[आर. विक्रम सिंह]। 15 अगस्त, 1947 को जब 10 डाउन एक्सप्रेस लाहौर से अमृतसर पहुंची तो कोई उतरा नहीं। दरवाजे खोले गए तो डिब्बों की फर्श पर चीर दी गई लाशें ही लाशें थीं। खून से तरबतर बोगियों से लाशें उतारी जा रही थीं और रेडियो पर नेहरू के शपथग्रहण के भाषण नियति से मुलाकात की रिकॉर्डिंग का प्रसारण हो रहा था। यह हमारी आजादी का पहला दिन था। अभी ऐसी और भी ट्रेनें आनी थीं।

जब हम गुलामी में थे तब चीन जापान से युद्ध के बाद फिर से गृहयुद्ध में था और जापान, जर्मनी विश्वयुद्ध के ध्वंस के बाद हमारी जैसी स्थिति में थे। वे सब अपनी अर्थव्यवस्था के पुर्निनर्माण में लग गए और हम समाजवाद, विश्वशांति, जातीय-भाषाई जागरण, यूनियनबाजी आदि में व्यस्त रहे। हमने राष्ट्रनिर्माण का कोई ठोस अभियान नहीं चलाया। क्षेत्र-भाषावार राज्य बनाए। फिर कश्मीर में युद्धविराम, 370/35 ए के साथ कश्मीर की समस्या खड़ी की।

नेहरू के 1950 में लियाकत पैक्ट ने भारत से प्रस्थान कर रहे अल्पसंख्यकों को तो यहीं रोक लिया, लेकिन हिंदुओं-सिखों को पाकिस्तान में धर्मांतरण, अपहरण एवं हत्याओं का शिकार होने के लिए लावारिस छोड़ दिया। इसके बाद हमने चीन से 1962 की पराजय देखी। 1957 तक नेहरूजी को पता ही नहीं था कि हमारी सीमाएं कहां हैं? पाकिस्तान से हुई वार्ताओं में विवाद समाप्त करने के लिए हम जम्मू-कश्मीर में और 1500 वर्गमील भूमि देने का मन बना रहे थे। यह तो संप्रभुता का हाल था।

1971 की महान सैन्य विजय को बनाया अर्थहीन

युद्धों में सेनाओं ने बलिदान देकर जो भूमि अधिकार में ली, हमने तुष्टीकरण का स्तर ऊंचा उठाते हुए वापस कर दी। 1971 की महान सैन्य विजय को हमने अर्थहीन बना दिया गया। जब देश सेक्युलर हुआ तो कॉमन सिविल कोड एक स्वाभाविक रास्ता था, लेकिन उस पर चलने से इन्कार किया गया। हमने अपनी राजनीतिक व्यवस्था ही ऐसी चुनी जिसमें 24 घंटे की राजनीति के अलावा और कुछ संभव ही नहीं था। क्षेत्र- जाति की राजनीति करने वाले अचानक अपने को गठबंधनों की सत्ता में शीर्ष पदों पर पाने लगे। आर्थिक मोर्चे पर हम एक स्थान पर खड़े कदमताल कर रहे थे। 

प्रधानमंत्री तक होने लगे बंधुआ 

यूनियनबाजों ने कानपुर से लेकर बंगाल तक देश के औद्योगिक वातावरण को ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हमारी विकास दर को हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ कहा गया। यह एक ऐसा दौर था जब प्रधानमंत्री तक बंधुआ होने लगे। जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री हुए तब कहीं जाकर यह देश उस दिशा में उन्मुख हुआ जिधर 1947 से ही चलना था। हमारे साथ चले जापान, जर्मनी आर्थिक महाशक्ति बन चुके थे। चीन भी तेजी से आगे जा रहा था। हम खानदानों को पकड़े बैठे थे। सूचना-क्रांति की समृद्धि के साथ बड़े-बड़े घोटाले भी आए। चीन हमारी सीमाओं में बढ़ता रहा, हम दोस्ती का स्वांग किए रहे। आतंकवाद का भयानक दौर भी आया। हमारी नियति यह तो नहीं थी।

2014 से शुरु हुआ बदलाव का दूसरा दौर

आंखें खुलीं तो हमारे सामने 1947 से चले आ रहे असंभव से सपनों की एक शृंखला थी। सवाल थे कि अनुच्छेद 370, धारा 35 ए का खात्मा और पीओके की वापसी कभी हो पाएगी? हमारी अर्थव्यवस्था जैसे चीन की पूरक अर्थव्यवस्था होती जा रही थी। सरकारी खर्च बढ़ाकर जीडीपी बढ़ाई जा रही थी। बैंकों को बड़े ऋण देने के लिए बाध्य किया जा रहा था। परिवर्तन की व्यग्र प्रतीक्षा के बीच बदलाव का दूसरा दौर 2014 से प्रारंभ हुआ। कर्मठता, जनसरोकार और समावेशी राष्ट्रवाद इस परिवर्तन की पहचान बने। समानांतर अर्थव्यवस्था और र्आिथक अपराध पर लगातार हमले जारी हैं। अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए इतिहास हो गई। जम्मू-कश्मीर अब केंद्र शासित प्रदेश है। नागरिकता विवाद समाप्त हुआ। वहां आतंकवाद अंतिम सांसें गिन रहा है और जनप्रतिनिधियों की नई पौध आ रही है। पीओके का जो लक्ष्य कभी दूर था वह दिखना प्रारंभ हो गया है।

राममंदिर का पुर्निनर्माण शताब्दियों की व्यग्रता

गुटनिरपेक्षता, राष्ट्रीय राजनीति में तुष्टीकरण, राज्यों में भाषा-जातिवादी आग्रह हमारा बेड़ा गर्क कर रहे थे। 2014 और फिर 2019 ने इसे बदल दिया है। विश्व की प्राचीनतम संस्कृति सभ्यता का देश अपनी संस्कृति को लेकर एक अपराधी के समान क्षमाप्रार्थी हो रहा था। राष्ट्र, संस्कृति की बात करने वाले नए अछूत बन गए थे। राममंदिर का पुर्निनर्माण शताब्दियों की व्यग्रता की परिणति है। बात-बात पर अपने को एटॉमिक पावर बताने वाले पाकिस्तान की सर्जिकल और बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद जो हैसियत है वह अब किसी से छिपी नहीं है। 

कॉमन सिविल कोड की दिशा में है चलना 

अभी चीन के साथ डोकलाम के बाद लद्दाख में बराबरी का मोर्चा लगा हुआ है। सेनाओं की जरूरतें बड़ी तेजी से पूरी की जा रही हैं। पहली बार सैन्य रणनीति की महत्ता को स्वीकार करते हुए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जैसा पद सृजित किया गया है। बहुत कुछ हुआ है और बहुत कुछ होना बाकी है। हमें अब कॉमन सिविल कोड की दिशा में चलना है। राजनीति का जाति- संप्रदायवाद एक बड़ी समस्या है। राज्यों तक सीमित राष्ट्रीय सरोकारविहीन भाषा- जाति आधारित परिवारवादी दल दूसरी बड़ी समस्या हैं। समग्र राष्ट्र की सोच जब उनके संविधान में ही नहीं है तो गठबंधन के केंद्रीय दायित्वों में वे अपना स्वार्थ सिद्ध करने के अतिरिक्त और क्या करेंगे? ये क्षत्रप राष्ट्रीय राजनीति को स्वहित के रिमोट से चलाते हैं। इनसे मुक्ति राष्ट्रपतीय लोकतंत्र के माध्यम से ही संभव है।

देश ने पीएम मोदी राष्ट्रपति के प्रत्याशी की तरह देखा

पिछले दो चुनावों की नजीर हमारे सामने है। देश ने स्थानीय उम्मीदवारों को तो वोट ही नहीं दिया, बल्कि मोदी को राष्ट्रपति के प्रत्याशी की तरह देखा। संसदीय लोकतंत्र राष्ट्रीय नेतृत्व की अपेक्षा नहीं करता। राष्ट्रपतीय प्रणाली चौबीसों घंटे की विभाजनकारी राजनीति के बजाय देश को जोड़ने वाली व्यवस्था साबित होगी, जबकि संसदीय प्रणाली प्राय: गठबंधन आधारित हो जाती है। सीधे जनता से पांच वर्ष के लिए चयनित राष्ट्रपति किसी का बंधुआ और क्षत्रपों से नियंत्रित नहीं होगा।

एक बात और। आजादी से पहले चलाए गए सामाजिक आजादी के भूले हुए अभियानों को अपनी पूर्णता पर पहुंचना है। इसी तरह हमारी धन और जनशक्ति का राष्ट्रनिर्माण में सदुपयोग होना है। इतने 15 अगस्त बीत गए। अब हम अपनी नियति की राह पर आए हैं। इस पर कायम रहना होगा। हमारी उम्मीदों को पंख लग जाना बहुत स्वाभाविक है, लेकिन इन उम्मीदों को पूरा करने में हमें भी हाथ बंटाना होगा।

(लेखक पूर्व सैनिक एवं पूर्व प्रशासक हैं)

Posted By: Dhyanendra Singh

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