भारत में जलवायु संकट से हर साल 13 अरब डॉलर का खाद्य नुकसान, खेतों से लेकर रसोई तक पहुंचा संकट
भारत में जलवायु परिवर्तन और कमजोर भंडारण व्यवस्था के कारण हर साल 13 अरब डॉलर का खाद्य नुकसान हो रहा ...और पढ़ें

ल नीनो के प्रभाव और कमजोर भंडारण व्यवस्था के कारण देश की खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। एआई इमेज
HighLights
जलवायु परिवर्तन से भारत को सालाना 13 अरब डॉलर का खाद्य नुकसान।
कमजोर कोल्ड चेन, बेमौसम बारिश से 40% फल-सब्जियां बर्बाद।
हीट स्ट्रेस से दूध उत्पादन में गिरावट, कृषि भूमि प्रभावित।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। भारत में जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह मंडियों, खाद्य आपूर्ति और आम लोगों की रसोई तक पहुंच चुका है। अल नीनो के प्रभाव और कमजोर भंडारण व्यवस्था के कारण देश की खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट मंडरा रहा है।
हर वर्ष कितने का हो रहा भारत को नुकसान
'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के नए श्वेत पत्र 'From Risk to Resilience: Climate Change, Ecology and the Future of Indian Agriculture' के अनुसार, कमजोर कोल्ड चेन और जलवायु जोखिमों के कारण भारत को हर साल करीब 13 अरब डॉलर का खाद्य नुकसान हो रहा है।
केवल 4 प्रतिशत उपज को मिलती है कोल्ड चेन सुविधा
भारत में उत्पादित फल और सब्जियों का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाता है, जबकि 5 से 6 प्रतिशत अनाज भी बर्बाद होता है। देश में केवल 4 प्रतिशत ताजा उपज ही कोल्ड चेन सुविधाओं के दायरे में आती है।
अत्यधिक गर्मी और बेमौसम बारिश कटाई के बाद के नुकसान को और बढ़ा देती है। उदाहरण के तौर पर, 2024 की भीषण गर्मी में दिल्ली की आजादपुर मंडी में आम एक ही दिन में खराब हो गए, जिससे व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
दूध उत्पादन में 2,661 करोड़ रुपये का नुकसान
जलवायु परिवर्तन का असर फसलों के साथ-साथ पशुधन पर भी पड़ रहा है। 'हीट स्ट्रेस' (भीषण गर्मी के दबाव) के कारण भारत में दूध उत्पादन में हर साल 18 लाख टन (लगभग 2%) की गिरावट आ रही है, जिससे 2,661 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है।
देश की 40 प्रतिशत पशुधन आबादी चरम मौसम के प्रति अत्यंत संवेदनशील है, जबकि 45 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि बाढ़ के गंभीर खतरे वाले क्षेत्रों में आती है। प्राकृतिक आपदाओं के कारण 20 लाख हेक्टेयर से अधिक (14 प्रतिशत बोया गया क्षेत्र) कृषि भूमि प्रभावित हुई है।
6 राज्यों में सूखा, सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है संकट
सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक डॉ. जीवी रामंजनयुलु के अनुसार, इस साल देश के छह राज्यों ने आधिकारिक रूप से सूखा घोषित किया है।
हालांकि, संकट केवल इन्हीं राज्यों तक सीमित नहीं है, क्योंकि एक ही राज्य के अलग-अलग जिलों और ब्लॉकों में स्थिति भिन्न हो सकती है।
इस सूखे का असर अब शहरों में भी महसूस किया जा रहा है। फसल बीमा में बढ़ती लागत और प्रीमियम के कारण राज्य सूखा घोषित करने से कतरा रहे हैं।
रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता इस्तेमाल
रिपोर्ट में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग पर चिंता व्यक्त की गई है। 1990 में प्रति हेक्टेयर 73.5 किलोग्राम रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल होता था, जो 2023 में बढ़कर 199 किलोग्राम (दोगुने से अधिक) हो गया।
- वायु प्रदूषण का असर: वायु प्रदूषण से नष्ट हुई फसलों से लगभग 9.4 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता था।
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कृषि का योगदान 13.7 प्रतिशत है, जिसमें पशुधन, धान की खेती और उर्वरक मुख्य कारण हैं।
संकट से निपटने के लिए प्रमुख सुझाव और रणनीतियां
विशेषज्ञों और रिपोर्ट के अनुसार, केवल शुरुआती मौसम चेतावनी देना काफी नहीं है, बल्कि समय पर जमीनी कार्रवाई आवश्यक है...
- टिकाऊ और जैविक खेती: रासायनिक उर्वरकों की सब्सिडी की तुलना में जैव उर्वरकों और जैविक खेती के लिए बुनियादी ढांचे व बाजार पहुंच में अधिक बजट दिया जाए।
- बीमा सुरक्षा का दायरा: फसल बीमा का विस्तार करके इसमें किरायेदार (बटाईदार) किसानों को भी शामिल किया जाए।
- सिंचाई और स्थानीय फसलें: अल नीनो वाले वर्षों में कम पानी वाली और सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा दिया जाए तथा पारंपरिक तालाबों का संरक्षण हो।
- ब्लॉक-स्तरीय चेतावनियां: ब्लॉक स्तर पर मौसम सलाह और सूखे की निगरानी के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित की जाए।
केवल राहत नहीं, जोखिम कम करने की जरूरत
भारत की खाद्य सुरक्षा अब केवल इस बात पर निर्भर नहीं है कि खेतों में कितना अनाज पैदा हुआ, बल्कि इस पर भी निर्भर है कि फसल मौसम की मार से कितनी बची। भारत को हर बार आपदा के बाद राहत देने के बजाय एक ऐसी कृषि प्रणाली का निर्माण करना होगा जो जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को सहन कर सके।
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