लाल किले के ठीक सामने ही क्यों बना पुरानी दिल्ली स्टेशन? 160 साल पुरानी अंग्रेजों की उस 'चाल' का हुआ खुलासा!
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन, जिसकी इमारत 160 साल का समृद्ध इतिहास समेटे हुए है। यह स्टेशन 1864 में एक छोटे ...और पढ़ें

चटख गेरुआ रंग वाली पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की इमारत ने 160 साल के रोमांचक इतिहास को स्वयं में सहेज रखा है।
HighLights
1864 में स्थापित, आज देश के दस बड़े स्टेशनों में शामिल।
मुगलकालीन, ग्रीक-रोमन, गॉथिक वास्तुकला का अनूठा संगम।
महात्मा गांधी के आगमन और दिल्ली दरबार का साक्षी रहा।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चटख गेरुआ रंग वाली पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की इमारत वास्तुशिल्प की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही यह कई बदलाव और इतिहास की साक्षी भी रही है। 1864 में एक छोटे से भवन के साथ शुरू हुआ यह स्टेशन आज देश के दस बड़े स्टेशनों में गिना जाता है।
सबसे अहम है इसे लाल किले के पास बनाने के पीछे की पूरी कहानी, जो बड़ी ही रोचक है। शुक्रवार को जब स्टेशन महोत्सव मनाया जा रहा था तो वहां की दीवारें अपनी गौरवगाथा स्वयं कह रही थीं। वहां जगह-जगह तस्वीरों व पोस्टरों के माध्यम से जानकारी दी गई थी।
स्टेशन महोत्सव में बताया गया विशाल इतिहास
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए शुक्रवार को स्टेशन परिसर में स्टेशन महोत्सव आयोजित किया गया। रेल मंत्रालय ने दिसंबर तक देश के 103 ऐतिहासिक रेलवे स्टेशनों पर ऐसे महोत्सव मनाने का निर्णय लिया गया था।
महोत्सव में स्टेशन के इतिहास को दर्शाती फोटो प्रदर्शनी, विरासत स्मारिका का अनावरण और स्टेशन के विकास में योगदान देने वाले रेलकर्मियों का सम्मान जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। गौर करने वाली बात है कि यहां से रोजाना करीब 250 ट्रेनों का संचालन होता है और कोरोना काल से पहले करीब तीन लाख यात्री यहां पहुंचते थे, जबकि यह स्टेशन शुरू में महज एक हजार यात्रियों के लिए बनाया गया था।

जब पहली बार पहुंची थी ट्रेन
ऐसे में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन ने अब तक जो यात्रा पूरी की है, उसे जानना जरूरी है। यमुना पर लोहे के पुल के बनने के बाद 1 जनवरी 1867 को इस स्टेशन पर पहली ट्रेन पहुंची थी। यह ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी की कलकत्ता-दिल्ली लाइन पर चलने वाली पहली ट्रेन थी, जिसके साथ ही दिल्ली रेल मार्ग से देश के अन्य शहरों से जुड़ गई।
करीब 40 वर्षों तक इसी छोटे भवन से रेल संचालन होता रहा। वर्ष 1893 में स्टेशन की नई इमारत बनाने का काम शुरू हुआ, जिसे बनने में करीब दस वर्ष लगे और 1903 में दो प्लेटफॉर्म के साथ इसे आम यात्रियों के लिए खोला गया।

मुगलकालीन झलक वाली वास्तुकला
यह इमारत मुगलकाल के प्राचीन वास्तुशिल्प के आधार पर बनाई गई है और ग्रीक-रोमन, गॉथिक व भारतीय-इस्लामिक वास्तुकला का भी अनूठा उदाहरण है। इसकी बनावट लाल किले और जामा मस्जिद जैसे मुगलकालीन भवनों से मिलती-जुलती है।
इमारत में छह मीनारें हैं, जो कभी पानी की आपूर्ति के लिए इस्तेमाल होती थीं, ठीक वैसे ही जैसे आज बड़ी पानी की टंकियां काम आती हैं। पहले यह इमारत लाल रंग की थी, लेकिन 2016 में हुए नवीनीकरण के दौरान सुविधाएं बढ़ाने के साथ इसे गेरुआ रंग दे दिया गया।
सम्मान और प्रमाणपत्र
वर्ष 1993 में दिल्ली विकास प्राधिकरण ने इस भवन को नगरीय धरोहर पुरस्कार से सम्मानित किया था। पर्यावरण संरक्षण के मानकों पर खरा उतरते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आईएसओ) का प्रमाणपत्र भी मिल चुका है, ऐसी उपलब्धि पाने वाला यह उत्तर रेलवे का इकलौता स्टेशन है।

स्कॉटिश झलक वाला डिजाइन
वास्तुकार आशीष गंजू के मुताबिक इस स्टेशन का डिजाइन आंखों को सुकून देता है और इसमें स्कॉटिश तत्व दिखाई देते हैं, जैसे टैरेस और मीनारें। इसकी एक और खासियत है कि ईंटों पर प्लास्टर नहीं चढ़ाया गया है, जो यूरोपीय शैली की पहचान है, जबकि भारत में आमतौर पर पत्थर या रंगरोगन का प्रचलन रहा है। कुछ ऐसी ही बनावट चंडीगढ़ की इमारतों में भी देखी जा सकती है।
एक रेल लाइन के लिए संघर्ष
वर्ष 1854 में ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी के जनक रोनाल्ड मैक डोनाल्ड स्टीफंस ने कलकत्ता से इलाहाबाद और दिल्ली होते हुए लाहौर तक रेल लाइन बिछाने की परिकल्पना की थी। बाद में दिल्ली के बजाय मेरठ के रास्ते लाइन बिछाने का प्रस्ताव आया, जिसका दिल्ली के व्यापारियों और नागरिकों ने कड़ा विरोध किया।
वर्ष 1863 में बनी एक समिति के सदस्य नारायण दास नागरवाला सहित अन्य लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत से दिल्ली को रेलवे लाइन से वंचित न करने की अपील की। तर्क देते हुए कहा गया कि इससे दिल्ली का व्यापार प्रभावित होगा। अंततः ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड ने दिल्ली के रास्ते ही ट्रेन चलाने का फैसला किया।
आबादी हटाकर बनाया गया स्टेशन
जहां आज पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन है, वहां पहले घनी आबादी रहती थी, जिसे पहाड़गंज, सदर बाजार और करोल बाग स्थानांतरित किया गया। इतिहासकार सोहेल हाशमी के अनुसार रेलवे लाइन पुराने शहर को दो हिस्सों में बांटती हुई गुजरी। उत्तर की ओर अंग्रेजों के रेजिडेंट आवास और चर्च थे, तो दक्षिण की ओर दिल्ली वालों की रिहायशी घर।

लाल किले से होकर गुजरनी थी लाइन
1857 की पहली स्वतंत्रता लड़ाई के विफल होने के बाद अंग्रेजों ने एक रणनीति के तहत ही दिल्ली में इस स्थान का चुनाव किया था, ताकि भविष्य में कोई हिंसक आंदोलन हो तो उसे आसानी से काबू किया जा सके।
इसीलिए स्टेशन को शहर से बाहर ले जाने के बजाय आबादी वाले इलाके में ही बनाया गया। पहले गाजियाबाद के पास स्टेशन बनाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे सलीमगढ़ और लाल किले के नजदीक बनाने का फैसला हुआ।
अंग्रेजों की जिद थी कि रेलवे लाइन लाल किले से होकर ही गुजरे, जिसके लिए किले का एक कोना तक तोड़ना पड़ा। दिल्ली के लोगों ने विरोध में पत्र भी लिखा, पर अंग्रेज अपनी जिद पर अड़े रहे। इस पूरी इमारत को अंग्रेज ठेकेदार बैंजामिन फ्लैचर ने बनाया था।
राजधानी बनने के बाद बढ़ा कद
1931 में दिल्ली के राजधानी बनने के बाद स्टेशन का महत्व और बढ़ गया, जिसके चलते 1934-35 में परिसर का विस्तार किया गया, प्लेटफॉर्मों की संख्या बढ़ाई गई और बिजली के सिग्नल लगाए गए। 1952 में उत्तर रेलवे के गठन के बाद दिल्ली जंक्शन इसका हिस्सा बना।
वर्ष 1959 में स्टेशन के यार्ड का नवीनीकरण हुआ, जिससे इसकी क्षमता कई गुना बढ़ गई। इसके बाद 1985-88 के बीच धुलाई लाइन, प्लेटफॉर्म शेड और पार्सल शेड का विस्तार किया गया। आज यहां 19 प्लेटफॉर्म हैं।

जब थम गया भाप इंजनों का सफर
स्टेशन पर जोरावर सिंह मार्ग की तरफ कभी एक स्टीम लोको शेड हुआ करता था। 15 मई 1994 को उत्तर रेलवे में भाप इंजन बंद होने के साथ ही यह लोको शेड भी इतिहास बन गया। इसी जगह पर बाद में स्टेशन के लिए दूसरा प्रवेश द्वार बनाया गया।
जब पहली बार पहुंचे थे बापू
स्टेशन से जुड़े ऐतिहासिक किस्सों में से एक है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पहला आगमन। इतिहासकारों के मुताबिक 12 अप्रैल 1915 की शाम गांधी जी पहली बार इसी स्टेशन पर उतरे थे। सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्रिंसिपल सुशील कुमार रुद्र कुछ छात्रों के साथ उनकी अगवानी के लिए स्टेशन पहुंचे थे।

उन दिनों यह कॉलेज स्टेशन के नजदीक कश्मीरी गेट पर स्थित था और इसकी इमारत आज भी मौजूद है, जहां अब कई सरकारी दफ्तर चलते हैं। स्टेशन के बाहर से गांधी जी को तांगे पर बैठाकर ले जाया गया था, उस दौर में तांगों की लंबी कतार स्टेशन के बाहर लगा करती थी।
दिल्ली दरबार का गवाह भी बना स्टेशन
उत्तर रेलवे धरोहर समिति के दस्तावेजों के अनुसार यह स्टेशन दिल्ली दरबार, स्वतंत्रता आंदोलन और कई सांस्कृतिक-राजनीतिक घटनाओं का भी साक्षी रहा है। वर्ष 1911 में तृतीय दिल्ली दरबार के मौके पर यहां रिकॉर्ड 140 ट्रेनें पहुंची थीं, जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। हालांकि, वर्तमान में यहां हर रोज करीब 250 ट्रेनों का आवागमन होता है।
