यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 07, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Delhi Pollution 2020: प्रदूषण से जंग नहीं आसान, सबको मिलकर निकालना होगा समाधानः सुनीता
Delhi Pollution 2020 अगर दिल्ली-एनसीआर को प्रदूषण की गिरफ्त से आजाद करना है तो सभी विभागों को समन्वय के साथ ...और पढ़ें

नई दिल्ली। वायु प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिसकी कमर तोड़ने के लिए जन सहयोग अति आवश्यक है। हालांकि दिल्ली-एनसीआर में अब इसे लेकर थोड़े बहुत प्रयास हो रहे हैं, जिसका असर भी नजर आने लगा है। दिल्ली के 13 और एनसीआर के 12 हाट स्पाट पर काफी काम करने के बावजूद इनके खत्म नहीं होने के पीछे कई कारण हैं। आनंद विहार में उड़ती धूल बड़ी वजह है तो पंजाबी बाग में यातायात जाम और शवदाह गृह का धुआं भी प्रदूषण का कारण है।
डीटीयू में औद्योगिक कचरा अभी भी समस्या का सबब बना हुआ है। सबसे बड़ी दिक्कत इस बात की है कि जब सुधार के प्रयास होते हैं तब कुछ समय के लिए तो स्थिति सुधरती है, लेकिन बाद में फिर वही हाल हो जाता है।
सच तो यह है कि प्रदूषण से जंग में ईमानदारी और गंभीरता दोनों अनिवार्य है। अगर प्रदूषण को हमेशा के लिए खत्म करना है तो दीर्घकालिक उपायों को गति देनी होगी। निगरानी बढ़ानी होगी। जन जागरूकता के साथ-साथ सख्त रवैया अपनाना होगा। ऐसा नहीं होने के कारण ही पहले केवल सर्दियों के मौसम में ही समस्या का सबब बनने वाला वायु प्रदूषण अब दिल्ली-एनसीआर के लिए नासूर बन गया है, जो पूरे वर्ष यहां रहने वालों को दर्द देता है। अब पीएम 10 और पीएम 2.5 का स्तर सामान्य से 76 फीसद तक अधिक रहने लगा है। हैरानी की बात यह है कि राजनीतिक आरोपों से इतर प्रदूषण के कारक भी बाहरी नहीं, बल्कि भीतरी ही हैं। दिल्ली एनसीआर के प्रदूषण में 52 फीसद हिस्सा अकेले वाहनों और औद्योगिक इकाइयों के धुएं का है।
ग्रेप के पालन में हिलाहवाली
ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) अधिसूचित होने के बावजूद दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने की वजह इसके पालन में हीलाहवाली है। प्रदूषण से निजात दिलाने के लिए नियम-कायदे तो बन गए, लेकिन उन पर क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियां अभी भी सक्रिय नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर डीजल जेनरेटर पर प्रतिबंध सुनिश्चित करने के लिए हरियाणा सरकार से लेकर उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकार तक इस साल भी हाथ खड़े कर रही है। ग्रेप का प्रावधान लागू करने के लिए राज्य सरकार से लेकर स्थानीय निकाय तक सभी जिम्मेदार हैं, लेकिन हकीकत में इनमें आपस में ही कोई तालमेल नहीं है।
ग्रेप के नियमों का पालन न होने की स्थिति में कार्रवाई आवश्यक है। लेकिन वह भी नहीं हो रही है। सीपीसीबी और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के अलावा किसी राज्य प्रदूषण बोर्ड ने ठीक से पेट्रोलिंग टीमों का गठन तक नहीं किया है। विडंबना यह कि सीपीसीबी की टीमें भी विभिन्न इलाकों का दौरा कर जो रिपोर्ट तैयार करती हैं और कार्रवाई के लिए प्रदूषण बोर्ड को भेज दी जाती है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस रिपोर्ट को नगर निगमों के पास अग्रसारित भी कर देता है, लेकिन नगर निगम की ओर से उस पर न तो कार्रवाई होती है और न ही वापस जवाब भेजा जाता है।
ग्रेप के पालन में राज्य सरकारें जहां राजनीतिक राग द्वेष साथ लेकर चल रही हैं, वहीं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्वयं को अधिकार विहीन बताते हुए लाचार महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि किसी को कोई भय नहीं है। हर साल पराली न जलाने की बात कहने के बावजूद पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। राज्य सरकारें किसानों को जागरूक करने और पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाने पर नाकामी होती दिख रही हैं।
मिलजुल कर करें प्रयास
अगर दिल्ली-एनसीआर को प्रदूषण की गिरफ्त से आजाद करना है तो सभी विभागों को समन्वय के साथ मिलजुल कर काम करना होगा। यह हमारा अधिकार क्षेत्र नहीं है, कह कर पल्ला झाड़ लेने से बात नहीं बनेगी। अधिकारियों को सोचना होगा कि वे भी दिल्ली-एनसीआर में ही रह रहे हैं और इस प्रदूषण का प्रभाव उनके जीवन पर भी पड़ रहा है, इसलिए विभागीय मतभेद भूलकर नियमों का पालन कराने के लिए मिलजुल कर काम करना होगा। राज्य और केंद्र सरकार को निगरानी व जवाबदेही दोनों तय करनी होगी। सड़कों से वाहनों का दबाव कम हो इसके लिए बहुत जरूरी है कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए। लोगों को निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक वाहनों का उपयोग करने के लिए प्रेरित करना होगा।
(पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) की सदस्य सुनीता नारायण की संवाददाता संजीव गुप्ता से बातचीत पर आधारित)
Coronavirus: निश्चिंत रहें पूरी तरह सुरक्षित है आपका अखबार, पढ़ें- विशेषज्ञों की राय व देखें- वीडियो
