डॉ. अशोक कुमार मिश्रा। Indian Education System: आखिरकर वह फैसला आ ही गया जिसका एक लंबे समय से इंतजार था। दरअसल यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने सात साल पहले वर्ष 2013 में छात्रों को एक ही समय में दो डिग्रियों की पढ़ाई एक साथ करने का मौका देने का मन बनाया था, जिसे अब जाकर अमलीजामा पहनाया गया है। इससे छात्रों को कई तरह के फायदे होंगे। वे रेगुलर डिग्री कोर्स के साथ ही ओपन या डिस्टेंस यूनिवसिर्टी से दूसरी डिग्री भी हासिल कर सकेंगे। अब छात्र एक ही समय पर अलग-अलग विधाओं के दो अलग-अलग डिग्री कोर्स कर सकते हैं। ये दोनों डिग्रियां पूरी तरह से मान्य होंगी। इसके लिए कुछ शर्तें भी हैं। इनमें से एक डिग्री नियमित कक्षा के रूप में होगी।

इसके लिए पाठ्यक्रमों में न्यूनतम निर्धारित उपस्थिति भी अनिवार्य होती है, इसलिए दूसरी डिग्री नियमित कक्षा के प्रारूप में देना संभव नहीं है। इस कारण दूसरी डिग्री ऑनलाइन डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम के तहत दी जाएगी। फिलहाल यह सुविधा केवल कॉलेज और यूनिर्विसटी स्तर पर पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए ही उपलब्ध होगी। यूजीसी के इस फैसले का निश्चित तौर पर स्वागत किया जाना चाहिए, परंतु इसके साथ ही कुछ संबंधित मुद्दों पर विचार करना भी आवश्यक है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि यूजीसी के इस फैसले से छात्रों के पास डिग्रियों की संख्या बढ़ जाएगी जिससे उनके लिए रोजगार के अवसर भी निश्चित तौर पर बढ़ जाएंगे। विभिन्न विधाओं वाले दो पाठ्यक्रमों की पढ़ाई करने से उनमें ज्ञान का विस्तार होगा। बदलते समय के अनुरूप वह अधिक जानकारियां हासिल कर पाएंगे। इससे समय की भी बचत होगी। साथ ही उनके लिए अपनी क्षमताओं को पहचानने और रोजगार के क्षेत्र में जारी प्रतिस्पर्धा के अनुरूप खुद को कसौटी पर परखने के अवसर बढ़ेंगे। वे अपने प्रदर्शन के आधार पर यह तय कर पाएंगे कि किस पाठ्यक्रम में उनका प्रदर्शन बेहतर है। इसके आधार पर वह भविष्य में अपना करियर चुन सकते हैं। इस फैसले के अपने कुछ खतरे भी हैं। सबसे बड़ा खतरा शैक्षिक स्तर का है। क्या दो डिग्री के अनुरूप छात्र-छात्राएं एक ही समय में वह ज्ञान अर्जित कर पाएंगे, जिसकी यूजीसी अपेक्षा करता है? विद्यार्थियों के पास डिग्रियां तो कई हो जाएंगी, लेकिन ज्ञान उनके अनुरूप नहीं हो पाया तो क्या बेरोजगारों की संख्या नहीं बढ़ेगी? इसलिए जरूरी है कि विश्वविद्यालयों में शैक्षिक गुणवत्ता बनाए रखने की दिशा में भी कुछ ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। खासतौर से व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। डिग्री को कारगर और रोजगारपरक बनाया जाना चाहिए, तभी उसका लाभ विद्यार्थियों को मिल पाएगा। इसका लाभ प्राइवेट अध्ययन करने वाले छात्रों को नहीं मिल पाएगा।

दरअसल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यह मानकर चल रहा है कि देश के कॉलेज और यूनिर्विसटी कैंपस में इस तरह का माहौल है कि वहां के विद्यार्थी दो डिग्रियों की पढ़ाई एक साथ करने में समर्थ हैं, जबकि अनेक कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों में स्थिति इसके उलट है। विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसरों में हिंसा अब गंभीर समस्या हो गई है। यूजीसी उच्च शिक्षा के परिसरों में शैक्षिक वातावरण सृजित करने पर जोर दे रहा है, लेकिन यहां होने वाली अराजक घटनाएं उसके मंसूबों पर पानी फेरती प्रतीत होती हैं। बेहतर पढ़ाई के लिए अनुशासन पहली शर्त होती है, लेकिन विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसरों में इसकी कमी दिखाई देती है। कभी छात्र राजनीति के चलते तो कभी शिक्षकों या कर्मचारियों के आंदोलन के कारण पढ़ाई में बाधा पैदा हो जाती है। कुछ स्थानों पर शिक्षकों की कमी विद्यार्थियों के लिए परेशानी का सबब बन जाती है। अनेक घटनाओं के संदर्भ और विश्वविद्यालयों की स्थितियों को देखते हुए आज यह विचार करना जरूरी है कि उच्च शैक्षिक परिसरों का माहौल आखिरकार कैसे इस तरह का बनाया जाए ताकि विद्यार्थी वहां पूर्ण मनोयोग से पढ़ाई कर सकें।

वास्तव में आज ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं जो ज्ञान के मंदिरों का माहौल दूषित कर रही हैं। उन घटनाओं को कैसे रोका जाए, यह विचारणीय प्रश्न है। मौजूदा दौर में उच्च शिक्षा में उपजी चुनौतियों से जुड़े सवालों के जवाब तलाशने होंगे। यह विचार करना होगा कि क्या उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का बेहतर माहौल है? क्या छात्रों की मानसिकता अध्ययन की है या उसमें कुछ भटकाव भी शामिल हो गया है? क्या शिक्षक वर्ग अपने दायित्वों का सही प्रकार निर्वाह कर रहे हैं? क्या छात्र राजनीति विश्वविद्यालयों का माहौल बिगाड़ रही है? क्यों नई पीढ़ी में डिग्री लेने के बाद भी कई बार निराशा की अधिकता और आत्मविश्वास की कमी होती है? मौजूदा दौर में यह जरूरी है कि विद्यार्थियों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान की जाए।

विश्वविद्यालय उन्हें जो डिग्री प्रदान करे उस क्षेत्र का उन्हें पर्याप्त सैद्धांतिक और व्यावहारिक ज्ञान होना चाहिए तभी वह कारगर सिद्ध हो पाएगी। कई बार विद्यार्थी के पास डिग्री तो होती, परंतु उसके ज्ञान का स्तर डिग्री के अनुरूप नहीं होता है जिससे उन्हें इस प्रतियोगी युग में विफलता का सामना करना पड़ता है जो उनके आत्मविश्वास को कमजोर करके उनमें निराशा का भाव जागृत कर देती है। हमें इन समस्याओं का समाधान भी तलाशना होगा।

[शिक्षाविद]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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