इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा का नया सत्र शुरू हो चुका है। इस सत्र में भी देश के सभी राज्यों में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रह गई हैं। इस बार पूरे देश में साढ़े तीन लाख से ज्यादा सीटें खाली रह गई हैं। राजस्थान में तो आधी से अधिक, लगभग 35 हजार सीटें खाली रह गईं। यही हाल उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्यों का भी है। पिछले साल इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा के सत्र में पूरे देश में ढाई लाख से ज्यादा सीटें खाली रह गई थीं। इनमें अकेले उत्तर प्रदेश में 70 हजार सीटें खाली थीं। देश में तकनीकी शिक्षा के हालात साल दर साल खराब होते जा रहे हैं और सरकार की तरफ से इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। तकनीकी शिक्षा की यह उपेक्षा सीधे-सीधे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी।

इस बात पर विचार होना ही चाहिए कि लोगों का रुझान इंजीनियरिंग में कम क्यों हो रहा है और इतनी सीटें खाली क्यों रह रही है? अगर कोई कमी है तो उसे दूर कैसे किया जाए? यह मंथन इस समय इसलिए और भी ज्यादा जरूरी है क्योंकि नया सत्र शुरू हो चुका है। सरकार का सारा ध्यान आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थानों पर रहता है, जबकि देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की उपेक्षा की जाती है। देश में 95 प्रतिशत इंजीनियर निजी कॉलेज ही पैदा करते हैं। अगर इनकी दशा खराब होगी तो इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा।

इस समस्या की जड़ पर नजर डालें तो पता चलता है कि इंजीनियरिंग स्नातकों में बेरोजगारी बढ़ी है या उन्हें अपनी डिग्री और योग्यता के अनुरूप नौकरी नहीं मिली। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि उद्योगों और संस्थानों के बीच मांग और आपूर्ति में फासला बढ़ा है। बेरोजगार और अप्रशिक्षित इंजीनियरिंग स्नातकों की एक पूरी फौज खड़ी हो गई है। भारत को सुपरपावर बनाने के लिए इस बात की जरूरत है कि उद्योग और शैक्षिक संस्थान एक धरातल पर काम करें। पिछले दिनों इन्फोसिस के संस्थापक और आइटी दिग्गज नारायणमूर्ति ने कहा था कि सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग को प्रशिक्षित इंजीनियर नहीं मिलते। आज जरूरत इस बात की है कि इंजीनियरिंग छात्रों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान भी मिले। अभी तक यह सुविधा केवल मेडिकल क्षेत्र में ही उपलब्ध है। वहां छात्र पढ़ाई के दौरान व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है। इंजीनियरिंग कॉलेजों का उद्योगों से जुड़ाव जरूरी है। इससे इस क्षेत्र में शोध और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। कॉलेज के विद्यार्थियों को उद्योग जगत के प्रोजेक्ट पर काम कराया जाए, जिससे वे जमीनी धरातल पर समस्याओं का निराकरण करने में सक्षम हो सकें। इससे छात्रों की बौद्धिक क्षमता, प्रखरता और मौलिकता में भी वृद्धि होगी। इसके लिए इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम का आधुनिकीकरण करना भी जरूरी है। भारत के इंजीनियरिंग कॉलेजों में पाठ्यक्रम कम से कम दो दशक पुराने हैं, इसलिए उद्योग जगत की आज की जरूरत के हिसाब से छात्रों को नवीनतम ज्ञान नहीं मिल पाता है। इसी वजह से आज इंजीनियरिंग स्नातक के लिए नौकरी पाना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। इंजीनियरिंग की शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थी कल के देश निर्माता हैं और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने का दायित्व भी इन्हीं पर है। हम सबका दायित्व है कि इंजीनियरिंग के छात्रों को ऐसी शिक्षा मिले जिससे वे अपने जीवन में न केवल देश को, बल्कि विश्व को भी नई राह दिखा सकें और आने वाली चुनौतियों का निराकरण भी कर सकें। छात्रों को उत्कृष्ट शिक्षा देने के लिए आधुनिक यंत्रों, उपकरणों के माध्यम से प्रायोगिक शिक्षा देने का प्रयास प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। अभी सारा ध्यान थ्योरी पर है। छात्र फार्मूलों को रटकर अच्छे नंबर हासिल करने के प्रयास में रहते हैं। उद्योग और शैक्षिक संस्थानों के मध्य एक साझा प्लेटफॉर्म स्थापित करने की दिशा में सरकारी और निजी दोनों स्तर पर प्रयास जरूरी हैं, जिससे कॉलेज के विद्यार्थियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के औद्योगिक विशेषज्ञों के निर्देशन में प्रशिक्षण प्राप्त करने का मौका मिल सके। इससे रोजगार के अवसर के साथ-साथ छात्रों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।

आज तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक प्रशिक्षण की जरूरत बनी हुई है। प्रशिक्षण का सीधा संबंध रोजगार से है। छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इंजीनियरिंग छात्र अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर बैठे अपने विषय से संबंधित प्रोजेक्ट्स पर काम करें तो उन्हें अच्छा-खासा अनुभव होगा और साथ ही वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी होंगे। व्यवस्था ऐसी हो कि छात्र उद्योग से सीधे जुड़ें, तभी वे खुद को उद्योग जगत की जरूरत के मुताबिक ढाल पाएंगे। छात्रों की पढ़ाई में जो कमी रह जाती है, वह व्यावहारिक ज्ञान से पूरी हो जाएगी।

छात्रों को प्रशिक्षण और जिम्मेदारी देने से उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। साथ ही उनकी मेधा और प्रतिभा निखर कर सामने आएगी। तकनीकी शिक्षा में दिलचस्पी कम होने का सीधा संबंध रोजगार के घटते अवसरों से है। यदि छात्रों को रोजगार के मौके मिलेंगे तो इंजीनियरिंग के प्रति उनका रुझान बढ़ेगा और साथ में देश में तकनीकी शिक्षा की सभी सीटें भी भरेंगी। यह देश के सर्वागीण विकास और अर्थव्यवस्था के लिए सहायक होगा और भविष्य में विकसित भारत के सपने को पूरा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

[लेखक शशांक द्विवेदी, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

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