यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 10, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
कवि कुमार की अनदेखी से सियासत में कड़वाहट का रंग और भी गाढ़ा, जानें कैसे
कुमार विश्वास से जहां दिल्ली सरकार के मंत्रियों ने किनारा कर लिया है, वहीं सरकार से जुड़े संस्थानों ने भी कुमार से दूरी बना लिया है।

नई दिल्ली [ जेएनएन ]। गणतंत्र दिवस के मौके पर लालकिले में हिंदी अकादमी ने राष्ट्रीय कवि सम्मलेन में आम आदमी पार्टी के संस्थापक नेता कुमार विश्वास की अनदेखी करके दिल्ली की सियासत में कड़ुवाहट का रंग और भी गाढ़ा कर दिया है। इससे एक बात साफ हो गई है कि यह जंग अब आगे तक चलेगी। कुमार विश्वास से जहां दिल्ली सरकार के मंत्रियों ने किनारा कर लिया है, वहीं सरकार से जुड़े संस्थानों ने भी कुमार से दूरी बना लिया है।
कुमार विश्वास स्वयं एक मशहूर कवि हैं। उनके प्रशंसकों की एक लंबी भीड़ है। लेकिन दिल्ली सरकार की भाषा अकादमी इनसे दूरी बनाने लगी है। यही वजह है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर लालकिले में हिंदी अकादमी ने राष्ट्रीय कवि सम्मलेन के आयोजन में उन्हें इस बार निमंत्रण नहीं दिया गया है।
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गणतंत्र दिवस के अवसर पर हर वर्ष आयोजित होने वाले प्रतिष्ठित हिंदी अकादमी कवि सम्मेलन में वो जाते रहे हैं और श्रोता रूप में पूरे कार्यक्रम में बैठे हैं। लेकिन इस बार उन्हें कवि सम्मेलन में आने का न्यौता तक नहीं दिया गया है।

इस संदर्भ में मंगलवार को कुमार विश्वास ने कहा कि यह उनके लिए कोई विशेष मुद्दा नहीं है। सरकार के कवि-सम्मेलनों में उनकी कोई रुचि नहीं रही है। लेकिन जब से दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है, तब से अधिकारी और अकादमी सदस्यों ने उन्हें प्रेम पूर्वक कमोबेश हर कार्यक्रम में अतिथि रूप में बुलाया है।
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हिंदी अकादमी के अलावा उर्दू अकादमी, संस्कृत अकादमी, मैथिली-भोजपुरी अकादमी, पंजाबी अकादमी ने भी उन्हें कार्यक्रमों में आमंत्रित किया है।
उन्होंने कहा कि इस बार परिस्थितियां ऐसी है कि सरकार की हिम्मत नहीं है कि उन्हें श्रोता रूप में भी सहन कर सके। संभवत: सरकार में बैठे लोग उनसे नजरें चुराने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन लाल किले के कवि-सम्मेलन में निमंत्रण मिलना-न मिलना उनके लिए महत्वपूर्ण विषय नहीं है क्योंकि वो लोगों के दिलों के लालकिले में बसे हुए हैं।
वहीं इस मामले में आप के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज कहते हैं कि लोगों को पता है कि उनकी अनदेखी क्यों की जा रही है। पार्टी के भीतर किसी मसले पर वह सहमत नहीं हैं तो उसे सार्वजनिक रूप से नहीं साझा करना चाहिए। घर की बातें घर में सुलझ जाए तो यह बेहतर होता है।
