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[2जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक नजीर के रूप में देख रहे हैं सुभाष कश्यप]

2जी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दूरगामी प्रभाव वाला है और यह सरकार के साथ-साथ देश व संसद के लिए एक संदेश है कि अब भ्रष्टाचार को और अधिक सहन नहीं किया जा सकता। यहां इस बात को भी समझना जरूरी है कि फैसले को ए. राजा के खिलाफ दिया गया निर्णय नहीं माना जा सकता, क्योंकि उनका मामला अभी भी विचाराधीन है और उस पर अलग से फैसला आना है, लेकिन जिस तरह 122 स्पेक्ट्रम लाइसेंस को रद्द करने का आदेश अदालत ने दिया है उससे साफ है कि स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही है और इसमें घोटाला हुआ है। इसमें कितने का घोटाला हुआ और कौन-कौन दोषी है, यह एक अलग मसला है, लेकिन इस घोटाले के लिए संप्रग सरकार की सामूहिक विफलता को इंगित करना सर्वोच्च न्यायालय नहीं भूला। इसका आशय है कि घोटाले के लिए पूरी सरकार जिम्मेदार है और वह अपने आपको इससे अलग नहीं कर सकती। अभी तक सरकार यही दिखाने और बताने की कोशिश करती रही है कि यह घोटाला उसके एक राजनीतिक घटक दल के कारण एक मंत्रालय विशेष में हुआ है, जिसके लिए वह जिम्मेदार नहीं है।

यहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दूसरा आयाम गृह मंत्री पी. चिदंबरम से जुड़ा हुआ है, जिसमें अदालत ने फिलहाल उन्हें राहत दी है, लेकिन यह राहत ज्यादा लंबी नहीं है, क्योंकि उन पर भी जल्द ही फैसला आने वाला है। पी. चिदंबरम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उन पर ट्रायल कोर्ट में मुकदमा चल रहा है इसलिए फिलहाल कोई निर्णय देना ठीक नहीं होगा। इसी तरह तरह सुप्रीम कोर्ट ने 2जी मामले की जांच के लिए एसआइटी यानी विशेष जांच दल का गठन किए जाने की बात स्वीकार नहीं की और यह निर्देश दिया कि सीवीसी यानी मुख्य सतर्कता आयुक्त की सक्रिय निगरानी में सीबीआइ मामले की जांच करे। ऐसा कहने के पीछे भाव यही है कि विभिन्न संस्थाओं के अस्तित्व और उनके अधिकारों को महत्व दिया जाना चाहिए और उनकी रक्षा की जानी चाहिए ताकि नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था बनी रहे। यदि सुप्रीम कोर्ट एसआइटी के गठन का फैसला देती तो इससे एक गलत नजीर कायम होती और दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उसका अविश्वास झलकता, जो किसी के लिए भी ठीक नहीं माना जा सकता।

कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला जहां सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी मंशा पर सवाल खड़े करने वाला है वहीं यह प्रधानमंत्री को एक तरह से राहत देने वाला भी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि सरकार की सामूहिक विफलता की बात कहकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री के प्रति नरम रवैया अपना लिया। यह कहा जाना ठीक नहीं होगा कि प्रधानमंत्री को पीएमओ और मंत्रालय की तरफ से सही रिपोर्टिग नहीं की गई, जिसके कारण यह घोटाला संभव हो पाया। संविधान में मंत्रालयों के कामकाज और उनमें किसी तरह की अनियमितता के लिए अंतिम रूप से प्रधानमंत्री को जिम्मेदार बताया गया है और एक राजनीतिक प्रमुख के रूप में वह मंत्रिमंडल समेत संसद के प्रति जवाबदेह हैं। इसलिए यहां सरकार का मुखिया होने के नाते सीधे-सीधे प्रधानमंत्री पर आरोप आता है और इसके लिए वह पीएमओ अथवा किसी अन्य पर अपनी जिम्मेदारी नहीं डाल सकते। यहां हम नहीं भूल सकते कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय में प्रधानमंत्री कार्यालय जैसी कोई संस्था नहीं थी और न ही संविधान में इसका कहीं कोई उल्लेख किया गया है। यह तो प्रधानमंत्री ने अपनी सुविधा के लिए और कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए बना रखा है, इसलिए पीएमओ को प्रधानमंत्री की रक्षा के लिए ढाल के तौर पर नहीं इस्तेमाल किया जा सकता। यदि ऐसा होता है तो आने वाले समय में मंत्री अपने सचिव और सचिव अपने अधीनस्थों पर अपनी जिम्मेदारी थोपना शुरू कर देंगे और अंत में जिम्मेदारी सबसे निचले स्तर के कर्मचारी यानी बाबू की होगी। क्या एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह की परंपरा को स्वीकार किया जा सकता है और यदि हां तो फिर भविष्य में किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी और सभी स्तरों पर एक तरह की अराजकता उत्पन्न हो जाएगी, जिसमें पदानुक्रम का कोई महत्व नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद्द किए जाने से लाइसेंस हासिल करने वाले उद्यमियों को जहां तगड़ा झटका लगा है वहीं सरकार की छवि गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। दरअसल लाइसेंस हासिल करने वाली कंपनियों ने इसका कुछ हिस्सा विदेशी कंपनियों को बेच रखा है। ऐसे में उन विदेशी कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा और यदि ऐसा नहीं होता है तो क्या देश की अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित नहीं होगी? यह ठीक है कि चार महीने के भीतर नए सिरे से ट्राई को स्पेक्ट्रम आवंटन का काम पूरा करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है, लेकिन इस समस्या के बाकी पहलुओं को सुलझा पाना सरकार के लिए फिलहाल आसान नहीं होगा। 2जी मामला आगे की सरकारों के लिए एक सबक है कि उनके किसी निर्णय अथवा कामकाज की अदालती समीक्षा संभव है, जिसे मंत्रिमंडल के विशेषाधिकार के नाम पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता। जहां तक प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग का संबंध है तो यह प्रत्येक लोकतांत्रिक देश में विपक्ष का अधिकार होता है कि वह सरकार के कामकाज की समीक्षा करे और उसके गलत कामों की निंदा करे और हरसंभव तरीके से सरकार पर दबाव बनाए, लेकिन यहां सवाल पूरे देश की जनता और संसद के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के प्रति सरकार की जिम्मेदारी का भी है, जिसे हर हाल में पूरा किया जाना होगा और उस पर खरा उतरना होगा। कम से कम 2जी मामले में सरकार इन पैमानों पर खरी नहीं उतरी है। इससे न केवल सरकार की किरकिरी हो रही है, बल्कि उसके साथ-साथ पूरे देश की छवि भी अंतरराष्ट्रीय जगत में दांव पर लग रही है। यह एक चिंता की बात है कि देश की सरकार ही देश के लिए समस्या बन रही है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक नजीर के रूप में लिया जाना चाहिए और आगे के लिए सबक लेते हुए एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।

[लेखक: संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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