मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

जगमोहन सिंह राजपूत। पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव या उपचुनाव देश में कहीं न कहीं पूरे साल ही चलते रहते हैं। लोग यह भूल गए हैं कि हर पांच साल बाद केवल एक बार में ही हर स्तर के चुनाव संभव हैं और इससे जो समय, ऊर्जा तथा संसाधन बचेंगे उनका उपयोग देशहित में हो सकता है। तेलंगाना में विधानसभा चुनाव आम चुनावों के साथ होने थे। वहां के मुख्यमंत्री ने विधानसभा के चुनाव लोकसभा के चुनावों से पहले कराने में अपने लिए अधिक संभावनाएं देखीं और चुनाव पहले करा लिए। राजकीय कोष पर जो अतिरिक्त भार पड़ा, उस पर कोई सवाल उठाने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

इसी प्रकार कई बार लोग एक से अधिक जगहों से चुनाव लड़ते आए हैं। दोनों स्थानों से जीतने के बाद एक रिक्त करना पड़ता है, फिर उपचुनाव होता है उस पर जो व्यय/अपव्यय होता है उसकी न तो कोई जिम्मेवारी लेता है, न ही संविधान का कोई प्रावधान इसे रोकता है। इस प्रकार के सभी खर्चे उस करदाता के हिस्से में ही आते हैं जिसे लगातार समझाया जाता है कि अपना कर दायित्व समय से निभाते रहो, उसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य तथा विकास के लिए किया जाएगा। जब सामान्य नागरिक इस प्रकार के वैधानिक अपव्यय को देखता है तो उसे व्यवस्था के प्रति सम्मान बनाए रखने में कठिनाई होती है, उसका मनोबल भी प्रभावित होता है।

अब संविधान के ऐसे प्रावधानों को हटाना या उनमें संशोधन करना तो उन्हीं का उत्तरदायित्व है जो इनका लाभ उठाते हैं। कुछ महीने पहले लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर चर्चा प्रारंभ हुई थी। चूंकि यह सुझाव सत्तापक्ष से आया था अत: विपक्ष को जोरदार विरोध तो करना ही था। उन्होंने किया और चर्चा किसी भी सार्थक निष्कर्ष के बिना ही समाप्त हो गई। प्रजातंत्र का अर्थ अधिकांश नेताओं ने पक्ष-विपक्ष और समर्थन-विरोध तक सीमित कर दिया है। उनका मस्तिष्क चुनाव और सत्ता पर अर्जुन के लक्ष्य की तरह केंद्रित हो गया है। उनके लिए राष्ट्ररूपी वृक्ष पर सत्ता का फल लगा है और लक्ष्य केवल इस फल तक पहुंचना ही रह गया है। केवल फल चाहिए, वृक्ष की देखभाल और खाद-पानी से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है।

15 अगस्त, 1947 को सत्ता मुख्य रूप से उनके हाथों में आई थी जिनके त्याग और तपस्या से लोग परिचित थे, जिन्होंने अपरिग्रह का अर्थ समझा था, सिद्धांतों और मूल्यों को जिया था। ‘अपवाद छोड़कर’ उन लोगों के लिए देश सर्वोपरि था। जैसे-जैस सत्ता से लाभ कमाने की संभावनाएं उजागर हुईं, पीढ़ियां बदलीं, जनसेवा का स्थान गौण हो गया और व्यक्ति, परिवार तथा वंश प्राथमिकता पर आ गए। तब से लेकर अब तक देश ने बेशक प्रगति और विकास में महत्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त किए, मगर मानवीय और नैतिक मूल्यों का क्षरण हर तरफ दिखाई देने लगा। समाज का वह वर्ग जो गांधी जी के शब्दों में पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़ा था, बमुश्किल कुछ कदम ही आगे बढ़ पाया। करोड़ों लोगों को भुखमरी, गरीबी और बीमारी से निजात नहीं मिल पाई है।

आम चुनाव के समय तो मुख्य रूप से इस वर्ग के लिए किए गए कल्याणकारी कार्यों का विश्लेषण होना चाहिए। अगले पांच वर्ष उन्हें कैसे गति प्रदान की जाए, इस पर चर्चा होनी चाहिए। इस चर्चा में पक्ष-विपक्ष के लोग एक साथ बैठ कर विश्लेषण करें और प्राथमिकताएं निर्धारित करें। लोग स्वयं निर्धारित करें कि कौन अधिक कर्मठता और सेवा भाव से योजनाओं को आगे बढ़ा सकेगा और फिर निर्णय लें। यह असंभव नहीं है और प्रजातंत्र में इसकी मनाही भी नहीं है। केवल सक्षम और दूरदर्शी व्यक्तियों के आगे आने और प्रेरणा देने की जरूरत है।

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों के बीच जो बहस टीवी पर होती है उसका चुनावों पर भारी प्रभाव पड़ता है। ऐसी बहसें यदि यहां भी आयोजित होने लगें तो शायद शालीनता और भाषा के स्तर में लगातार होती जा रही गिरावट भी रुक सकेगी। कनाडा के प्रसिद्ध शिक्षाविद माइकल फुलान ने लिखा था, ‘परिवर्तन हर तरफ है, मगर प्रगति हर ओर नहीं है।’ इसके बाद उन्होंने यह भी जोड़ा था कि हर परिवर्तन प्रगति का द्योतक नहीं होता।

भारत में हुए परिवर्तन को आज विश्व सराह रहा है, मगर यह भी माना जा रहा कि बहुत कुछ जो किया जा सकता था, नहीं हो पाया है। यदि भ्रष्टाचार, घोटाले और सदाचार से दूरी न बढ़ी होती तो शायद आज देश में कोई भी गरीब नहीं होता, न गरीब के नाम पर अनेक चुनावों में बेशर्मी से राजनीति होती रहती। जिन युवाओं ने पहली बार गरीबी हटाओ का नारा सुना था, वे अब बूढ़े हो गए हैं। उनकी आगे की पीढ़ी फिर उस नारे को सुन रही है। देश में राजनीति का जो स्वरूप उभरा है और प्रजातंत्र केमूल्य में जो गिरावट आई है उसका दंश हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में झेल रहा है।

इस बार 17वीं बार लोकसभा चुनी जाएगी। आजादी के बाद की पीढ़ी के नेताओं और दलों में जनतंत्र के मूल सिद्धांतों के प्रति आस्था बढ़नी अपेक्षित थी। अपवादों को छोड़ दें तो ऐसा नेतृत्व विकसित नहीं हो पाया। चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित चुनाव खर्च की सीमा के अंदर कितने लोग चुनाव लड़ पाते हैं, लेकिन हिसाब सभी सीमा के अंदर का ही देते हैं। क्या यह अजूबा नहीं है? कहते हैं कुछ लोगों की उम्र बढ़ाती रहती है, मगर वे विरले ही होते हैं जो बड़े भी होते जाते हैं। कुछ ज्ञान और उसके सदुपयोग में आगे बढ़ते हुए बड़े बनते हैं, कुछ केवल उम्र दराज होते जाते हैं। प्र

सिद्ध विचारक नानी पालखीवाला ने अपने एक भाषण में कहा था कि बोझा ढोने वाले पशु के ऊपर यदि स्वर्ण भंडार लाद दिया जाए तो भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, वह वैसे हो चलेगा जैसे मिट्टी या अन्य कोई भार लेकर चलता है। उसके लिए तो हरी घास और उसे खाने के आनंद से बढ़कर कुछ नहीं हैं। जो मूल्य स्वतंत्रता संग्राम के समय देश ने स्वीकार किए थे वे उस स्वर्ण भंडार जैसे थे जो जनप्रतिनिधयों को सौंपा गया था। वे इसका महत्व समझ नहीं पाए। वे सत्ता के मद और धनसंग्रह में ही खो गए। सत्ता चाहिए और कैसे भी चाहिए। चुनाव जीतने के लिए जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने में कितने ही दल पूरा जोर लगा रहे हैं।

देश में आज वोट बैंक की राजनीति एक कड़वी सच्चाई है और इसे समाप्त करने के सारे प्रयास नाकाम हैं। इसके अलावा भी देश के समक्ष अनेक समस्याएं हैं जिन पर पक्ष-प्रतिपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप ही सामने आते हैं। एक राष्ट्र पक्ष भी सामने आना चाहिए। प्रजातंत्र में जनता और उसकी प्रतिनिधि विधायिका सर्वशक्तिमान है। देश को भुखमरी, गरीबी और बीमारी से राहत चाहिए। किसानों-मजदूरों को अपने अधिकार चाहिए। उन्हें निचले स्तर पर सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से निजात चाहिए। देश को ज्ञान, विज्ञान तथा तकनीकी विशेषज्ञ चाहिए, विद्वत वर्ग चाहिए, जनसेवा करने वाले भी चाहिए। दलगत राजनीति से अलग रहकर देशहित में सोचने वाले और कार्य करनेवाले भी चाहिए। इनको बढ़ाने के लिए संस्थान चाहिए। उन्हें स्वायत्तता चाहिए। वहीं से देशहित की योजनाएं प्रस्फुटित होनी चाहिए।

 (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)

 

Posted By: Dhyanendra Singh

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