नई दिल्ली [ तुफैल अहमद ]। लव जिहाद का जुमला हमारे राष्ट्रीय विमर्श में तेजी से अपनी जगह बनाता जा रहा है। इसका कारण तथाकथित लव जिहाद को लेकर रह-रह कर होने वाली घटनाएं हैैं। ताजा घटना मेरठ में घटी जहां लव जिहाद का आरोप लगाकर एक युवक की पुलिस की मौजूदगी में पिटाई हुई। इसके पहले दिल्ली में आयोजित पुस्तक मेले में लव जिहाद को बयान करने वाली एक पुस्तक ‘एक मुखौटा ऐसा भी’ बिकने के लिए आई। इस पुस्तक में लव जिहाद को बयान करने वाली कथित सच्ची कहानियां हैैं। हाल के समय में पश्चिम बंगाल के एक मुस्लिम मजदूर मोहम्मद अफरजुल की राजस्थान में हुई खौफनाक हत्या ने ‘लव जिहाद’ को व्यापक स्तर पर चर्चा में लाने का काम किया। राजस्थान के राजसमंद जिले में शंभूलाल रैगर ने न केवल अफरजुल की हत्या की, बल्कि उसके शरीर को आग की भेंट भी चढ़ा दिया, क्योंकि उसकी नजर में अफरजुल ‘लव जिहाद’ में लगा था। केरल की लड़की हदिया के मामले को भी लव जिहाद की मिसाल बताया जाता है जहां उसे मुस्लिम युवक से शादी के लिए धर्मांतरण करना पड़ा। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

लव जिहाद शब्द का ईजाद केरल की धरती पर हुआ

अब तमाम गैर-मुस्लिम परिवार लव जिहाद को लेकर चिंतित हुए जा रहे हैं। वैसे लव जिहाद शब्द का ईजाद केरल की धरती पर हुआ है। पहली बार इसका इस्तेमाल भी ईसाई समूहों ने किया था जो मुस्लिम युवाओं से शादी करने के लिए इच्छुक ईसाई युवतियों के बढ़ते मामलों से चिंतित थे। हाल के दौर में भाजपा-आरएसएस के कुछ नेताओं और हिंदू समूह चुनाव के समय हिंदू मतों को लामबंद करने के लिए लव जिहाद को सियासी हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल करते रहे हैं। ऐसे में यहां कुछ अहम सवाल खड़े होते हैं कि क्या लव जिहाद वास्तव में सही अभिव्यक्ति है? क्या यह भारतीय समाज का तानाबाना बिगाड़ सकता है?

मुसलमान सैन्य संघर्ष को ही जिहाद मानते हैं न कि आतंकी संगठनों द्वारा किया जाने वाला जिहाद
जिहाद के दो प्रकार हैं। गैर-मुस्लिमों के खिलाफ धर्मयुद्ध को भी मुसलमान जिहाद के रूप में लेते हैं। कुछ इस्लामिक विद्वानों ने कहा कि इस्लामिक सरकार ही जिहाद को मंजूरी दे सकती है। उनकी दलील है कि अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट और तालिबान जैसे संगठनों द्वारा किया जाने वाला तथाकथित जिहाद, जिहाद नहीं आतंकवाद है। वहीं दूसरे संदर्भ में जिहाद का अर्थ कुछ मुसलमान उस प्रक्रिया के रूप में भी लेते हैं जब कोई व्यक्ति भ्रष्ट और बुरी शक्ति के प्रभाव से अपनी रूह को पाक करने के लिए निजी स्तर पर संघर्ष करता है। जिहाद के ये दोनों अर्थ मान्य हैं, लेकिन मुसलमान मुख्य रूप से सैन्य संघर्ष को ही जिहाद मानते आए हैं।

जिहाद केवल सैन्य लड़ाई है तो फिर लव जिहाद क्या है?

23 जून, 2016 को पटना के एक उर्दू अखबार ने अपने संपादकीय में बद्र की लड़ाई का प्रशस्तिगान किया। यह हजरत मोहम्मद साहब की अगुआई में पहली इस्लामिक लड़ाई थी। संपादकीय में लिखा गया कि ‘यह इस्लाम और कुफ्र के बीच पहली लड़ाई थी जिसमें 313 चुनिंदा मुस्लिम लड़ाकों की टुकड़ी ने बद्र के मैदान में एक बड़ी सेना को धूल चटा दी थी।’ ऐसे में अगर जिहाद केवल सैन्य लड़ाई है तो फिर लव जिहाद क्या है? ऐसे में यही कहा जा सकता है कि ‘लव जिहाद’ वास्तव में एक गलत अभिव्यक्ति है, क्योंकि यह जिहाद की ऊपर बताई गई दोनों परिभाषाओं के खांचे में कहीं नहीं बैठती। लिहाजा इसका इस्तेमाल करना पूरी तरह गलत है, लेकिन भारत समेत दूसरे कई देशों में फिर भी इसका प्रयोग धड़ल्ले से बढ़ रहा है। इसका मजमून कुछ यही है कि हिंदू या ईसाई तबके की लड़कियों को मुस्लिम युवा से विवाह करने के लिए इस्लाम धर्म को अपनाना होगा।

विवाह के लिए मुस्लिम धर्म अपनाने को ही लव जिहाद का नाम दिया जा रहा है

यानी मुस्लिम पुरुष से शादी करने के लिए गैर-मुस्लिम लड़कियों के इस्लाम में धर्मांतरण को ही लव जिहाद का नाम दिया जा रहा है। हिंदू और ईसाई पुरुष इस चलन का हिस्सा नहीं हैं, जबकि ऐसे मामले भी सामने आते हैं जब किसी मुस्लिम लड़की से विवाह करने के लिए गैर-मुस्लिम पुरुष को भी इस्लाम अपनाना पड़ा। इसका यह भी अर्थ है कि दूसरे धर्म के लोगों से विवाह करने के लिए मुस्लिम उनका धर्म नहीं अपनाते। यानी यह इकहरा रास्ता है जिसकी राह केवल इस्लाम में धर्मांतरण के रूप में खुलती है। विवाह के लिए मुस्लिम धर्म अपनाने की इस इकहरी राह को अब लव जिहाद का नाम दिया जा रहा है। असल में किसी मुस्लिम से विवाह करने के लिए इस्लाम अपनाना जरूरी दस्तूर बन गया है। हालांकि इसमें कुछ अपवाद भी हैं विशेषकर उन मामलों में जहां युगल साम्यवादी विचारों को मानने वाले, नास्तिक या असल मायनों में सेक्युलर हों जो शादी के लिए धर्मांतरण नहीं करते। धर्मांतरण की इस एकतरफा राह को इस्लामिक धर्मगुरुओं द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है और ऐसा केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों में भी हो रहा है। ऐसे में ये मौलवी ही हैं जो मुसलमानों के खिलाफ उबलती भावनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

गैर-मुस्लिम लड़कियों को इस्लाम अपनाने के लिए बाध्य न करें
मैं मुस्लिम युवाओं से यही कहूंगा कि अगर वे गैर-मुस्लिम लड़कियों से वास्तव में प्रेम करते हैं तो उन्हें इस्लाम अपनाने के लिए बाध्य न करें। यदि आप गैर-मुस्लिम लड़की को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर करते हैं तो फिर यह प्रेम नहीं है। इस तरह आप प्रेमी से अधिक मौलवी ही हैं जो गैर-मुस्लिमों को मुसलमान बनाने के अभियान पर निकला है। ऐसे में मुसलमानों के प्रति बढ़ती हिकारत के लिए मौलवियों के साथ आप भी उतने ही जिम्मेदार हैं। विवाह के लिए हिंदुओं को इस्लाम धर्म अपनाने से कोई एतराज नहीं होता, अगर मुसलमान भी शादी के लिए हिंदू धर्म अपना रहे होते। मैं सभी युवाओं का आह्वान करता हूं कि वे जाति और धर्म से ऊपर उठकर सोचें। दूसरी जाति और धर्म के लोगों से प्रेम तो करो, लेकिन उसके लिए अपना धर्म न बदलें। प्रेम एक अनूठी और पवित्र अनुभूति है। जब हम किसी को प्रेम करते हैं तो एक इंसान के तौर पर यह हमारा दर्जा बढ़ा देता है। यह हमारे जीवन को सार्थक बनाता है। यदि आप विवाह के लिए इस्लाम या किसी अन्य धर्म को अपनाते हैं तो यह प्रेम नहीं, बल्कि यह आपकी आत्मा को उस धर्म का दास बनाने जैसा है। हिंदू और ईसाई लड़कियों से गुजारिश है कि वे ऐसे प्रेमजाल में न फंसे जहां विवाह के लिए इस्लाम को अपनाना अनिवार्य हो।

भारतीय गणतंत्र के कुछ मूल्य ऐसे हैं जिन पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता
भारत में तमाम लोग गरीब हैं जिनके पास रोटी, कपड़ा और मकान की उचित व्यवस्था नहीं है। साफ पेयजल तक मयस्सर नहीं है। यदि हम उन्हें वास्तव में गरीबी की जद से बाहर निकालना चाहते हैं तो भारत के सामाजिक तानेबाने को सहेजकर रखना होगा। शंभूलाल रैगर जैसे हत्यारों का समर्थन नहीं किया जा सकता। ऐसे लोग भारत के लिए खतरा हैं। भारतीय गणतंत्र के कुछ मूल्य ऐसे हैं जिन पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। कानून हाथ में लेने वाले या दूसरे समुदाय के प्रति हिंसा को बढ़ावा देने वाले शख्स को निश्चित रूप से सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए। समाज को भी ऐसे तत्वों का बहिष्कार करना चाहिए।


[ लेखक वाशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हैं ]

Edited By: Bhupendra Singh

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