गैस चैंबर बनते शहरों का कैसे होगा सुधार? प्रदूषण नियंत्रण के बजट में 209 करोड़ की कटौती से पर्यावरणविद निराश
केंद्र सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण बजट में 209 करोड़ रुपये की कटौती की है, जिससे पर्यावरणविदों ने गहरी चिंता जताई ...और पढ़ें
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वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए मात्र 1,091 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है। प्रतीकात्मक तस्वीर

समय कम है?
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राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। दिल्ली समेत एनसीआर और देश भर में बढ़ते प्रदूषण तथा बिगड़ती वायु गुणवत्ता के बीच केंद्र सरकार द्वारा प्रदूषण नियंत्रण बजट में कटौती किए जाने पर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए मात्र 1,091 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है। यह आंकड़ा पिछले संशोधित बजट (2025-26) के 1,300 करोड़ रुपये की तुलना में 209 करोड़ रुपये कम है।
कई शहर 'गैस चैंबर' में तब्दील
हैरत की बात यह कि एक ओर जहां देश के कई शहर 'गैस चैंबर' में तब्दील हो रहे हैं, वहीं राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत मिलने वाली राशि में करीब 200 करोड़ रुपये की कटौती भी केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है। आंकड़ों का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि बजट में आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं हो पा रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने कहा 'दोहरी मार'
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति 'दोहरी मार' जैसी है। एक तरफ बजट में लगातार कमी की जा रही है, और दूसरी तरफ जो फंड उपलब्ध है, उसका उपयोग करने में सरकारी तंत्र पूरी तरह विफल साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार बजट में यह कटौती ऐसे समय में हुई है जब प्रदूषण से होने वाली बीमारियों और मौतों का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। एनसीएपी जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को अधिक सशक्त बनाने और फंडिंग बढ़ाने की जरूरत थी, लेकिन सरकार ने इसके विपरीत कदम उठाया है।
समग्र ध्यान दीर्घकालिक औद्योगिक बदलावों पर
सेंटर फाॅर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की कार्यकारी निदेशक अनुमिता राय चौधरी कहती हैं, 'प्रदूषण नियंत्रण' के लिए बजट आवंटन में कमी से सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के प्रति केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया की पर्याप्तता पर चिंताएं बढ़ गई हैं।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) 2.0 का दायरा बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन प्रत्यक्ष बजटीय निधि में समानुपातिक वृद्धि न होने और 16वें वित्त आयोग से अतिरिक्त अनुदान मिलने की अनिश्चित संभावना के कारण अल्पावधि में एनसीएपी के लिए अपर्याप्त निधिकरण हो सकता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि समग्र ध्यान दीर्घकालिक औद्योगिक बदलावों, ऊर्जा प्रणाली में परिवर्तन और क्षेत्रीय निधियों के वित्तीय अभिसरण पर केंद्रित है।
'प्रदूषण नियंत्रण' स्कीम में मामूली बढ़ोतरी
एनवायरोकैतलिस्ट के संस्थापक और मुख्य विश्लेषक सुनील दहिया ने कहा, केंद्रीय बजट 2026-27 यह साफ संकेत देता है कि प्रदूषण के मुख्य स्रोतों को नियंत्रित करना फिलहाल सरकार की प्राथमिकता नहीं रही है।
'प्रदूषण नियंत्रण' स्कीम में मामूली बढ़ोतरी जरूर दिखी है, लेकिन 82 ''नान-अटेनमेंट'' शहरों के लिए एनसीएपी का वास्तविक बजट पिछले साल के संशोधित अनुमानों से भी कम है। यह उस साल के लिए एक चिंताजनक रुझान है, जिसे एनसीएपी के लक्ष्यों के लिहाज से एक बड़ा पड़ाव माना जा रहा था।
जिसकी आज जरूरत वह धार नहीं दिखी
उन्होंने आगे कहा, 'उत्तर भारत के गंभीर क्षेत्रीय वायु संकट से निपटने के लिए किसी समर्पित कार्यक्रम की कमी और ईवी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विशेष बजट न होना, जिससे प्रदूषण के साथ-साथ तेल आयात पर निर्भरता भी कम होती, इस बजट की बहुत बड़ी चूक है।
ऐसे में अब हमारी पूरी उम्मीदें 16वें वित्त आयोग पर टिकी हैं। सच तो यह है कि पर्यावरण मंत्रालय को मिला मौजूदा केंद्रीय बजट इस 'एयर क्वालिटी इमरजेंसी' से निपटने के लिए बेअसर है और वह 'धार' भी नहीं दिखती जिसकी आज जरूरत है।'
