भारत की जलवायु बदल रही, मराठवाड़ा-विंध्य में बढ़ी गर्मी; कहीं बढ़ रहा सूखा तो कहीं भारी बारिश का अनुमान
IMD के 70 साल के अध्ययन से पता चला है कि देश की जलवायु बदल रही है, जिसमें मराठवाड़ा व ...और पढ़ें

आईएमडी के विज्ञानियों के करीब 70 साल के मौसम रिकाॅर्ड पर आधारित अध्ययन में चिंताजनक बदलाव सामने आया है। एआई इमेज
HighLights
मराठवाड़ा, पश्चिमी विदर्भ अधिक गर्म और शुष्क हुए।
कोंकण, गोवा, तटीय कर्नाटक में वर्षा क्षेत्र बढ़ा।
उत्तरी मैदानी इलाकों में वर्षा घटने का रुझान।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। देश की जलवायु धीरे-धीरे अपना मिजाज बदल रही है। कहीं गर्मी और सूखे का खतरा बढ़ रहा है, तो कहीं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों का दायरा फैल रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के विज्ञानियों के करीब 70 साल के मौसम रिकाॅर्ड पर आधारित अध्ययन में यह बदलाव सामने आया है।
वर्षा घटने का रुझान भी दर्ज किया गया
अध्ययन के अनुसार, पिछले तीन दशकों में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और पश्चिमी विदर्भ का बड़ा हिस्सा अधिक गर्म और शुष्क जलवायु क्षेत्र में बदल गया है। वहीं, कोंकण और गोवा से लेकर तटीय कर्नाटक और केरल तक अधिक वर्षा वाले जलवायु क्षेत्र का विस्तार हुआ है। अध्ययन में उत्तरी मैदानी इलाकों में वर्षा घटने का रुझान भी दर्ज किया गया है।
दिल्ली और एनसीआर के लिए भी अहम है यह बदलाव
दिल्ली सहित एनसीआर जैसे उत्तरी मैदानी क्षेत्र के लिए जलवायु में हो रहे ये बदलाव महत्वपूर्ण हैं। अध्ययन में उत्तरी मैदानों में वर्षा में कमी का रुझान सामने आया है। हालांकि, इसमें दिल्ली और एनसीआर के लिए अलग से कोई निष्कर्ष या आंकड़ा नहीं दिया गया है।
फिर भी यह अध्ययन इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि जलवायु में बदलाव को केवल तापमान बढ़ने या किसी एक मौसम में वर्षा कम होने तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
लंबे समय में तापमान और वर्षा के बदलते स्वरूप का असर पानी की उपलब्धता, खेती और संसाधनों की योजना पर पड़ सकता है।
70 साल के आंकड़ों से समझा जलवायु का बदलता मिजाज
आइएमडी और पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने 1951 से 2020 तक के तापमान और वर्षा के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसके लिए 30-30 साल की अवधियों के आधार पर देश के जलवायु क्षेत्रों के नक्शों की तुलना की गई।
अध्ययन के मुताबिक, 1961-1990 के दौरान मराठवाड़ा और पश्चिमी विदर्भ के ज्यादातर हिस्से गर्म जलवायु और लंबे शुष्क मौसम वाले क्षेत्र में आते थे, लेकिन 1991-2020 तक ये इलाके अधिक गर्म और कम वर्षा वाले अर्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्र में पहुंच गए।
मैदानी इलाकों में वर्षा घटने का रुझान
विज्ञानियों ने इस बदलाव के पीछे दिन और रात, दोनों के तापमान में बढ़ोतरी को प्रमुख कारण बताया है। इसके उलट, पश्चिमी तट पर अधिक वर्षा वाले उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु क्षेत्र का विस्तार हुआ है। अध्ययन में दक्षिण भारत में वर्षा बढ़ने और उत्तरी मैदानी इलाकों में घटने का रुझान सामने आया है।
खेती और पानी की योजना पर पड़ेगा असर
विज्ञानियों के मुताबिक, जलवायु क्षेत्र बदलने का असर इस बात पर भी पड़ता है कि किसी इलाके में कौन-सी फसल उपयुक्त होगी और उसकी बुवाई का सही समय क्या होना चाहिए। इसलिए खेती और जल प्रबंधन की दीर्घकालिक योजनाओं में इन बदलावों को शामिल करना जरूरी है।
और गंभीर हो सकता है मानसून का असर
अध्ययन की प्रमुख लेखिका और आईएमडी पुणे की वैज्ञानिक अनन्या कर्मकार ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र में इस साल पड़ा सूखा अल नीनो के कारण था। अध्ययन किसी एक मौसम की स्थिति का विश्लेषण नहीं करता, बल्कि यह दिखाता है कि संबंधित क्षेत्रों की जलवायु पहले की तुलना में बदल चुकी है। ऐसे में कमजोर मानसून का असर और गंभीर हो सकता है।
जल प्रबंधन की रणनीति तैयार की जाए
यह अध्ययन आईएमडी की सहकर्मी-समीक्षित पत्रिका 'मौसम' के अक्टूबर 2026 के अंक में प्रकाशित हुआ है। विज्ञानियों का जोर है कि जलवायु क्षेत्रों में हो रहे बदलावों की लगातार निगरानी की जाए और उनके अनुरूप कृषि तथा जल प्रबंधन की रणनीति तैयार की जाए।
