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रामलीला मैदान रैली: विहिप ने इंडी गठबंधन से पूछे 4 अहम सवाल, 1 नवंबर के शक्ति प्रदर्शन पर फंसी कांग्रेस

Published: Sat, 31 Oct 2026 09:02 AM (IST)

दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को प्रस्तावित 'आईएनडीआइए गठबंधन' की महारैली पर सियासी पारा गरमा गया है। विहिप ...और पढ़ें

राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे।

राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे।

HighLights

  1. विहिप ने आईएनडीआइए गठबंधन की रैली पर उठाए गंभीर सवाल।

  2. दिवाली, 1984 दंगों की बरसी पर रैली से व्यापारी, सिख आक्रोश।

  3. कांग्रेस पर राजनीतिक मर्यादा, दोहरे मापदंडों का आरोप लगाया।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 1 नवंबर को प्रस्तावित विपक्षी 'आईएनडीआईए गठबंधन' की महारैली को लेकर सियासी पारा गर्म होता जा रहा है।

एक तरफ जहां दीवाली के ऐन वक्त पर व्यापार ठप होने की आशंका से व्यापारी वर्ग आंदोलित है, वहीं दूसरी ओर 1984 के भयावह सिख विरोधी दंगों की बरसी के दिन इस आयोजन को लेकर सिख समुदाय में भारी आक्रोश है।

इस संवेदनशील माहौल के बीच विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के खिलाफ तीखा मोर्चा खोलते हुए राजनीतिक मर्यादा और दोहरे मापदंडों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने विपक्षी गठबंधन की मंशा और प्राथमिकताओं पर करारा कटाक्ष किया है।

पूरे 9 दिनों का विश्राम

उन्होंने याद दिलाया कि सात सितंबर 2022 से 29 जनवरी 2023 तक चली राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' को क्रिसमस और नववर्ष के दौरान 25 दिसंबर से दो जनवरी तक पूरे 9 दिनों का विश्राम दिया गया था, क्योंकि वह पर्व उनके और उनकी पार्टी के लिए विशेष महत्व रखता था।

आज जब देश के सबसे बड़े त्योहार दीपावली का समय है और दिल्ली का व्यापारी वर्ग इस आयोजन से करोड़ों के नुकसान की आशंका जताते हुए बार-बार रैली स्थगित करने का अनुरोध कर रहा है, तब आयोजकों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही।

विहिप ने आईएनडीआईइए गठबंधन' से पूछे चार तीखे सवाल

व्यापार और संस्कृति से ऊपर राजनीति?

क्या राजनीतिक प्रदर्शन और रैलियां देश के सबसे बड़े त्योहारों की खुशियों, भारतीय संस्कृति, व्यापार और अर्थव्यवस्था से भी ऊपर हो गई हैं?

1984 के पीड़ितों से सार्वजनिक माफी कब?

क्या रैली की शुरुआत से पहले इंडी गठबंधन के तमाम शीर्ष नेता 31 अक्टूबर से दो नवंबर 1984 के बीच कांग्रेसियों द्वारा मार दिए गए निर्दोष हिंदू और सिख पीड़ितों को श्रद्धांजलि देकर उनके परिवारों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेंगे?

ड्रामा छोड़ कब संभालेंगे असली जिम्मेदारी?

माक इम्पीचमेंट और माक संसद जैसी माक राजनीति' करने वाले नेता प्रतिपक्ष और उनके सहयोगी दल क्या कभी जनता द्वारा सौंपी गई असली लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी संभालेंगे या केवल नाटक और नौटंकी में ही उलझे रहेंगे?

हिंसा और नुकसान की कौन लेगा जिम्मेदारी?

पिछली रैलियों की तर्ज पर यदि इस बार भी हिंसा, अभद्रता या अराजकता होती है, तो क्या आयोजक इसकी पूरी जिम्मेदारी लेंगे? क्या वे कार्यकर्ताओं द्वारा सार्वजनिक या निजी संपत्ति को पहुंचाए गए नुकसान की भरपाई करने को तैयार हैं?

सिख समुदाय में आक्रोश

एक नवंबर का दिन 1984 के नरसंहार की काले पन्नों से जुड़ी वो बरसी है, जिसे याद कर आज भी पीड़ित परिवारों की रूह कांप जाती है। सिख समुदाय का कहना है कि इस दिन राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन करना उनके पुराने जख्मों पर नमक रगड़ने के समान है।

राजनीतिक विश्लेषकों और व्यापार जगत के जानकारों का मानना है कि त्योहारों के मौसम में सामाजिक सौहार्द, व्यापारिक हितों और जनभावनाओं को दरकिनार कर राजनीति साधना किसी भी राजनीतिक दल के लिए शुभ संकेत नहीं है।

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