नई दिल्ली, पीटीआइ। कोरोना संक्रमण को लेकर चल रहे शोध या अध्ययन में अभी यह निर्णायक रूप से स्थापित तो नहीं हुआ है कि वायु प्रदूषण से उसका कोई संबंध है, लेकिन लंबे समय तक प्रदूषित हवा निश्चित रूप से लोगों को फेफड़ों के संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बना देगी। विज्ञानियों की यह चेतावनी इस मायने में अहम है, क्योंकि दिल्ली समेत उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों में वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है और दिनों दिन यह और खराब ही हो रही है।

हालांकि, वैश्विक स्तर पर कराए गए कुछ अध्ययनों में वायु प्रदूषण के उच्च स्तर और कोरोना के मामलों व मौतों में वृद्धि के बीच संभावित संबंधों की ओर इशारा किया गया है। सितंबर में अमेरिका में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पता चला कि पीएम (कणिका तत्व) 2.5 में केवल एक माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि कोरोना संबंधी मृत्युदर को आठ फीसद बढ़ा देती है।

पीएम 2.5 वायु प्रदूषक है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। जब यह हवा में मिलते हैं तब हवा धुंधली होनी शुरू हो जाती है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं में शामिल शिआओ वू ने कहा कि दिल्ली में पीएम 2.5 स्तर में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई है, जो राष्ट्रीय राजधानी में कोरोना के मामलों में आई तेजी का कारण हो सकती है। हालांकि, अभी इस संबंध में ज्यादा तथ्यात्मक जानकारी नहीं है।

विज्ञानियों का कहना है कि वायु प्रदूषण की स्थिति लंबे समय तक बनी रही है तो इससे लोगों के फेफड़े कमजोर होंगे और संक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा। इस बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वायु प्रदूषण और पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए वह तीन - चार दिन में नया कानून लाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार के जवाब पर संतोष जताया। पीठ ने कहा कि वायु प्रदूषण के कारण लोगों का दम घुट रहा है और इस पर हर हाल में रोक लगनी चाहिए। 

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