नई दिल्ली। तकनीक का जाल वरदान भी है और अभिशाप भी। जिस तरह अच्छाई है तो बुराई भी है। मानवीय स्वभाव है, वह गलत दिशा की ओर जल्दी भागता है। वही हाल..इस कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा के लिए वरदान बने मोबाइल..अब छात्रों के लिए लत बन गए हैं। हर समय हाथ में मोबाइल। क्लास की जगह ऑनलाइन खेल बाल मन मस्तिष्क पर हावी हो रहा है। तकनीक ने हमें बहुत सी सहूलियतें दी हैं, लेकिन सदुपयोग न होने से उसका नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। कोरोना काल में स्कूल बंद हैं। बच्चे खेलने के लिए बाहर भी नहीं जा रहे हैं। ऐसे में मोबाइल और ऑनलाइन गेम ही समय गुजारने का उनका बेहतरीन जरिया बना। लेकिन मनोरंजन का यह साधन अब बुरी लत में तब्दील हो गया है।

इससे बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं खड़ी हो गई हैं। हाल के दिनों में दिल्ली-एनसीआर में दो हैरान करने वाली घटनाएं सामने आई हैं। पहली घटना दिल्ली की है। जहां पबजी गेम खेलने की लत में एक 15 वर्षीय बच्चे ने अपने दादा के एकाउंट से महज दो महीने में ही 2.30 लाख उड़ा दिए। दूसरी घटना ग्रेटर नोएडा की है, जहां एक बच्चे ने ऑनलाइन गेम के नायक की तरह अभिनय करने के चक्कर में पिस्तौल से गोली चला दी, जिसमें चार बच्चे घायल हो गए। ये कोई पहली घटना नहीं है। पूर्व में भी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिसमें ऑनलाइन गेम की लत का दुष्प्रभाव सामने आया है। घंटों ऑनलाइन गेम खेलने से बच्चों को न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक रूप से भी नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में जरूरी है कि माता-पिता बच्चों पर निगरानी रखें।

निगरानी है जरूरी

ऑनलाइन गेम की लत नशीले पदार्थ के सेवन से कम खतरनाक नहीं है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने इसे मानसिक बीमारियों की सूची में शामिल किया है। इसके कई नाम हैं जैसे इंटरनेट की लत, मोबाइल की लत या गेमिंग एडिक्शन। नशीले पदार्थ का सेवन करने पर वह शरीर के अंदर जाकर नुकसान पहुंचाता है, जबकि ऑनलाइन गेम की लत में दूसरी तरह का असर होता है।

मोबाइल के साथ में घंटो रहकर बच्चे उस पर निर्भर हो जाते हैं। वे मन पर काबू नहीं रख पाते। बस हर पल गेम खेलते रहना चाहते हैं। इस वजह से पढ़ाई में भी उनका मन नहीं लगता। कई ऑनलाइन गेम ऐसे हैं, जो बच्चों को आक्रामक बना रहे हैं। उससे आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ती है। लेकिन कुछ गेम ऐसे भी हैं जो बच्चों में गणना करने की क्षमता बढ़ाते हैं। दिमाग, हाथ व आंख के साथ संतुलन क्षमता बढ़ाती है।

ऐसे गेम मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नहीं होते। यदि ऐसा हुआ तो यह ऑनलाइन गेम की लत की एक शुरुआत हो सकती है, जो आगे चलकर एक बीमारी बन जाती है, इसलिए समय का ध्यान रखना जरूरी है। दूसरी बात यह है कि बच्चों को बड़ों की निगरानी में ही मोबाइल का इस्तेमाल करने देना चाहिए। बच्चों को तकनीक से दूर नहीं करना चाहिए लेकिन उसका इस्तेमाल सतर्कता के साथ होना चाहिए।

तनाव व अवसाद का हो रहे शिकार

  • ऑनलाइन गेम की लत से केवल बच्चे ही नहीं, नवयुवक भी प्रभावित हो रहे हैं। वे अपनी पढ़ाई तक छोड़ देते हैं
  • कुछ बच्चे तो रात में नींद लेने के बजाय दो-तीन बजे तक गेम खेलने में ही लगे रहते हैं
  • 15-20 घंटे मोबाइल व इंटरनेट पर गुजारने के कारण उनकी जीवनशैली बिगड़ रही है
  • उनकी आखों पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। खाने-पीने तक का उन्हें ध्यान नहीं रहता
  • कुछ बच्चे तो खाना खाते समय भी मोबाइल पर वीडियो देख रहे होते हैं
  • नींद पूरी नहीं होने से कई बच्चे धीरे-धीरे मानसिक तनाव व अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं। जिसका उन्हें पता नहीं चलता
  • लत लगने के बाद यदि उन्हें ऑनलाइन गेम या वीडियो देखने से मना किया जाए तो उनमें चिड़चिड़ापन होने लगता है और वे आक्रामक हो जाते हैं
  • मोबाइल के बिना उन्हें घबराहट और बेचैनी होने लगती है। कई माता-पिता को पता ही नहीं चलता कि यह ऑनलाइन गेम की लत का परिणाम है
  • समस्या यह है कि शुरुआत में माता-पिता भी ध्यान नहीं रखते। उन्हें तब मालूम चलता है जब समस्या बढ़ चुकी होती है

(आरएमएल अस्पताल के मोबाइल एडिक्शन क्लीनिक विशेषज्ञ व मनोचिकित्सक डॉ. आरपी बेनिवाल की संवाददाता रणविजय सिंह से बातचीत पर आधारित।)

Coronavirus: निश्चिंत रहें पूरी तरह सुरक्षित है आपका अखबार, पढ़ें- विशेषज्ञों की राय व देखें- वीडियो

इंडियन टी20 लीग

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस