[अभिषेक कुमार सिंह]। हाल में (27 नवंबर, 2019 को) इसरो ने अंतरिक्ष से धरती के चप्पे-चप्पे की निगरानी के लिए अपने प्रतिष्ठित रॉकेट पीएसएलवी-सी47 से कार्टोसैट-3 नामक सेटेलाइट को उसकी कक्षा (ऑर्बिट) में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। कार्टोसैट सीरीज का यह नौंवा उपग्रह है। कार्टोसैट सीरीज की शुरुआत वर्ष 2005 में हुई थी, लेकिन सैन्य महत्व के उपग्रहों के सिलसिले की बात करें तो इसका आरंभ वर्ष 2007 में कार्टोसैट-2ए के प्रक्षेपण से हुआ था।

यह दोहरे उपयोग वाला उपग्रह था जो मौसम की जानकारियां बटोरने के साथ भारत के अड़ोस-पड़ोस में मिसाइलों की हर गतिविधि पर नजर रख सकता था। इसके बाद जून 2012 में छोड़े गए कार्टोसैट-2सी से पड़ोसी देशों के संवेदनशील ठिकानों के वीडियो रिकॉर्ड करने और उसका विश्लेषण कर उन्हें वापस धरती पर भेजने की सुविधा देश को मिल गई। इसी सीरीज में अगला उपग्रह कार्टोसैट-2ई था जो जून 2017 में छोड़ा गया।

सरहदों की निगरानी सुदूर अंतरिक्ष से

बेशक कार्टोसैट सीरीज के नए उपग्रह के प्रक्षेपण की कामयाबी का महत्व इसरो से ज्यादा देश के लिए है जिसे आस-पड़ोस से आतंकी घुसपैठ जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। यह मामला असल में इलेक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस की वह व्यवस्था बनाने का है जिसमें जमीनी सरहदों की निगरानी सुदूर अंतरिक्ष से की जा सकती है। जब देश एक बार कार्टोसैट और इस जैसे निगरानी उपग्रहों की पूरी शृंखला अंतरिक्ष में तैनात कर देगा, तब कहा जा सकेगा कि बुरे इरादों वाले पड़ोसी देशों से किसी भी आतंकी का हमारी जमीन पर आना नामुमकिन हो जाएगा और ऐसे में आतंक की वह विषबेल स्वत: ही सूख जाएगी, जिसे छद्म युद्ध की नीति के तहत शत्रु देश पालते-पोसते आए हैं।

इलेक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस तकनीक से लैस यह सेटेलाइट

पांच साल के जीवनकाल वाला कार्टोसैट-3 तीसरी पीढ़ी का बेहद चुस्त और उन्नत उपग्रह है जिसमें हाई रिजॉल्यूशन तस्वीर लेने की क्षमता है। इसका भार 1,625 किलोग्राम है और यह बड़े पैमाने पर शहरों की प्लानिंग, ग्रामीण संसाधन और बुनियादी ढांचे के विकास, तटीय जमीन के इस्तेमाल और जमीन के लिए उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग को पूरा करेगा। इलेक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस तकनीक से लैस यह सेटेलाइट धरती के किसी भी इलाके का इलेक्ट्रो- मैग्नेटिक स्पेक्ट्रम नाप सकेगा।

इस खूबी से यह सेटेलाइट सैकड़ों किलोमीटर की ऊंचाई पर रहते हुए जमीन पर कम्युनिकेशन सिस्टम, रडार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के सिग्नल पकड़ सकेगा। यह तकनीक दुश्मन देश के रडार को ढूंढने में मददगार होगी। इस तरह यह सेटेलाइट भारत के जंगी विमानों को दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की निगाह में आने से बचा सकेगा। इन्हीं खूबियों के चलते कार्टोसैट-3 को भारत की आंख भी कहा जा रहा है।

अभी जारी है सिलसिला

कार्टोसैट-3 के प्रक्षेपण के साथ ही इसरो ने सीमाई इलाकों की निगरानी के लिए जल्द ही एक और सेटेलाइट छोड़ने का एलान किया है। इसरो की योजना के मुताबिक आगामी 11 दिसंबर को श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-सी48 रॉकेट की मदद से रीसैट-2बीआर1 नामक उपग्रह का प्रक्षेपण किया जाएगा जो इस (रीसैट) शृंखला का दूसरा सेटेलाइट होगा। इस सीरीज में इस साल 22 मई को रीसैट सीरीज का पहला उपग्रह छोड़ा गया था। इस शृंखला में 4 से 5 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया जाना है, ताकि सरहदी इलाकों की रोजाना निगरानी हो सके।

उल्लेखनीय है कि उड़ी हमले के बाद सितंबर, 2016 में जब भारतीय सेना ने विख्यात सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था तो उसमें एक अहम रोल कार्टोसैट सीरीज के उपग्रहों ने भी निभाया था। हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने इन उपग्रहों से लिए गए उच्च गुणवत्ता के फोटो उपलब्ध कराए थे, जिनके विश्लेषण के बाद सेना को जमीनी हालात का आकलन करने और हमले की सर्वाधिक उपयुक्त जगह एवं समय का चुनाव करने में मदद मिली थी।

बात चाहे कार्टोसैट की हो या रीसैट की, इनमें लगे कुछ खास उपकरण अंतरिक्ष से पृथ्वी के विभिन्न इलाकों की बेहद बारीकी से फोटो लेना मुमकिन बनाते हैं। सर्विलांस सेटेलाइट कहलाने वाले इन उपग्रहों में एक विशेष एक्स- बैंड सिंथेटिक अपरचर रडार लगा होता है। यह रडार असल में इजरायली सिस्टम टेकसार-1 का संशोधित और देसी विकल्प है जिससे एक बार में धरती के 5 से 10 किलोमीटर के इलाके में मौजूद वस्तुओं की पहचान की जा सकती है। इतनी सूक्ष्मता से मिलने वाली जानकारी का अर्थ यह है कि दुश्मन देश की सैन्य हलचलों से लेकर आतंकियों की हर गतिविधि का समय रहते पता लग सकता है।

भारत के आंख-कान

शत्रु को परास्त करने का एक आसान तरीका यह है कि उसकी तैयारियों और उसके मंसूबों का पहले से अंदाजा लगा लेना। प्राचीन समय से ही कई युद्ध इसी कौशल से जीते गए हैं। हालांकि तब ऐसे काम गुप्तचर किया करते थे। गुप्तचरों और खुफिया एजेंसियों की भूमिका अभी भी खत्म नहीं हुई है, लेकिन इस क्षेत्र में चुनौतियां इतनी ज्यादा बढ़ गई हैं कि दुश्मन देशों में हमारे खिलाफ हो रही गतिविधियों की टोह लेना आसान नहीं रह गया है। रणनीतिक स्तर पर शत्रु देशों की तैयारियों का पता लगाने का काम हालांकि अब भी खुफिया तंत्र को ही करना पड़ता है, लेकिन टेरर कैंपों की हलचलों और युद्धक तैयारियों का एक ठोस आकलन आसमानी निगरानी से हो सकता है।

यह काम सिर्फ विमानों और ड्रोन्स के जरिये संभव नहीं है, क्योंकि वे आसानी से शत्रु देश की निगाह में आ जाते हैं और पकड़ में आने पर उन्हें नष्ट किया जा सकता है। ऐसे में एक ही सूरत बचती है कि दुश्मन इलाकों पर अंतरिक्ष से नजर रखी जाए। इसके लिए इसरो ने पिछले कुछ अरसे में अंतरिक्ष में तमाम निगरानी उपग्रहों की जिस तरह तैनाती की है, वे असल में भारत के आंख-कान बन गए हैं।

अक्सर दो देशों के बीच सैन्य संतुलन का आकलन करते समय सैनिकों की तादाद, जंगी जहाजों, विमानों, मिसाइलों और टैंकों आदि की गणना ही होती है, उनमें अंतरिक्ष में तैनात सर्विलांस सेटेलाइटों की गिनती नहीं होती है, लेकिन भारत के अगल- बगल शत्रु इरादों वाले पड़ोसियों की मौजूदगी के मद्देनजर ऐसे उपग्रहों की कीमत किसी भी सैन्य साजोसामान से ज्यादा ही ठहरेगी।

पूरे पाकिस्तान पर निगाह

अगर पाकिस्तान पिछले कुछ अरसे से भारत पर हमले की सिर्फ बंदरघुड़की देने और छद्म युद्ध छेड़ने तक ही सीमित होकर रह गया है तो इसके पीछे एक अहम तथ्य यह है कि भारत अपने निगरानी उपग्रहों के जरिये पाकिस्तान के 87 फीसद क्षेत्र यानी कुल 8.8 लाख वर्ग किलोमीटर में से 7.7 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके पर पैनी नजर रखने में सक्षम हो गया है। इससे भारत जब चाहे पाकिस्तान के महत्वपूर्ण सामरिक इलाकों की गतिविधियों को देख सकता है और अपने उपग्रहों के जरिये महत्वपूर्ण नक्शे और तस्वीरें हासिल कर सकता है।

सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि पिछले पांच-छह वर्षों में इसरो ने कई ऐसे सेटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित किए हैं, जिनकी मदद से भारत की क्षमता आस-पड़ोस के 14 देशों के करीब साढ़े 5 करोड़ वर्ग किलोमीटर दायरे वाले भूभाग पर सूक्ष्म नजर रखने की बन चुकी है। खुद सेना यह स्वीकार करती है कि देश की सरहदों से लेकर पड़ोसी मुल्कों की जमीन पर हो रही गतिविधियों पर करीबी नजर रखने संबंधी जरूरतों का 70 फीसद हिस्सा इसरो के सेटेलाइट पूरा कर देते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस वक्त इसरो के कम से कम 10 उपग्रह ऐसे हैं जो देश की सैन्य और खुफिया जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। इनमें खास तौर से कार्टोसैट सीरीज, जीसैट-7, जीसैट-7ए, आइआरएनएसएस यानी इंडियन रीजनल नैविगेशन सेटेलाइट सिस्टम, माइक्रोसैट, आरआइसैट और हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग यानी हाइसिस सेटेलाइट का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

[संस्था एफआइएस ग्लोबल से संबद्ध]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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