'बैंकों के विलय के बाद भी किराये की संपत्ति के लिए मकान मालिक की लिखित सहमति जरूरी', सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि बैंकों के विलय के बावजूद मकान मालिक की लिखित सहमति के बिना किराये ...और पढ़ें

बैंकों का विलय होने के बाद भी किराए को लेकर मकान मालिक की सहमति अनिवार्य।
HighLights
बैंक विलय में मकान मालिक की लिखित सहमति अनिवार्य, सुप्रीम कोर्ट का फैसला।
दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत किरायेदार के अधिकार सुरक्षित।
चार दशक पुराने संपत्ति विवाद का सुप्रीम कोर्ट ने किया अंत।
पीटीआई, नई दिल्ली। चार दशकों से चली आ रही एक लंबी कानूनी लड़ाई का अंत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि दो बैंकों का आपस में विलय होता है, तो भी 'दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम' (डीआरसी एक्ट) के तहत मकान मालिक की लिखित सहमति के बिना किराये की संपत्ति पर कब्जा बरकरार नहीं रखा जा सकता। बैंकों के विलय की प्रक्रिया मकान मालिक के अधिकारों को नहीं छीन सकती।
1947 से शुरू हुआ विवाद, चार दशकों का कानूनी सफर
यह पूरा मामला देश की आजादी के साल यानी 1947 से शुरू हुआ था। "ब्रिटिश मोटर कार कंपनी लिमिटेड" ने दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनाट सर्कस (प्रताप बिल्डिंग) में अपना एक प्राइम कमर्शियल स्पेस 'हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक' (एचसीबी) को किराये पर दिया था। दिसंबर 1986 में रिजर्व बैंक की एक योजना के तहत एचसीबी का पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) में विलय हो गया और पीएनबी ने इस जगह पर अपना अधिकार कर लिया।
मकान मालिक ने 1987 में खटखटाया कोर्ट का दरवाजा
मकान मालिक ने 1987 में इस आधार पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि उसकी लिखित अनुमति के बिना कब्जा ट्रांसफर करना दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 14(1)(बी) का उल्लंघन है। इसके बाद शुरू हुआ अदालती तारीखों और फैसलों का एक ऐसा अंतहीन सिलसिला, जिसने न्याय की उम्मीद में बैठे मकान मालिक को सालों तक झकझोर कर रख दिया। 1995 में रेंट कंट्रोलर ने अर्जी खारिज की, 2001 में ट्रिब्यूनल ने मकान मालिक के हक में फैसला दिया, लेकिन 2012 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फिर पलट दिया।
'अवैध कब्जा' और सुप्रीम कोर्ट का मानवीय न्याय
कोर्ट ने माना कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं, चाहे वह कोई आम नागरिक हो या देश का बड़ा सरकारी बैंक। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस के. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस उलझे हुए मामले में मानवीय और कानूनी संतुलन की नई मिसाल पेश की।
