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भारत में अस्पतालों का कचरा बना ‘सुपरबग’ का स्रोत, एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने का बढ़ा खतरा

Published: Mon, 09 Feb 2026 05:13 PM (IST)Updated: Mon, 09 Feb 2026 07:49 PM (IST)

Antibiotics Awareness भारत में प्रतिदिन 700 टन मेडिकल कचरा निकलता है, जिसमें से 140 टन का उचित निस्तारण नहीं होता। ...और पढ़ें

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संक्षेप में पढ़ें

अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। Antibiotics Awareness देश के अस्पतालों से प्रतिदिन 700 टन बायो मेडिकल वेस्ट उत्सर्जित होता है, जिसमें से 140 टन का उचित निस्तारण नहीं हो पाता। यह मेडिकल कचरा जल और हवा के माध्यम से पर्यावरण प्रदूषित करने के साथ ही मानव शरीर तक पहुंचकर संक्रमणों को जटिल बना रहा है।

इससे एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) का खतरा लगातार बढ़ रहा है। घरों में बची या एक्सपायर्ड एंटीबायोटिक्स का गलत तरीके से निस्तारण, अस्पतालों से निकलने वाला बायो मेडिकल वेस्ट और दवा फैक्ट्रियों से बिना उचित शोधन के बहने वाला दवामिश्रित अपशिष्ट एएमआर के प्रमुख कारण हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अस्पतालों में कचरा निस्तारण की कमजोर नीतियां और निगरानी की कमी समस्या को और बढ़ा रही है।

देश में कुल 70 हजार अस्पताल

देश में सरकारी और निजी कुल लगभग 70 हजार अस्पताल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार, देश में प्रतिदिन लगभग 700 टन मेडिकल कचरा निकलता है, जो सालाना करीब 2.55 लाख टन होता है।

अधिकांश का निस्तारण कामन बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट एंड डिस्पोजल फैसिलिटी (सीबीडब्ल्यूटीएफ) के माध्यम से होता है, लेकिन इसका 20 प्रतिशत से अधिक अब भी बिना उपचार के रह जाता है।

मेडिकल कचरे का गलत निस्तारण एएमआर के एक बड़े ‘अदृश्य स्रोत’ की तरह काम करता है और नदियों, झीलों और भूजल को प्रभावित कर रहा है।

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जल स्रोतों से मानव तक पहुंचते हैं अवशेष

एंटीबायोटिक अवशेष जल स्रोतों में पहुंचकर मछलियों, कृषि उत्पादों और पेयजल के जरिये इंसानों तक पहुंचते हैं। इससे न सिर्फ संक्रमण फैलता है, बल्कि ये एंटीबायोटिक अवशेष बैक्टीरिया को अधिक प्रतिरोधक बना देते हैं, जिससे मरीजों पर दवाओं का असर कम हो जाता है।

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जल स्रोतों में फेंका जा रहे एंटी बायोटिक अवशेष। (AI Generated Representational Image)

15 प्रतिशत से अधिक कचरा ज्यादा खतरनाक...

देश में प्रतिदिन निकलने वाले कुल मेडिकल कचरे में 15 प्रतिशत से अधिक कचरा ऐसा होता है जो सीधे संक्रमण, एएमआर और पर्यावरणीय जोखिम से जुड़ा है।

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इस संक्रामक कचरे में खून या शरीर द्रव से सनी पट्टियां, काटन, गाज, ड्रेसिंग मटीरियल, लैब सैंपल और कल्चर वेस्ट, सुई, ब्लेड, स्कैल्पेल, टूटी कांच की शीशियां, एक्सपायर्ड व अप्रयुक्त एंटीबायोटिक्स व अन्य दवाएं, वैक्सीन वायल, साइटोटाक्सिक और कीमोथेरेपी की दवा, आइवी सेट, कैथेटर, सैलाइन बोतलें व ट्यूब इत्यादि प्रमुख रूप से होते हैं।

मेडिकल वेस्ट निस्तारण के नियम व एसओपी...

देश में मेडिकल कचरे के प्रबंधन के लिए बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 लागू हैं, जिन्हें सीपीसीबी द्वारा अधिसूचित किया गया है। इन नियमों के तहत एक्सपायर्ड या अप्रयुक्त एंटीबायोटिक्स और अन्य दवाओं को पीले रंग के नान-क्लोरीनेटेड प्लास्टिक बैग में एकत्र किया जाता है।

इन्हें इंसिनरेशन, एनकैप्सुलेशन या अन्य स्वीकृत विधियों से नष्ट किया जाता है। घरों में बची या एक्सपायर्ड एंटीबायोटिक्स के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के दिशानिर्देशों के अनुसार नागरिकों को ऐसी दवाएं अधिकृत कलेक्शन सेंटर या केमिस्ट के माध्यम से जमा करानी चाहिए।

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NoteBookLM आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस प्रोग्राम की सहायता से बनाया गया ग्राफिक्स। 

सामान्य कूड़े में फेंकना या नाली में बहाना पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरनाक माना गया है। अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट को पीले, लाल, नीले और सफेद रंग की श्रेणियों में अलग किया जाना चाहिए।

सभी अस्पतालों के लिए सीबीडब्ल्यूटीएफ से जुड़ना अनिवार्य है, जहां कचरे का वैज्ञानिक तरीके से उपचार किया जाता है। हालांकि, धरातल पर इन नियमों के पालन में बड़े स्तर पर अब भी खामियां बनी हुई हैं।

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बिना पर्चे के एंटीबायोटिक्स का उपयोग, अधूरा कोर्स और बायो मेडिकल वेस्ट का उचित निस्तारण न होना एएमआर के खतरे को बढ़ा रहा है। दवाओं का विवेकपूर्ण इस्तेमाल और मेडिकल वेस्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन ही भविष्य में प्रभावी इलाज को सुरक्षित रख सकता है।

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डॉ. एम. श्रीनिवास, निदेशक, एम्स, नई दिल्ली

एंटीबायोटिक्स का अनियंत्रित उपयोग और मेडिकल कचरे का लापरवाही से निपटान खतरनाक स्थिति पैदा कर रहा है। अगर अभी आदतें नहीं बदलीं तो साधारण संक्रमणों का इलाज भी मुश्किल हो जाएगा।

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डॉ. संदीप बंसल, निदेशक, सफदरजंग अस्पताल