ट्विन एयरपोर्ट्स का कनेक्टिविटी टेस्ट: न समय घटा न जेब पर बोझ, मुंबई-NCR में एयरपोर्ट के बीच तालमेल बना सिरदर्द
भारत में ट्विन एयरपोर्ट मॉडल के बावजूद, नए एयरपोर्ट पुराने का भार कम नहीं कर पा रहे हैं, बल्कि दोनों के बीच कनेक्टिविटी एक बड़ी चुनौती बन गई है।
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दो एयरपोर्ट के बीच त्वरित आवागमन का पक्का इंतजाम न होने के कारण नए विकसित एयरपोर्ट का सफर यात्रियों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण। AI जनरेटेड
HighLights
भारत में ट्विन एयरपोर्ट्स के बीच कनेक्टिविटी एक बड़ी चुनौती।
मुंबई, दिल्ली-एनसीआर में इंटर-एयरपोर्ट आवागमन में लग रहा अधिक समय।
विश्व स्तर पर हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर से कनेक्टिविटी सुधारी जाती है।
गौतम कुमार मिश्रा, नई दिल्ली। भारत में ट्विन एयरपोर्ट का मॉडल एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर की नई पहचान बन रहा है। लेकिन इस मॉडल के पीछे एक व्यावहारिक हकीकत यह उभरी है कि नया एयरपोर्ट बनने से पुराने मुख्य एयरपोर्ट का पैसेंजर लोड सीधे तौर पर कम नहीं होता, बल्कि दो एयरपोर्ट होने पर इंटर-एयरपोर्ट कनेक्टिविटी (दोनों के बीच आवागमन) सबसे बड़ा इम्तिहान बन जाती है।
दो एयरपोर्ट के बीच त्वरित आवागमन का पक्का इंतजाम न होने के कारण नए विकसित एयरपोर्ट का सफर यात्रियों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो रहा है।
मुंबई टी-1 का पुनर्विकास और जमीनी संकट
इस चुनौती का ताजा उदाहरण मुंबई में दिख रहा है, जहां छत्रपति शिवाजी महाराज एयरपोर्ट के 60 साल पुराने टर्मिनल-1 को ढहाकर नया आधुनिक टर्मिनल बनाने का काम शुरू हो रहा है। इसके चलते एयरलाइंस और लाखों यात्रियों को मजबूरन नवी मुंबई एयरपोर्ट और टी-2 पर शिफ्ट किया जा रहा है।
इंडिगो, स्पाइसजेट व अकासा एयर की उड़ानों के इस फेरबदल से सांताक्रूज और नवी मुंबई के बीच 35 से 40 किलोमीटर की दूरी और भारी ट्रैफिक का पेच खड़ा हो गया है, जहां सफर में डेढ़ से दो घंटे लग रहे हैं।

दिल्ली-NCR में जेवर और IGI का गणित
दिल्ली-NCR में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। आईजीआई पर यात्रियों के भारी भार के बावजूद दक्षिण दिल्ली व गुरुग्राम के यात्रियों की पहली पसंद आईजीआई ही रहेगा।
नोएडा अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट (जेवर) आईजीआई का लोड कम करने के बजाय पश्चिमी यूपी और पूर्वी दिल्ली-एनसीआर के नए यात्रियों व भविष्य की अतिरिक्त उड़ानों को संभालेगा। लेकिन आईजीआई और जेवर के बीच 72 से 80 किमी की दूरी को सड़क मार्ग से तय करने में आज भी दो से ढाई घंटे लग रहे हैं। बिना किसी डायरेक्ट हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के, लेओवर में एक से दूसरे एयरपोर्ट ट्रांसफर होना बेहद जोखिम भरा है।
गोवा का हाल
गोवा के ट्विन एयरपोर्ट (डाबोलिम बनाम मोपा) मॉडल से भी यही सबक मिला। नए मोपा एयरपोर्ट के आने के बाद भी डाबोलिम का लोड बना रहा और राज्य का कुल ट्रैफिक 83 लाख से बढ़कर 97 लाख पार कर गया। लेकिन दोनों के बीच 60 किमी की दूरी के लिए सीधी रैपिड मेट्रो न होने से यात्रियों को करीब दो हजार रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ते हैं।
वैश्विक हकीकत, समय घटाना ही एकमात्र हल
विशेषज्ञों का कहना है कि लंदन (हीथ्रो व गैटविक) और न्यूयार्क (जेएफके व ला गार्डिया) के उदाहरणों से साफ है कि ट्विन एयरपोर्ट्स तभी पूरी तरह कामयाब होते हैं जब उनके बीच समर्पित हाई-स्पीड रेल, एक्सप्रेस मेट्रो और आटोमैटिक बैगेज ट्रांसफर की व्यवस्था हो।
नए एयरपोर्ट्स से पैसेंजर क्षमता तो बढ़ जाएगी, लेकिन जब तक दोनों एयरपोर्ट के बीच की दूरी को मिनटों में समेटने वाला नेटवर्क तैयार नहीं होता, तब तक यह मॉडल कनेक्टिविटी के बड़े इम्तिहान से गुजरता रहेगा।
फैक्ट फाइल: दो एयरपोर्ट के बीच का 'कनेक्टिविटी गैप'
भारत के प्रमुख 'ट्विन एयरपोर्ट्स'
दिल्ली-एनसीआर (आईजीआई बनाम जेवर)
- दूरी: करीब 72 से 80 किलोमीटर
- सड़क मार्ग से समय: 2 से 2.5 घंटे
- स्थिति: डायरेक्ट हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की सख्त दरकार
मुंबई एमएमआर (सांताक्रूज बनाम नवी मुंबई)
- दूरी: 35 से 40 किलोमीटर
- सड़क मार्ग से समय: 1.5 से 2 घंटे
- स्थिति: अटल सेतु से आंशिक राहत, लेकिन समर्पित मेट्रो का इंतजार
गोवा (डाबोलिम बनाम मोपा)
- दूरी: 55 से 60 किलोमीटर
- सड़क मार्ग से समय: 1.5 से 2 घंटे
- स्थिति: रैपिड पब्लिक ट्रांजिट की कमी, महंगी कैब पर निर्भरता
विशाखापट्टनम (शहर हवाई अड्डा बनाम भोगपुरम)
- दूरी: 50 से 55 किलोमीटर
- सड़क मार्ग से समय: 1.5 घंटे
- स्थिति: तटीय एक्सप्रेसवे व लिंक रोड प्रस्तावित
वैश्विक उदाहरण: विदेश में समाधान
लंदन (यूके): हीथ्रो बनाम गैटविक
दूरी: 60 किमी | समाधान: समर्पित एक्सप्रेस ट्रेन (सफर: 45 मिनट)
न्यूयार्क (यूएस): जेएफके बनाम ला गार्डिया
दूरी: 17 किमी | समाधान: एयरट्रेन व एक्सप्रेस शटल बस नेटवर्क
टोक्यो (जापान): हानेडा बनाम नरीता
दूरी: 75 किमी | समाधान: डायरेक्ट एक्सप्रेस ट्रेन नेटवर्क (सफर: 60 मिनट)
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