नई दिल्ली, सीमा झा। सोनिका सिंह टीचर हैं। संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए कहती हैं, ‘सब कुछ बदल गया है। जिंदगी, जीने का तरीका, शैली और सोच भी। मानसिक रूप से अशांत महसूस करना नॉर्मल-सा हो गया है और डर स्थायी तौर पर जीवन का हिस्सा बन गया है, जो कभी नहीं जाता।’ सोनिका के अनुसार, ‘जिस कोरोना वायरस का नाम सुनकर कुछ माह पहले दहशत होती थी, वह अब घर तक आ गया है।’ दरअसल, उनकी बहन पड़ोस में ही रहती हैं। बहन के घर के सभी सदस्य वायरस की चपेट में आ चुके हैं। सोनिका ने खुद को क्वारंटाइन किया हुआ है और उनकी अगली रिपोर्ट के निगेटिव आने तक एक-एक दिन डर के साये में बीत रहा है।

क्या आप भी सोनिका जैसा ही खुद को डरा हुआ महसूस कर रहे हैं, आपको आशंकाएं परेशान कर रही हैं तो सबसे पहले खुद को परखें। यह देखें कि आप सुरक्षा नियमों को लेकर सजग तो हैं, बाहर निकलने के बाद मास्क पहनना तो नहीं भूलते, शारीरिक दूरी का पालन तो करते हैं? यदि हां, तो आपका यह डर बुरा नहीं, बल्कि अच्छा है। यहां वरिष्ठ मनोविज्ञानी, काउंसलर व थेरेपिस्ट डॉ. चांदनी टग्नैत कहती हैं, ‘यकीनन यह डर अच्छा है। यह बताता है कि आप जिंदगी से प्यार करते हैं। इसे बचाने के लिए इन दिनों आपको थोड़ा परेशान क्यों न होना पड़े, आपको हर प्रयास करना चाहिए।’

अच्छा क्यों है यह डर! : ‘डर के आगे जीत है’, ‘डरना मना है’, ‘यदि आत्मविश्वास है तो डर कुछ नहीं बिगाड़ सकता है’, ‘डर गया सो मर गया’..डर को लेकर ऐसी बातें अक्सर कही जाती हैं। ये वाक्य आपको डर से निकलने के लिए प्रेरित करते हैं, पर आज के परिदृश्य में ‘डरना जरूरी है’ कहें तो गलत नहीं। डर होना अच्छा है। आपको डर लग रहा है, तो लगने दें। यह डर प्राकृतिक है। डॉ. चांदनी टग्नैत के अनुसार, ‘हमारा नर्वस सिस्टम कुछ इस तरह से बना है कि यह खतरा महसूस होने पर खुद बता देता है कि आपको बचाव में क्या करना है।’ गाड़ी चलाते हुए अचानक सामने कोई गाड़ी आ जाए तो आप खुद को बचाने का प्रयास करते हैं। यह भी डर के कारण है। इसी तरह, वायरस से डर होना वाजिब है, क्योंकि अभी न कोई दवा है, न वैक्सीन। ऐसे में यदि आप सावधानी रख रहे हैं तो यह जिंदगी को बचाने के लिए है। कहीं जिंदगी खतरे में न पड़ जाए- इस डर को बचाए रखना जरूरी है।

तैयारी जीवन का हिस्सा : जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. संजय गुप्ता कहते हैं, ‘कोरोना एक विश्वव्यापी आपदा है, इसी बात से समङों, यह गंभीर समस्या है।’ डॉ. गुप्ता के अनुसार, ‘इसी डर के कारण आप अपनी जिंदगी को बचा सकते हैं। यह डर जिंदगी का अहम हिस्सा है। हमें डर रहता है कि दुश्मन देश हमला करेगा, इसलिए हमारे जवान माइनस 40 डिग्री तापमान में तैनात रहते हैं। यह डर नहीं, सावधानी है। यह तैयारी है कि हम दुश्मनों से अपनी रक्षा कर सकें।’ आप खुद को आने वाले खतरे के लिए तैयार कर रहे हैं। यह तैयारी जिंदगी का हिस्सा है। डॉक्टर चांदनी कहती हैं, ‘आप जिंदगी में हर चीज के लिए तैयारी करते हैं। मीटिंग में जाते हैं, आपकी बोलचाल, पहनावा सब अलग होता है। आपके भीतर बेहतर परफॉमेर्ंस का डर होता है। अब वायरस की वजह से हमें बदलना पड़ रहा है, तो इसमें गुस्सा, दुख, शमिर्ंदगी जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए।’ याद रखें, हम सतर्क रहेंगे और डर को हावी नहीं होने देंगे तो अपनी खुशहाली अपने हाथ रहेगी।

फोबिया नहीं, तार्किक है यह डर : डॉ. संजय गुप्ता बताते हैं, ‘मनोवैज्ञानिक भाषा में फोबिया अलग चीज है। जिस चीज से डरने की कोई वजह नहीं, उसका डर फोबिया है। उसका डर अतार्किक होता है। कोरोना वायरस से डरने को आमतौर पर लोग कोरोना फोबिया कह देते हैं, पर यह एक तार्किक डर है, फोबिया नहीं।’ शुरुआती दिनों में इसे फोबिया कहा गया तो इससे नुकसान यह हुआ कि लोगों ने डरना छोड़ दिया। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन खुद समझाने की कोशिश कर रहा है कि वैक्सीन आ भी जाए तब भी स्थिति संभलने में थोड़ा समय लगेगा, इसलिए सावधानी ही बचाव है।

यह डर ‘छोटा’ लगता है तो क्यों? : छोटी-छोटी चीजों से घबराना जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लोग फेसबुक पर लाइक नहीं आने पर भी परेशान हो जाते हैं। डॉ. चांदनी टग्नैत कहती हैं, ‘हमारा एड्रेनालाइन हर वक्त सक्रिय रहता है, क्योंकि डरने, घबराने की हमने बहुत-सी वजहें बना ली हैं जिंदगी में। इससे हम असली और नकली डर का अंतर भूल जाते हैं।’ डॉ. चांदनी के अनुसार, ‘यही वजह है कि लोग वायरस की परवाह करना छोड़ देते हैं और कह देते हैं कि लाइफ में इतनी टेंशन पहले ही है, कितना डरें और किस-किस बात से डरें। यदि कोई अपने को खोता है तो यह डर बड़ा बन जाता है।’ यदि यह डर आपको नहीं डराता तो सावधान हो जाएं।

ध्यान रहे

  • वायरस जिंदगी का हिस्सा बन चुका है, इसलिए मास्क क्यों पहने, यह गलत तर्क है
  • हर व्यक्ति यह मानकर चले कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता इतनी नहीं है कि वह वायरस को संभाल ही लेगा
  • वायरस के प्रति बेपरवाह होना खतरनाक अप्रोच है। पर डर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है तो आपकी सहायता के लिए काउंसलर, मनोचिकित्सक मौजूद हैं
  • वायरस के कारण कम मृत्यु दर है’, इस बात से आश्वस्त होना ठीक नहीं। उनसे पूछिए, जिन्होंने अपनों को वायरस के कारण खो दिया है। इसलिए सतर्कता और सजगता ही हमें बचा सकती है

खुद को बचाने का एहसास : एनर्जी हीलर की वरिष्ठ साइकोथेरेपिस्ट चांदनी टग्नैत ने बताया कि खुद को बचाने का एहसास है यह डर, लेकिन इसके कारण जीना छोड़ना सही नहीं। डर को केवल डर न बनाएं। डर को मुद्दा बना लेंगे तो आप कभी खुश न रह पाएंगे। हर चीज में डर को तलाशने लगेंगे तो सोचिए कब जिएंगे। इसलिए ऐसा कोई काम ही क्यों करें कि आपको घर पर सबसे अलग-थलग होना पड़ जाए या अस्पताल जाना पड़े। आप एक तरफ सावधानी रख रहे हैं और हर वक्त डर भी रहे हैं तो ऐसे में तकलीफ आएगी। प्रकृति का नियम है कि जिस पर फोकस करते हैं, वही आप महसूस करने लगते हैं। बस अपनी तरफ से बेस्ट करें। डर को खुद से बड़ा न बनाएं। वह आपको कभी चैन से रहने नहीं देगा।

बनी रहे जिंदगी की लय : वाराणसी बीएचयू के आईएमएस मनोचिकित्सा विभाग के पूर्व अध्यक्ष व वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. संजय गुप्ता ने बताया कि यदि अधिक डर बना हुआ है तो इसका उपाय है कि आप जीवन की लय को न खोने दें। इसमें मदद करेगी आपकी दिनचर्या। ब्रेन रूपी मशीन सुचारु रूप से काम करेगी तो आपकी इम्यूनिटी यानी प्रतिरोधक क्षमता भी बेहतर होगी। अच्छा खानपान, सुरुचिपूर्ण कार्य, सरल योग दिनचर्या में शामिल करने के अलावा जरूरी है कि आप खुशहाली मंत्र का प्रयोग करें। यह दो पंक्ति का मंत्र है-आज जो हुआ, अच्छा हुआ। आगे जो होगा, बहुत अच्छा होगा। इसे दिल पर हाथ रखकर बोलें। यह पॉजिटिव सेल्फटॉक यानी सकारात्मक आत्मालाप इम्यून सिस्टम को भी सक्रिय कर इसे बेहतर बनाने का काम करेगा। आप वायरस से दमदार लड़ाई के लिए तैयार हो सकेंगे।

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