मिड-डे मील टेंडर को चुनौती देने से पहले करना होगा यह काम, सिविल कोर्ट ने स्पष्ट की कानूनी प्रक्रिया
दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने पीएम पोषण योजना के तहत मिड-डे मील टेंडर विवाद को वाणिज्यिक विवाद माना है। ...और पढ़ें

कोर्ट ने सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील की आपूर्ति के लिए एनजीओ के चयन को चुनौती देने वाले मामले में कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
HighLights
मिड-डे मील टेंडर विवाद वाणिज्यिक विवाद की श्रेणी में।
मुकदमा दायर करने से पहले मध्यस्थता प्रक्रिया अनिवार्य।
सुभारती जनकल्याण समिति का वाद कोर्ट ने खारिज किया।
रीतिका मिश्रा, नई दिल्ली। पीएम पोषण योजना के तहत सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील की आपूर्ति के लिए एनजीओ के चयन को चुनौती देने वाले मामले में कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
तीस हजारी स्थित जिला न्यायाधीश की अदालत ने कहा कि निविदा के माध्यम से सेवाएं उपलब्ध कराने से जुड़ा विवाद वाणिज्यिक विवाद की श्रेणी में आता है।
ऐसे मामलों में मुकदमा दायर करने से पहले मध्यस्थता और समझौते की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। इसी आधार पर अदालत ने सुभारती जनकल्याण समिति का मुकदमा खारिज कर दिया।
क्यों नहीं आता यह मामला सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में?
जिला न्यायाधीश तरुण योगेश की अदालत ने कहा कि विवाद वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 की धारा 2(1)(सी)(18) के अंतर्गत आता है। अधिनियम के तहत मुकदमा दायर करने से पहले पूर्व-विवाद मध्यस्थता की प्रक्रिया अनिवार्य है। अदालत ने माना कि इस मामले में सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं बनता।
चयन प्रक्रिया पर लगाए थे आरोप
सुभारती जनकल्याण समिति ने दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग और चयनित संस्थाओं के खिलाफ मुकदमा दायर किया था।
समिति ने तकनीकी मूल्यांकन समिति की चार फरवरी 2026 की सिफारिश, सात अप्रैल को जारी स्वीकृति पत्र और 30 अप्रैल के कार्यादेशों को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि चयन प्रक्रिया में मनमानी और पारदर्शिता की कमी बरती गई व कुछ संस्थाओं का चयन निर्धारित पात्रता शर्तें पूरी नहीं करने के बावजूद किया गया।
समिति ने दावा किया था कि उसने पीएम पोषण योजना के मानकों के अनुरूप रसोई तैयार करने के लिए करीब 60 लाख रुपये खर्च किए हैं। वहीं, दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ने मुकदमे की पोषणीयता पर सवाल उठाते हुए इसे वाणिज्यिक विवाद बताया था।
पहले भी खारिज हो चुके हैं ऐसे मामले
अदालत ने अपने फैसले में इसी तरह के तीन अन्य मामलों का भी उल्लेख किया। इनमें विश्वकर्मा एजुकेशन एंड चैरिटेबल सोसायटी, भारतीय मानव कल्याण परिषद और दलित मानव उत्थान संस्थान की ओर से दायर मुकदमे शामिल थे।
अदालत के अनुसार, इन मामलों में भी समान राहत मांगी गई थी और 14 अक्टूबर को उन्हें खारिज या अस्वीकार कर दिया गया था। अदालत ने संबंधित कानूनी प्रविधानों और पूर्व मामलों में दिए गए निष्कर्षों के आधार पर सुभारती जनकल्याण समिति का वाद भी खारिज कर दिया।
