हर्षवर्धन त्रिपाठी। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग और सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग मंत्री नितिन गडकरी कह रहे हैं कि दुनिया में कोई भी चीन में निवेश नहीं करना चाह रहा है और हमने अपने मंत्रलय में संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी को इस काम के लिए तैनात किया है ताकि विदेशी निवेश भारत में लाया जा सके। गडकरी ने कहा है कि चीन के प्रति दुनिया भर के अविश्वास का लाभ भारत को उठाना चाहिए। उन्होंने भरोसा जताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारत सरकार इस अवसर का लाभ उठाने में कामयाब होगी।

कंपनियों के लिए भारत सवरेत्तम स्थान : भारत सरकार में मंत्री होने के नाते नितिन गडकरी की यह सदिच्छा स्वाभाविक दिखती है और देश भी इसी तरह से देख रहा है कि चीन से कंपनियां जब बाहर निकलेंगी तो उनका स्वाभाविक ठिकाना भारत होगा। ताजा यूबीएस मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक चीन से बाहर जाने वाली कंपनियों के लिए भारत सर्वाधिक उपयुक्त स्थान हो सकता है। यूबीएस ने 500 बड़ी कंपनियों के बड़े अधिकारियों से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट जारी की थी। दुनिया की कई एजेंसियां भी यह मान रही हैं कि चीन से बाहर निकलने की इच्छा रखने वाली कंपनियों के लिए भारत सवरेत्तम स्थान हो सकता है, लेकिन केवल ऐसी सद्भावना रिपोर्ट से निवेश नहीं आता है।

चीन से निकलने वाली कंपनियां भारत कैसे आएंगी : चीन जैसे देश से कंपनियां अपनी इकाइयां भारत लेकर आएं, इसके लिए सबसे जरूरी है कि भारत सरकार चीन में निर्माण इकाई लगाने वाली कंपनियों की एक रिपोर्ट तैयार करे कि आखिर किन वजहों से ये कंपनियां चीन में जमी हुई हैं। सस्ता श्रम और नीतियों में एकरूपता के मामले में भारत चीन से प्रतिस्पर्धी हो चुका है, लेकिन क्या दूसरे मानकों पर भारत सरकार के विदेश और वित्त मंत्रलय के अधिकारियों ने ऐसी कोई रिपोर्ट तैयार की है। जवाब फिलहाल नहीं में ही दिख रहा और यहीं यह समस्या बड़ी होती दिखती है कि सिर्फ ऐसी रिपोर्ट से चीन से निकलने वाली कंपनियां भारत कैसे आएंगी।

चीन में कंपनियों ने भारी निवेश कर रखा : अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध के दौरान ही अमेरिकी, जापानी और दक्षिण कोरियाई कंपनियां चीन से बाहर निकलने की तैयारी करने लगी थीं। तभी भारत सरकार को यह तैयारी युद्धस्तर पर करनी चाहिए थी, लेकिन भारत सरकार उसमें सफल नहीं हो सकी। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राजनयिक स्तर पर अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और दूसरे देशों के साथ संबंध इतने बेहतर किए हैं कि सद्भावना के तहत इन देशों की कंपनियों की पहली प्राथमिकता भारत हो सकती है, लेकिन हमें समझना होगा कि बड़ी कंपनियां सद्भावना रिपोर्ट के आधार पर अपना निवेश एक देश से दूसरे देश में नहीं ले जाती हैं। खासकर चीन से कंपनियों को अपनी निर्माण इकाई दूसरे देश में ले जाना ज्यादा मुश्किल इसलिए भी है, क्योंकि चीन में कंपनियों ने भारी निवेश कर रखा है।

मेक इन इंडिया : अब जरा कुछ तथ्य देखिए। रीको ने बीते जुलाई में ही प्रिंटर उत्पादन इकाई को चीन के शेनङोन से थाईलैंड शिफ्ट कर दिया था। नाइकी वियतनाम और थाईलैंड के साथ भारत भी आने की संभावना तलाश रही है। ‘पैनासोनिक’ के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया था कि उनकी कंपनी चीन से बाहर जाने की संभावना तलाश रही है। जापानी वाहन निर्माता कंपनी माजदा ने चीन से अपना उत्पादन मेक्सिको इसी महामारी के बीच शिफ्ट कर लिया है। और यह सब इसके बावजूद हो रहा है कि भारत सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ के तहत विदेशी कंपनियों को भारत में लाने के लिए कॉरपोरेट टैक्स 35 प्रतिशत से घटाकर करीब 25 प्रतिशत कर दिया है। कई मामलों में तो यह 22 और नई कंपनियों के मामले में 15 प्रतिशत कर दिया है।

सरकार को अपनी नीति लागू करने में देर नहीं करनी चाहिए : भारत को एक और बड़ा लाभ सभी देशों के मुकाबले यह भी है कि भारत ऐसा मैन्यूफैक्चरिंग हब बन सकता है, जहां उत्पादन की खपत भी पूरी हो सकती है, क्योंकि दुनिया का सबसे बड़ा बाजार भी यहीं है। चीन के बाद भारत के पास ही इस तरह का बाजार है, लेकिन इस सबके बावजूद वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और थाईलैंड भारत से बाजी मार ले जा रहे हैं तो इसका सीधा दोष सरकारी नीतियों को लागू करने में शिथिलता पर ही जाएगा। चीन से ढेर सारी कंपनियां बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं। कंपनियों ने चीन में इतना भारी निवेश कर रखा है कि एक साथ वहां से निकलना संभव नहीं, इसलिए कंपनियां दूसरे देशों में अपना छोटी-बड़ी आधार इकाई लगा रही हैं। फिलहाल शुरुआती इकाई लगाने के लिए चीन से निकलने वाली कंपनियां भारत के मुकाबले वियतनाम, मलेशिया और सिंगापुर को तरजीह दे रही हैं। भारत की प्राथमिकता थाईलैंड और फिलीपींस जैसे देशों से बस थोड़ा ही ऊपर है। नोमुरा की रिपोर्ट बता रही है कि भारत सरकार को अपनी नीति बनाने और उसे लागू करने में देर नहीं करनी चाहिए, वरना उसे बड़ी हानि हो सकती है।

अभी चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियां अगर भारत नहीं आ रही हैं तो उसकी एक बहुत बड़ी वजह यह भी है कि ये कंपनियां भारतीय कंपनियों से बात करती हैं तो पता चल रहा है कि फिलहाल यहां कारोबार कब शुरू होगा, इस बारे में कोई स्पष्टता ही नहीं है। इसलिए जरूरी है कि सरकार, चीन से बाहर निकल रही कंपनियों को भारत लाने के लिए देश में कारोबार को चरणबद्ध तरीके से शुरू करे। बदलते विश्व में भारत को ऐतिहासिक अवसर मिल रहा है। यह अवसर चूके तो हम कभी विश्व गुरु थे, यह बताएंगे और यह अवसर चुनौती की तरह लेकर अपने पक्ष में कर लिया तो विश्व गुरु भारत को दुनिया मान लेगी।

इस ऐतिहासिक अवसर को भारत के पक्ष में कैसे बदलना है, इसकी योजना बनाकर लागू करने के लिए ही जनता ने प्रचंड बहुमत से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर चुना है। चीन से बाहर अपना कारोबार शुरू करने वाली कंपनियां भारत की ओर रुख कर सकती हैं, लेकिन इसके लिए सही नीति बनाते हुए उनसे बातचीत करनी होगी और तत्काल आर्थिक गतिविधियां शुरू होने का भरोसा दिलाना होगा।

[वरिष्ठ पत्रकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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