खतरे में पृथ्वी : सात 'प्लैनेटरी बाउंड्री' पार, अब अनजान संकट के मुहाने पर खड़ी दुनिया
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की 'स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026' रिपोर्ट के अनुसार, मानव हस्तक्षेप से नौ में से ...और पढ़ें

मानव हस्तक्षेप के कारण पृथ्वी की जीवन रक्षक प्रणालियां यानी 'प्लैनेटरी बाउंड्री' तेजी से ध्वस्त हो रही हैं।

समय कम है?
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संजीव गुप्ता, नीमली (अलवर)। सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की ''स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026'' रिपोर्ट के अनुसार, मानव हस्तक्षेप के कारण पृथ्वी की जीवन रक्षक प्रणालियां यानी ''प्लैनेटरी बाउंड्री'' तेजी से ध्वस्त हो रही हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कुल नौ प्रणालियों में से सात अब अपनी सुरक्षित सीमा को पार कर चुकी हैं।
यह रिपोर्ट बुधवार को नीमली स्थित अनिल अग्रवाल एनवायरमेंट ट्रेनिंग इंस्टीटयूट में तीन दिवसीय ''अनिल अग्रवाल डायलाग 2026'' के उदघाटन सत्र सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश दीपक गुप्ता, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण के पूर्व सचिव अशोक लवासा और सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण द्वारा संयुक्त रूप से जारी की गई। इस दौरान सीएसई के अध्यक्ष राज लिब्रान, रिचर्ड महापात्रा और सुपर्णो बनर्जी भी उपस्थित रहे।
खतरे की घंटी : 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार
रिपोर्ट जारी करते हुए सुनीता नारायण ने चेतावनी दी कि जलवायु संकट अब ''प्वाइंट आफ नो रिटर्न'' (वापसी की गुंजाइश नहीं) पर पहुंच गया है। उन्होंने कहा, 'पिछले तीन वर्षों के औसत को देखें तो दुनिया पहली बार 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर गई है। यह एक संकेत है कि हमने सुरक्षा की अंतिम दीवार को भी तोड़ दिया है।'
सात प्रणालियां ''डेंजर जोन' में
सीएसई के विशेषज्ञ रिचर्ड महापात्रा के अनुसार, नौ ''प्लैनेटरी बाउंड्री'' हमें बताती हैं कि इंसानों ने पृथ्वी को कितना नुकसान पहुंचाया है। 2024 तक छह प्रणालियां—जलवायु परिवर्तन, जैवमंडल अखंडता, भूमि प्रणाली परिवर्तन, ताजे पानी का परिवर्तन, जैव-भू-रासायनिक प्रवाह और नए रसायनों का परिचय—खतरे के निशान से बाहर थीं। अब 2025-26 में ''महासागर अम्लीकरण'' सातवीं ऐसी प्रणाली बन गई है जिसने सुरक्षित सीमा को पार कर लिया है।
रिपोर्ट की मुख्य चिंताएं
- महासागर : औद्योगिक युग की शुरुआत से अब तक समुद्री सतह की अम्लता में 30-40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे कोरल रीफ और समुद्री जीवों के अस्तित्व पर संकट है।
- वन : वैश्विक वन क्षेत्र घटकर 59 प्रतिशत रह गया है जबकि सुरक्षित स्तर 75 प्रतिशत होना चाहिए।
- जैव विविधता : प्रजातियों के विलुप्त होने की दर सुरक्षित सीमा (10 प्रति दस लाख प्रजाति वर्ष) से बढ़कर 100 से अधिक हो गई है।
भविष्य की अनिश्चितता
सुनीता नारायण ने जोर देकर कहा कि 2025 के साथ ही दुनिया एक ''अनजान युग'' में प्रवेश कर चुकी है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव उम्मीद से कहीं पहले और अधिक विनाशकारी रूप में सामने आ रहे हैं। जस्टिस गुप्ता ने सख्त लहजे में कहा 'खराब पर्यावरण कभी अच्छी अर्थव्यवस्था नहीं हो सकता। यदि पर्यावरण सही नहीं है तो कोई भी आर्थिक तर्क उसे उचित नहीं ठहरा सकता। व्यापार और अर्थव्यवस्था में अंतर है। अर्थव्यवस्था व्यापक राष्ट्रीय हित से जुड़ी होती है।' वहीं लवासा का कहना था कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी योजनाएं तभी कारगर हो सकती हैं, जब केंद्र एवं राज्य सरकार उन्हें अपने एजेंडे में प्राथमिकता से शामिल करें।
