[ सैयद अता हसनैन ]: तमाम सलाह-मशविरों के उलट अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी भावनाओं पर ही अधिक भरोसा किया। उन्होंने तीस दिनों के भीतर सीरिया से 2,000 अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का निर्णय किया। इसके बाद अफगानिस्तान में तैनात 14,000 अमेरिकी सुरक्षाकर्मियों में से आधों की वापसी पर मुहर लगाई। उनके ये फैसले अनपेक्षित बिल्कुल नहीं थे, क्योंकि ट्रंप के सामने चुनावी वादे पूरे करने की चुनौती है और राष्ट्रपति चुनाव में एक साल का वक्त ही शेष है। ट्रंप ने यह निर्णय तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन से 14 दिसंबर को हुई बातचीत के बाद लिया जिसमें एर्दोगन ने अमेरिकी राष्ट्रपति को यही समझाने की कोशिश की कि वह तुर्की को अपना प्रतिनिधि बनाकर इस लड़ाई को नाटो पर छोड़ दें। सीरियाई गृह युद्ध कई शक्तियों की पहेली में उलझ गया है। इसमें एक ओर तो सीरियाई सरकार है जिसमें रूस, ईरान और हिजबुल्ला उसके अंतरराष्ट्रीय सहयोगी हैं। दूसरे मोर्चे पर सुन्नी विद्रोहियों का समूह है जिसे सीरियाई मुक्ति सेना कहा जाता है। इसमें कुर्दिश सीरियाई जनतांत्रिक बल (एसडीएफ), अल नुसरा फ्रंट जैसे सलाफी समूह और इस्लामिक स्टेट यानी आइएस जैसे धड़े शामिल हैं। 

इसमें एसडीएफ कुर्दिश लड़ाकों और सीरियाई मुक्ति सेना को अमेरिका का साथ मिला हुआ है। वहीं आइएस के खिलाफ संघर्ष में भी एसडीएफ अमेरिका का सबसे सक्षम साथी साबित हुआ है। हालांकि आइएस पर एसडीएफ की जीत को तुर्की की वैसी मान्यता नहीं मिली है। ऐसे में यह समझना होगा कि यह सामान्य किस्म का गृहयुद्ध नहीं है जहां सरकारें विद्रोहियों के अलग-अलग गुटों के साथ खुद को जोड़ रही है। वहां कोई निश्चिंत नहीं हो सकता कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन? यह देखने की बात है कि ट्रंप का यह निर्णय पश्चिम एशिया और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को कैसे प्रभावित करेगा? क्या आइएस की अस्पष्ट हार के बाद पश्चिम एशिया और वहां से यूरोप और संभवत: अमेरिका तक फैलते आतंक पर अंकुश लगेगा? क्या 2,000 अमेरिकी सलाहकार और सैनिक इस हालात में मायने रखते हैं? क्या इस लड़ाई में किसी एक पक्ष के पीछे हटने से इलाके में स्थिरता आएगी? और अमेरिका के पीछे हटने के बाद बने हालात में किसका वर्चस्व रहेगा? 

अमेरिकी जनता से किए वादे के अलावा अपनी स्व-घोषित जीत ट्रंप द्वारा कदम पीछे खींचने की मुख्य वजह है। सीरिया जैसे हालात में कोई भी पक्ष जीत या हार का दावा नहीं कर सकता। इराक में कई पक्षों के हाथों आइएस की हार, सीरिया में आइएस के मजबूत गढ़ रक्का में उसके पर कतर देने से आइएस आतंकियों के तेवर पस्त पड़ गए और अब नए सिरे से जंग छेड़ने की उनकी क्षमता संदिग्ध दिखती है। हालांकि अपने नेटवर्क और अन्य संसाधनों के दम पर वह कुछ हद तक अभी भी सक्षम है। लड़ाकू क्षमता के लिहाज से अमेरिका की नगण्य मौजूदगी के बावजूद उसके होने से सीरियाई मुक्ति सेना को एक पेशेवर सेना का साथ मिलता जो कुर्दिश एसडीएफ की जुगलबंदी से अपना रंग जमा सकता था। दोनों का एक ही मकसद है कि आइएस के उभार को रोका जाए और सीरिया में सही सरकार की राह साफ की जाए। 

सीरिया के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जेम्स जेफ्री ने दो महीने पहले कहा था कि अमेरिका कूटनीतिक पहल के लिए भी मोर्चे पर टिका रहेगा भले ही सीरियाई सेना इदलिब पर हमले की तैयारी कर रही हो जो सीरियाई विद्रोहियों का आखिरी मजबूत गढ़ बचा है। अमेरिकी वापसी का अर्थ यह नहीं कि इससे कूटनीतिक और रसद सहयोग की कड़ी भी टूट जाएगी, अलबत्ता नियोजन और प्रशिक्षण के मोर्चे पर जरूर उसकी कमी महसूस होगी। इसमें सीरियाई सरकार, ईरान और रूस मिलकर विद्रोहियों को कुचल सकते हैं। वहीं तुर्की भी कुर्दिश एसडीएफ के खिलाफ लड़ाई में उतर सकता है।

अभी तक अमेरिकी मौजूदगी तुर्की की ऐसी सक्रियता को रोके हुए थी। नए साल में उभरते इस जटिल परिदृश्य में संभव है कि सीरियाई सरकार-रूस-ईरान की तिकड़ी को लाभ मिल जाए। अमेरिका की गै-रमौजूदगी में ऐसे लाभ से संदेह भी नहीं। हालांकि स्पष्ट जीत का कोई दावा नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे जटिल हालात में बाजी कभी भी पलट सकती है। चूंकि सीरियाई सरकार इदलिब पर सख्ती करने जा रही है तो वहां से भारी तादाद में विस्थापितों के निकलने का अनुमान है। यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ये विस्थापित लोग कहां शरण लेंगे और यूरोपीय देश सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर उन्हें लेकर फिर से उदारता दिखाएंगे। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि बशर अल असद की सेना विद्रोहियों से निपटने के लिए रासायनिक हथियारों का प्रयोग नहीं करेगी। इससे सैन्य और कूटनीतिक दोनों ही मोर्चों पर अशांति उत्पन्न होगी। तीसरा पहलू एसडीएफ और कुर्दों से जुड़ा हुआ है जिसके बारे में भी निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। 

ऐसी अनिश्चितता के बावजूद शियों की ताकत के दम पर ईरान यहां अस्थाई रूप से फायदे में हो सकता है। हालांकि इस इलाके के दो और खिलाड़ी इजरायल और सऊदी अरब भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहेंगे। वे ट्रंप के फैसले से भी खुश नहीं होंगे। परस्पर हितों और अमेरिका के परोक्ष सहयोग से वे अमेरिका की जगह लेने की कोशिश भी कर सकते हैं। इसमें उनका मकसद यही होगा कि क्षेत्र में ईरान-हिजबुल्ला का वर्चस्व जरूरत से ज्यादा न बढ़े। 

लगता है कि रूस को हासिल होती बढ़त पर ट्रंप ने बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अब अमेरिका-सऊदी-इजरायल की तिकड़ी के बजाय पलड़ा रूस-ईरान-सीरिया की ओर झुकेगा। ईरान के लिए फायदे की गुंजाइश को देखते हुए ट्रंप का यह निर्णय कुछ कम ही तार्किक लगता है। इराक में 5,000 अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी उसे स्थिरता प्रदान कर रही है। क्या फिर से राष्ट्रपति चुने जाने के मोह में ट्रंप अपनी इस जिम्मेदारी से भी मुंह चुराएंगे? इराक में स्थिरता के बिना ही वर्ष 2011 में अमेरिकी फौजों की समय से पहले वापसी के राष्ट्रपति ओबामा के फैसले की अनदेखी नहीं की जा सकती। इराक में आइएस की गतिविधियों के लिए यह अमेरिकी फैसला भी जिम्मेदार है। सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की विदाई से पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और अनिश्चित हो जाएगी।

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य कटौती और अफगान सरकार एवं अफगान सेना पर दबाव की आशंका से नए साल में पश्चिम और दक्षिण एशियाई क्षेत्र अस्थिरता की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। यहां के लोगों की सुरक्षा पर संकट मंडराता दिख रहा है। सही मायनों में 2019 दुनिया के लिए सामरिक रूप से एक अहम साल साबित होने जा रहा है।

[ लेखक सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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