डिमेंशिया मरीजों से अब अपनों की आवाज में बात करेगी AI, ‘स्मृति’ से बेचैनी और आक्रामकता में 32% कमी का दावा
डिमेंशिया से जूझ रहे मरीजों को भावनात्मक सहारा देने के लिए 'स्मृति' नामक एक एआई पहल शुरू की गई है। ...और पढ़ें

अपनों की आवाज से सहारा दे रही ‘स्मृति’।
HighLights
डिमेंशिया मरीजों के लिए 'स्मृति' नामक एआई पहल विकसित।
अपनों की परिचित आवाज में बातचीत से भावनात्मक जुड़ाव।
अध्ययन में 32% बेचैनी, आक्रामकता में कमी देखी गई।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। डिमेंशिया में जब याददाश्त कमजोर होने लगती है तो मरीज धीरे-धीरे परिचित चेहरों और रिश्तों को भी पहचानने में कठिनाई महसूस कर सकता है। ऐसे समय में अपनों की आवाज भावनात्मक सहारा बन सकती है।
इसी सोच पर आधारित ‘स्मृति’ नाम की एआइ पहल विकसित की गई है, जो डिमेंशिया मरीजों से उनके करीबी व्यक्ति की परिचित आवाज में बातचीत करती है और पुरानी यादों से जुड़े संवाद के जरिये उन्हें भावनात्मक रूप से जोड़ने का प्रयास करती है।
शोधकर्ता आहाना के अनुसार, ‘स्मृति’ में मरीज के बेटे, बेटी या जीवनसाथी की आवाज का एआइ के माध्यम से स्वरूप तैयार किया जाता है। इसके बाद व्हाट्सऐप के जरिये मरीज से नियमित बातचीत कराई जाती है।
इसमें सुबह हालचाल पूछना, भोजन या दवा की याद दिलाना, पुरानी घटनाओं और परिचित लोगों का जिक्र करना जैसी बातचीत शामिल हो सकती है। संवाद मरीज की आवश्यकता के अनुसार तैयार किया जाता है।
बातचीत के दौरान मरीज की प्रतिक्रिया और भावनात्मक स्थिति में बदलाव को समझने का भी प्रयास किया जाता है और आवश्यकता होने पर परिवार के सदस्य को स्थिति में बदलाव की जानकारी दी जा सकती है।
विशेष बात यह है कि आहाना अभी 12वीं कक्षा की छात्रा हैं, अपने कालेज प्रोजेक्ट के तहत उन्होंने मोरिंगो एशिया अस्पताल अध्यक्ष डा. प्रवीण के नेतृत्व में इस शोध को पूरा किया।
400 से अधिक मरीजों पर अध्ययन
आहाना ने बताया कि ‘स्मृति’ से जुड़े अध्ययन में 400 से अधिक मरीजों को शामिल किया गया। अध्ययन में मरीजों को इसके लिए कोई दवा नहीं दी गई। इसके बावजूद बेचैनी, उत्तेजना, आक्रामकता और घबराहट जैसे लक्षणों में 32 प्रतिशत कमी देखी गई। इस पहल के लिए प्रोविजनल पेटेंट भी दर्ज कराया गया है।
आहाना ने अल्जाइमर की पहचान में इस्तेमाल होने वाले अल्जाइमर डिजीज असेसमेंट स्केल-काग्निटिव सबस्केल (एडीएएस-काग) पर भी शोध किया है। उनका शोध अगस्त 2026 में ‘बायोइन्फार्मेशन’ में प्रकाशित हुआ। उन्होंने डिमेंशिया पर ‘द रांग वर्ड्स’ पुस्तक भी लिखी है।
सुनने की क्षमता को भी न करें नजरअंदाज
डिमेंशिया में याददाश्त की समस्या के साथ सुनने की क्षमता पर भी ध्यान देना आवश्यक है। लंबे समय तक सुनने की समस्या का संबंध काग्निटिव डिक्लाइन और डिमेंशिया के जोखिम से देखा गया है।
डा. (मेजर) राजेश भारद्वाज, संस्थापक, मेडफर्स्ट ईएनटी सेंटर एवं ईएनटी और स्लीप विशेषज्ञ ने कहा, “हर बार भूलने या एक ही बात दोहराने की वजह याददाश्त की कमजोरी ही हो, यह जरूरी नहीं है। कई बार बुजुर्ग ठीक से सुन नहीं पाते।
लंबे समय तक सुनने की समस्या काग्निटिव हेल्थ को प्रभावित कर सकती है। हियरिंग एड अल्जाइमर को सीधे रोकने का उपचार नहीं है, लेकिन सुनने की समस्या की समय पर पहचान और उपचार महत्वपूर्ण है। इसलिए बुजुर्गों में याददाश्त के साथ सुनने की क्षमता की भी जांच करानी चाहिए।”
