दिन में सोना और रात में जागना? जैविक घड़ी बिगड़ने से शारीरिक और मानसिक सेहत पर मंडरा रहा खतरा
अनियमित दिनचर्या का सीधा असर शरीर की जैविक घड़ी पर पड़ता है। इसकी वजह से नींद, हृदय, मस्तिष्क और मेटाबालिज्म पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, एआई जेनरेटेड
HighLights
रात में जागना जैविक घड़ी को बुरी तरह प्रभावित करता है।
नींद, हृदय, मस्तिष्क और मेटाबालिज्म पर पड़ता है असर।
अनियमित दिनचर्या मानसिक स्वास्थ्य को भी गंभीर रूप से बिगाड़ती है।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। रात में जागना और दिन में सोना केवल नींद का समय नहीं बदलता, बल्कि घर-परिवार की दिनचर्या और आपसी संबंधों पर भी असर डालता है।
रात की नौकरी, देर रात तक मोबाइल और लैपटाप चलाने तथा सप्ताहांत में देर से सोने-जागने की आदत से शरीर की जैविक घड़ी बदल रही है। इससे नींद के साथ हृदय, मस्तिष्क और मेटाबालिज्म से जुड़ी प्रक्रियाएं प्रभावित हो रही हैं।
रात में जागने के कई नुकसान
मेडफर्स्ट ईएनटी सेंटर के संस्थापक और स्लीप एक्सपर्ट और ईएनटी सर्जन मेजर (सेनि.) डा. राजेश भारद्वाज के अनुसार शरीर की जैविक घड़ी नींद के साथ हार्मोन, पाचन, मेटाबालिज्म, हृदय प्रणाली और रोग प्रतिरोधक क्षमता की गतिविधियों से भी जुड़ी होती है।
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सोने-जागने, रोशनी के संपर्क में आने और भोजन का समय बार-बार बदलने से इसकी प्राकृतिक लय प्रभावित होती है। जो शरीर की पूरी प्रक्रिया को ही बदल देती है। 2024 में प्रकाशित चिकित्सीय समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 16 अध्ययनों की समीक्षा में जैविक घड़ी और दिनचर्या के बीच असंतुलन का प्रभाव मेटाबालिक सिंड्रोम से संबंधित पाया गया।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है असर
मनोचिकित्सक और इहबास के पूर्व निदेशक डा. निमिष जी. देसाई के अनुसार, पर्याप्त नींद नहीं लेना और सही समय पर नींद नहीं आना मस्तिष्क को प्रभावित करता है। जैविक घड़ी गड़बड़ाने से शरीर की पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
लंबे समय तक अनियमित दिनचर्या रक्तचाप, रक्त शर्करा, ध्यान और याददाश्त पर भी असर डाल सकती है। नियमित दिनचर्या और नियमित नींद ही इससे बचने का सही उपाय है।
रात भर जागने से शरीर के साथ दिमाग पर असर
केस-1 रात की पाली में काम करने वाला रमेश दिन में सोता है। इस वजह से वह घर के कामकाज में हिस्सा नहीं ले पाता। परिवार के सदस्यों को जब उसकी आवश्यकता होती है, तब वह सो रहा होता है। रात में उसकी गतिविधियों से दूसरों की नींद भी प्रभावित होती है। इससे घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया है।
केस-2 मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली नेहा दोपहर को काम पर जाती है और रात में लौटने के बाद देर तक मोबाइल चलाती है। वह दोपहर तक सोती है, जिससे छुट्टी के दिन सुबह जल्दी उठना मुश्किल हो जाता है।
केस-3 बीपीओ में काम करने वाला रोहित पूरे सप्ताह देर रात तक लैपटाप पर काम करता है। शुक्रवार की रात दोस्तों के साथ देर तक जागने के बाद शनिवार को दोपहर तक सोता है, इसलिए रविवार रात उसे समय पर नींद नहीं आती। और सोमवार को सुबह उठना मुश्किल हो जाता है।
