मंगोलपुरी फैक्ट्री अग्निकांड: फैक्ट्री में सीढ़ी पर कच्चे माल के कट्टे नहीं होते तो बच सकती थी चार जिंदगियां
दिल्ली के मंगोलपुरी औद्योगिक क्षेत्र की एक जूता फैक्ट्री में आग लगने से चार श्रमिकों की मौत हो गई। घायल ...और पढ़ें
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मंगोलपुरी अग्निकांड। जागरण
HighLights
सीढ़ियों पर कच्चे माल ने रोका रास्ता, चार श्रमिकों की मौत।
फैक्ट्री में फायर एनओसी नहीं, सुरक्षा इंतजामों में भारी चूक।
पुलिस फैक्ट्री मालिक की तलाश में, परिवारों को आर्थिक संकट।
राजीव रंजन, बाहरी दिल्ली। बाहरी दिल्ली में मंगोलपुरी औद्योगिक क्षेत्र के फेज-एक में स्थित जूता फैक्ट्री में चार श्रमिकों की मौत के मामले में फैक्ट्री की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं।
हादसे में घायल श्रमिक विकास ने पुलिस को दिए बयान में आरोप लगाया है कि फैक्ट्री की सीढ़ियों पर जूते बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के कट्टे रखे रहते थे। इससे आने-जाने का रास्ता बाधित रहता था।
इस समस्या को लेकर कई बार फैक्ट्री मालिक और ठेकेदार को शिकायत भी दी गई थी, लेकिन वे श्रमिकों को डांटकर चुप करा देते थे। विकास का कहना है कि यदि सीढ़ियों पर कच्चे माल के कट्टे नहीं रखे होते तो श्रमिकों को बाहर निकलने का रास्ता मिल सकता था और साथियों की जान बच सकती थी।
विकास कुमार बिहार के नालंदा जिले का रहने वाला है। वह अपने चचेरे भाई अशोक कुमार के साथ मंगोलपुरी औद्योगिक क्षेत्र स्थित न्यू एएम प्रोडक्ट्स नामक जूता फैक्ट्री में काम करता था। वह और उसका भाई करीब तीन वर्ष से फैक्ट्री में काम कर रहे थे और शुक्रवार को दोनों की रात की शिफ्ट थी, जब आग लगी।
वहीं, कुछ ही देर में धुआं इतना बढ़ गया कि श्रमिकों को सांस लेने में परेशानी होने लगी। दम घुटने की आशंका के बीच सभी बाहर निकलने की कोशिश करने लगे, लेकिन सीढ़ियों पर रखे कच्चे माल के कट्टों के कारण रास्ता बाधित था।
हालत स्थिर बताई
विकास ने आरोप लगाया कि रास्ता खुला होता तो श्रमिक समय रहते बाहर निकल सकते थे। उन लोगों ने बाहर निकलने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन नहीं निकल पाए। इस हादसे में चार श्रमिकों की मौत हो गई थी, जबकि विकास और हरेंद्र घायल हो गए। दोनों का संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल में उपचार चल रहा है, जहां उनकी हालत स्थिर बताई जाती है।
पुलिस सूत्रों ने बताया कि घटना के बाद पुलिस टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच की और फारेंसिक टीम ने साक्ष्य जुटाए। फिलहाल पुलिस फैक्ट्री मालिक मुकेश बंसल और रोहित गोयल की तलाश में छापेमारी कर रही है।
पुलिस ने भी जांच में पाया है कि सभी खिड़कियों पर शीशे लगे हुए थे। आने-जाने के एक ही गेट था और मौके से बच निकलने के सभी रास्ते बाधित थे। मामले की जांच राज पार्क थाने के इंस्पेक्टर ओम प्रकाश मंडल कर रहे हैं। पुलिस हादसे के कारणों और फैक्ट्री में सुरक्षा इंतजामों की जांच कर रही है।
फायर एनओसी के बिना चल रही थी फैक्ट्री
मंगोलपुरी औद्योगिक क्षेत्र स्थित जूता फैक्ट्री में अग्नि सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे। फैक्ट्री के पास फायर एनओसी भी नहीं थी। करीब पांच साल पहले फैक्ट्री मालिक ने एनओसी प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन दमकल विभाग के दिशा निर्देश का पालन नहीं किया गया। इसके चलते एनओसी नहीं मिल पाया था। इसके बाद दोबारा आवेदन भी नहीं किया गया। बाद में बगल का प्लाट किराये पर लेकर फैक्ट्री का विस्तार कर लिया गया था।
जांच में पाया गया कि फैक्ट्री में प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही गेट था। आपात स्थिति में बाहर निकलने के लिए अलग द्वार नहीं था, जिससे आग की चपेट में आए श्रमिकों को बाहर निकलने का मौका नहीं मिला। एक अधिकारी ने बताया कि 250 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाली औद्योगिक इमारत के लिए फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट जरूरी है।
इसके तहत पर्याप्त प्रवेश-निकास मार्ग, सुरक्षित इलेक्ट्रिकल वायरिंग, फायर अलार्म, जरूरत के अनुसार स्प्रिंकलर और ज्वलनशील पदार्थों के सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था होनी चाहिए। श्रमिकों का आरोप है कि इतनी बड़ी लापरवाही बिना प्रशासनित अधिकारियों की मिलीभगत के नहीं हो सकती है।
आर्थिक तंगी से जूझ रहे पीड़ित परिवार
मंगोलपुरी औद्योगिक क्षेत्र की जूता फैक्ट्री में हुए हादसे ने श्रमिकों की जान लेने के साथ ही उनके परिवारों के सामने आर्थिक संकट भी खड़ा कर दिया। हादसे में जान गंवाने वाले अशोक व लालबाबू के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि उनके शव को गांव ले जाने के लिए भी स्वजन को मशक्कत करनी पड़ी।
वहीं, हादसे में घायल विकास और हरेंद्र के परिवार भी भविष्य को लेकर चिंतित हैं। विकास अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती है। इलाज और आगे की देखभाल पर होने वाले खर्च को लेकर स्वजन परेशान हैं।
उनका कहना है कि विकास को ठीक होने में समय लगेगा। ऐसे में परिवार का खर्च कैसे चलेगा। दूसरी ओर हरेंद्र आइसीयू में वेंटिलेटर पर है। उसके स्वजन भी दिल्ली पहुंच चुके हैं और आर्थिक तंगी के बीच इलाज को लेकर चिंतित हैं।
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