सत्य निकेतन हादसे का खौफ बरकरार, एक महीने बाद भी छात्रों ने नहीं किया कॉलेज ज्वाइन; दूसरे इलाकों में तलाश रहे PG
सत्य निकेतन हादसे को एक महीना बीत जाने के बाद भी छात्रों में खौफ बरकरार है और वे दिल्ली लौटने ...और पढ़ें

सत्य निकेतन में इसी जगह पर एक महीने पहले गिरी थी बिल्डिंग। जागरण
HighLights
हादसे के एक महीने बाद भी छात्रों में खौफ बरकरार है।
कई छात्रों ने दोस्त खोए, घर लौटकर नए ठिकाने ढूंढ रहे।
सत्य निकेतन छोड़कर दूसरे इलाकों में पीजी तलाश रहे छात्र।
जागरण संवाददाता, दक्षिणी दिल्ली। उस दिन को याद करते ही आज भी आंखों के सामने अपनों को खोने का दर्द उतर आता है। हादसे को एक महीना होने जा रहा है, लेकिन सत्य निकेतन की उस बिल्डिंग में रहने वाले छात्रों के दिल से खौफ अब तक नहीं निकला है।
किसी ने अपना दोस्त खोया तो किसी ने अपने सामने जिंदगी भर की यादों को मलबे में तब्दील होते देखा। हादसे के बाद कई छात्रों ने सत्य निकेतन ही छोड़ दिया है। अपने घर लौटे छात्र दूसरे इलाकों में फ्लैट तलाश रहे हैं और अब तक कालेज वापस नहीं आए हैं।
छह अक्टूबर को हादसे को एक महीना पूरा हो जाएगा, लेकिन इन छात्रों के लिए वह तारीख और वह मंजर आज भी ताजा है।
छात्रों की बात
हादसे वाली बिल्डिंग में रहने वाले डीयू के मोतीलाल नेहरू कालेज (इवनिंग) के द्वितीय वर्ष के छात्र नवनीत गोदारा ने अपने दोस्त अर्पित को खोया है। मेरठ निवासी नवनीत फिलहाल अपने घर पर ही हैं। उन्होंने बताया कि हादसे के बाद सत्य निकेतन में दोबारा लौटने की हिम्मत नहीं हुई।
अब मायापुरी में फ्लैट लिया है और जल्द वहां शिफ्ट होंगे। हादसे को एक महीना होने वाला है, लेकिन दोस्त को खोने का दर्द नहीं भूल पाए हैं।अभी कालेज ज्वाइन नहीं किया है।

इसी बिल्डिंग में मोतीलाल नेहरू कालेज के छात्र श्रेष्ठ चौहान भी रहते थे, जोकि हादसे में रूममेट अक्षत यादव को खो चुके हैं। मूलरूप से झांसी के रहने वाले श्रेष्ठ ने बताया कि हादसे के बाद सत्य निकेतन में पीजी तलाशने की हिम्मत ही नहीं हुई। अब वह सत्य निकेतन छोड़ चुके हैं और जल्द दूसरे पीजी में शिफ्ट करेंगे।अगले सप्ताह कालेज ज्वाइन करने का सोचा है।

सत्य निकेतन में रहने वाली मैत्रेयी कालेज की छात्रा लक्षिता फिलहाल यहीं एक पीजी में रह रही हैं, लेकिन अब यहां से शिफ्ट होने के लिए पीजी तलाश रही हैं। उन्होंने बताया कि हादसे के बाद कई दोस्त सत्य निकेतन छोड़कर जा चुके हैं। हम लोग असुरक्षित महसूस करते हैं और पीजी संचालकों पर कोई ठोस कार्रवाई होती नहीं दिख रही है।
