लखनऊ, सद्गुरु शरण। उत्तर प्रदेश का मौसम यूं तो बढ़िया है, आजकल। गुलाबी ठंड और गुनगुनी धूप। किसान धान बेचकर रबी की बोआई में व्यस्त हैं। बहरहाल, कुदरत की इस तमाम मेहरबानी के बावजूद बलिया से बुंदेलखंड तक उदासी भी पसरी हुई है। उन्नाव की एक बेटी के साथ जो हादसा हुआ, उसने सबकी आंखें नम कर दीं। आम-ओ-खास, सब आहत हैं। दुखी हैं। गुनहगार सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए हैं, पर बेटी की जिंदगी नहीं बचाई जा सकी। इसके विपरीत बेहद शातिराना अंदाज में कुछ आंखें चमक रही हैं। मीडिया के कैमरे तलाश रही हैं। उनके बॉडी लैंग्वेज से ऐसा लगता है, मानो यह हादसा उनके लिए अवसर जैसा है।

सत्ता और कुर्सी के सपने देखने की आदी नेता 

ये उन बड़े नेताओं की आंखें हैं जो हर वक्त सिर्फ सत्ता और कुर्सी के सपने देखने की आदी हैं। ऐसे कई नेता लोकसभा चुनाव के बाद से उदासी में डूबे चल रहे थे। कार्यकर्ताओं से मिलना-जुलना तक बंद कर रखा था। कई नेता दिल्ली से लखनऊ का रास्ता भूल गए थे। ऐसा लगने लगा था, मानो राजनीति से संन्यास ले लिया, पर उन्नाव का हादसा होते ही सब चैतन्य हो गए। दिल्ली वाले नेता झटपट लखनऊ आ गए और लखनऊ वाले नेता घर से निकलकर विधानभवन के द्वार तक आ पहुंचे। पीछे- पीछे कार्यकर्ताओं का हुजूम भी। कई महीने बाद नेताजी को सामने पाकर कार्यकर्ता धन्य हो गए और उत्साह में भ्रमवश 2012 से पहले वाले माइंडसेट में पहुंच गए। जीपीओ से लेकर भाजपा कार्यालय तक सपाई और कांग्रेसी शक्ति प्रदर्शन करने लगे। राहगीरों के साथ अभद्रता। जब अति हो गई तो पुलिस ने डंडे सीधे करके इनका बुखार उतारा।

दुष्कर्म मामले पर सियासी रोटियां सेंकते नेता

कुछ नेता पीड़ित परिवार के जख्म गहरे करने उन्नाव जा पहुंचे और फोटो-बाइट करके ही लौटे। नेता लगभग अभिनेता ही होते हैं। उन्हें पता था कि हादसे पर प्रदेश गमगीन है, इसलिए वे भी गमगीन होने का अभिनय कर रहे थे, पर आंखों की चमक बार-बार होठों के कोनों पर फूट रही थी। यह ठीक है कि आम आदमी की याददाश्त कमजोर होती है, पर इतनी भी कमजोर नहीं कि सपा संस्थापक का एक लड़की के दुष्कर्म हादसे पर सिर्फ कुछ वर्ष पहले वाला डायलॉग भूल जाए- ‘लड़कों से गलती हो जाती है।’ एक बड़े नेता की इस बेहयाई पर पूरी दुनिया ने थू-थू की थी, पर नेताजी या उनके उत्तराधिकारियों ने इसके लिए आज तक माफी नहीं मांगी।

सामाजिक शोक का अतिरेक विस्फोटक

यह दुस्साहस नेता के अलावा शायद ही कोई कर सके कि ऐसी घटिया बात को भूलकर लड़कियों के सम्मान-सुरक्षा पर बयानबाजी करे। कांग्रेस नेताओं ने तो जिंदा लड़कियां तंदूर में भी झोंकीं, इसके बावजूद उसके नेता लड़कियों की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। मायावती के व्यवहार पर सब अंगुलियां उठाते हैं, पर इस प्रकरण में उनका व्यवहार मर्यादित एवं संजीदगी भरा रहा। वह राज्यपाल से मिलीं और उन्नाव हादसे पर अपनी पार्टी की राय एवं मांग से सबंधित पत्र सौंपा। इस हादसे पर जितना दुखी और शर्मिंदा हुआ जाए, कम है। सामाजिक शोक का अतिरेक विस्फोटक भी हो सकता था, पर योगी सरकार की संवेदनशीलता एवं सूझबूझ ने हालात काबू कर लिए।

अंतिम संस्कार के समय प्रदेश सरकार के मंत्री मौजूद

इस प्रकरण में अपनी विचित्र कार्यशैली को लेकर उन्नाव पुलिस कठघरे में हैं, यद्यपि इसी पुलिस ने लड़की को आग के हवाले किए जाने की हृदय विदारक वारदात के बाद आरोपितों को आनन-फानन में दबोचकर सरकार की फजीहत किसी हद तक बचा ली। 90 फीसद जली लड़की बचाई नहीं जा सकी, पर लखनऊ और दिल्ली में उसे श्रेष्ठतम इलाज दिलाया गया। उसकी मृत्यु के बाद परिवार की सहायता के लिए भी सरकार तत्पर दिखी। अंतिम संस्कार के समय प्रदेश सरकार के मंत्री मौजूद रहे। लड़की के जीवन का अंत करके आग अपना वीभत्सतम रूप दिखाकर ठंडी पड़ चुकी थी, अन्यथा बाइट-कैमरा प्रेमी नेताओं ने इसे हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कहावत है कि जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते, वे इतिहास दोहराने को अभिशप्त होते हैं। उन्नाव हादसे की आंच पर सियासी रोटियां सेंकते नेताओं को देखकर लगा कि उन्होंने 2012, 2014, 2017 और 2019 के जनमत से कोई सबक नहीं सीखा। जाहिर है, ये दल और नेता 2022 और 2024 में इतिहास दोहराने को अभिशप्त हो रहे हैं। अभी भी समय है। हादसों को राजनीति का अवसर मानने की मानसिकता से उबरिए और उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की कवायद का हिस्सा बनिए।

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भावना और हिंदू-मुस्लिम समाज की राय के विपरीत मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करवाने की जिद पूरी कर ली। इस मुहिम में शामिल मुसलमानों के कुछ स्वयंभू नेताओं की मजबूरी समझी जा सकती है। वैसे इन नेताओं को अयोध्या के मुसलमानों ने इस छह दिसंबर को एक बार फिर आइना दिखा दिया, जब इनकी लाख कोशिश के बावजूद रामनगरी के मुसलमान शोक दिवस मनाने को राजी नहीं हुए। हिंदुओं ने कई दिन पहले ही शौर्य दिवस न मनाने की घोषणा कर दी थी। जिस हाशमी परिवार ने करीब 70 वर्ष बाबरी मस्जिद के लिए अदालती लड़ाई लड़ी, उसके मौजूदा मुखिया इकबाल अंसारी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद से ही इस राय पर कायम हैं कि यह फैसला देश के हित में है और इस पर पुनर्विचार याचिका जैसी कवायद उन कुछ लोगों की छटपटाहट मात्र है जो 1992 से अब तक इस मुद्दे पर धंधा-पानी चलाते रहे।

[स्थानीय संपादक, लखनऊ]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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