारे नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल करने की बात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी करती हैं वहीं दोबारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अमित शाह इस बार उत्तर प्रदेश के अलावा बंगाल से आस लगाए बैठे है। इसलिए पहले फेज यानि 11 अप्रैल को होने वाले उत्तर बंगाल का अलीपुरद्वार लोकसभा क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है इस क्षेत्र में सर्वाधिक 200 से अधिक चाय बागान और उससे जुड़े चाय पांच लाख से अधिक आदिवासी श्रमिक।

चाय श्रमिकों की नाराजगी सभी दलों के लिए घातक सिद्ध होगी। इस लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा चाय बागान बंद है। चाय श्रमिकों को आजादी के पूर्व से अबतक घर बनाने के लिए अपना जमीन तक नहीं है। न्यूनतम मजदूरी को लेकर वषरे से वे आंदोलन करते आ रहे है। आश्वासन और बैठकों के दौर के अलावा उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हो पाया है। इस बात को कांग्रेस के ट्रेड यूनियन इंटक नेता अलोक चक्रवर्ती और माकपा का ट्रेड यूनियन सीटू नेता गौतम घोष भी स्वीकार करते है।

नेताओं का कहना है कि चाय बागान की उपेक्षा अपने चरम सीमा पर है। चाय श्रमिकों का रोष उबाल पर है। इसे समय रहते शांत नहीं कराया गया तो उत्तर बंगाल की पहचान चाय उद्योग समाप्त हो जाएगा। भाजपा के ट्रेड यूनियन नेता जॉन बारला का कहना है कि चाय श्रमिकों को कांग्रेस, वामो और अब तृणमूल कांग्रेस ने सिर्फ वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया। इसी लोकसभा क्षेत्र के मदारीहाट के मतदाताओं ने मनोज तिग्गा को विधायक बनाया। उसके कामकाज से लोग इतने प्रभावित है कि उन्हें आशा जगी है कि अगर लोकसभा चुनाव में भी भाजपा का साया उन्हें मिले तो उनकी समस्या का समाधान होगा।

हालांकि इसके विपरीत अलीपुरद्वार के विधायक सौरव चक्रवर्ती का कहना है कि जब से सत्ता में मां माटी मानुष की सरकार आयी है तब से चाय श्रमिकों की समस्या को दूर करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। चाय बागानों की समस्या समाधान के लिए बोर्ड बनाकर 100 करोड़ रूपये दिया। कई प्रकार के विकास कार्य किए जा रहे है। यही कारण है चाय श्रमिकों के बीच का ही नेता दशरथ तिर्की को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। दूसरी पार्टी भी चाय श्रमिकों की नाराजगी को ध्यान में रखकर ही अपने उम्मीदवार का चयन करने में लगी है। 27 ट्रेड यूनियन का संयुक्त मंच ज्वाइंट फोरम इनकी समस्या को लेकर पहली अप्रैल से आंदोलन पर उतरने की घोषणा कर चुके है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि :

अलीपुरद्वार लोकसभा सीट छठें लोकसभा चुनाव में यानि 1977 में अस्तित्व में आया। तब से लेकर लोकसभा चुनाव 2009 तक इस सीट पर रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी का कब्जा रहा था। पिछले लोकसभा चुनाव में यह सीट तृणमूल कांग्रेस के खाते में चली गयी। यह उत्तर बंगाल का एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है। पहले यह जलपाईगुड़ी जिला का हिस्सा था परंतु अब यह स्वतंत्र जिला बन गया है। यह सिक्किम, असम और उत्तर बंगाल का ऐसा जंक्शन है जहां पर्यटन के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक आते है। 2009 के परिसीमन पर नजर डाले तो इस लोकसभा में सात विधानसभा क्षेत्र आता है। इसमे तूफानगंज, कुमारग्राम, कालचीनी, अलीपुरद्वार, फालाकाटा, मदारीहाट और नागराकाटा आती है। अलीपुरद्वार को छोडृकर सभी विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित है।

सामाजिक ताना-बाना :

इस संसदीय क्षेत्र की कुल आबादी 2157949 है। इसमें 82.69 फीसदी लोग गांव में रहते है। यहां मात्र 17.39 लोग शहरी है। अलीपुरद्वार में वर्ष 2014 में आम चुनाव में 83 .3 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले थे। यहां तृणमूल कांग्रेस को 29.62 प्रतिशत और माकपा 27.45 प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा तीसरे स्थान पर थी।

 रिपोर्ट कार्ड

सांसद की रिपोर्ट कार्ड की बात करें तो बतौर लोकसभा संसद सदस्य दशरथ तिर्की ने लोकसभा में कोई सवाल नहीं किया। महज पांच वार ही बहस में हिस्सा लिया है। सदन में उपस्थित 80 प्रतिशत से ज्यादा रही है। संसद में कृषि और ग्रामीण क्षेत्र फंड मुहैया कराने, उत्तर बंगाल में चाय बागानों को बंद किए जाने, राज्य में बाढ़ पीड़ितों, आदिवासियों के विकास समेत विभिन्न मुद्दों पर पांच बार डिबेट में भाग ले चुके है। एक बार भी इसको लेकर प्राइवेट बिल नहीं ला पाए है।

Posted By: Preeti jha

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