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'Sumo didi' हेतल दवे को क्यों छोड़ना पड़ा खेल? भारत की पहली और इकलौती महिला सुमो पहलवान ने बताया दर्द

Published: Thu, 29 Oct 2026 05:50 PM (IST)

Sumo Didi: भारत की पहली और एकमात्र महिला सूमो पहलवान हेतल दवे को पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण चार ...और पढ़ें

भारत की पहली और इकलौती महिला सूमो पहलवान एवं पेशेवर सुमो कुश्ती में सर्वोच्च रैंक योकोजुना सम्मानित हेतल दवे। फाइल फोटो

भारत की पहली और इकलौती महिला सूमो पहलवान एवं पेशेवर सुमो कुश्ती में सर्वोच्च रैंक योकोजुना सम्मानित हेतल दवे। फाइल फोटो

HighLights

  1. हेतल दवे भारत की पहली और एकमात्र महिला सूमो पहलवान।

  2. प्रायोजन व समर्थन की कमी से चार टूर्नामेंट बाद संन्यास।

  3. उनकी बायोपिक 'सूमो दीदी' ओटीटी पर युवाओं का ध्यान खींच रही।

नीरज तिवारी, नई दिल्ली। 'काश, सूमो जैसे खेल को भारत में भी जापान व अन्य देशों की तरह समर्थन मिलता तो मेरा सफर कुछ और रहता। मुझे मात्र चार टूर्नामेंट के बाद रिटायरमेंट न लेना पड़ता। मैं चाहती हूं कि इस खेल को बढ़ावा मिले, इसके लिए मैं काफी कुछ करना चाहती हूं। बस, वैसा माहौल तो मिले...' यह कहना है भारत की पहली और इकलौती महिला सूमो पहलवान एवं पेशेवर सुमो कुश्ती में सर्वोच्च रैंक योकोजुना सम्मानित हेतल दवे का। इन दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उनके जीवन पर बनाई गई बायोपिक 'सूमो दीदी' युवाओं का ध्यान खींच रही है। 

'फेडरेशन पर्याप्त मदद नहीं कर पाता'

'दैनिक जागरण' से मोबाइल पर हुई बातचीत में मुंबई में रहने वालीं हेतल दवे ने कहा कि उन्हें स्पांसरशिप आदि के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। यही कारण है कि साल 2008 में शुरू किया गया सूमो पहलवानी का सफर वर्ष 2012 में ही छोड़ना पड़ा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारतीय सूमो फेडरेशन ने उनकी मदद तो की, लेकिन वह उतनी पर्याप्त नहीं थी कि खेल को जारी रख सकें। 

जूडो से शुरू किया जीवन, फिर सूमो को अपनाया

अपने जीवन के बारे में उन्होंने बताया कि पांच साल की उम्र में ही जूडो खेलना शुरू किया। पिता सुधीर दवे और माता अल्का दवे ने उनकी बहुत मदद की। कुछ समय बाद उनसे तीन साल छोटे भाई अक्षय दवे ने भी उनकी भरपूर मदद की।

आगे चलकर उन्होंने जूडो में इंडिया को रिप्रजेंट किया। कई अवार्ड से भी सम्मानित की गईं। मगर साल 2008 में उनके जीवन में कुछ ऐसा बदलाव हुआ कि उनकी सोच ही बदल गई। वह सूमो खेल में भविष्य बनाने का सपना पिरोने लगीं। 

साइबर कैफे में बैठ मैच देखतीं और चालें लिखतीं

हेतल के अनुसार, जूडो को छोड़कर सूमो में करियर बनाने का ख्वाब देखना जितना आसान था, उतना ही मुश्किल था उसे साकार करना। घरवालों को अपना फैसला बताने के बाद सभी ने उनका सहयोग किया, लेकिन सबसे बड़ी परेशानी थी कि वह सूमो खेल की बारीकियां कैसे सीखें?

इसका जवाब देते हुए वह कहती हैं कि उस समय साइबर कैफे में जाकर सूमो के रिकॉर्डेड मैच देखती थी। हर मैच में मिलने वाली सीख को शब्दों में पिरोकर डायरी में नोट करती थीं। फिर घर पर आकर मां-पिता और भाई की मदद से उस सीन का अभ्यास करती थी।

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फिल्म की एक्ट्रेस श्रीयम भगनानी के साथ हेतल दवे। 

पिता-माता और भाई को बनाती प्रतिद्वंद्वी रेसलर

उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि भारत में ट्रेनिंग के लिए कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं मिलता था। ऐसे में अपने भाई अक्षय के साथ ही कई पुरुष खिलाड़ियों के साथ अभ्यास करना पड़ता। दूसरा, उस समय भारत में सूमो रिंग ही नहीं था। ऐसे में उसकी नकल बनाकर खुले में अभ्यास करना पड़ा।

खैर, इन चुनौतियों को पार करते हुए एक समय ऐसा भी आया कि पहले सूमो टूर्नामेंट में शामिल होने के लिए स्पांसरशिप की तलाश शुरू करनी पड़ी। वह बताती हैं कि मुंबई स्थित फेडरेशन ने उनका नाम तो रेकमेंड कर दिया। वीजा भी आ गया, लेकिन इस्टोनिया में होने वाले उस मैच में जाने के लिए उनके पास रुपया नहीं था। 

'मेरे कॅरियर में प्रिंट मीडिया का बड़ा सहयोग रहा'

अपने संघर्ष के बारे में बात करते हुए हेतल कहती हैं, 'उस दौरान स्पांसरशिप की आस में सुबह से लेकर शाम तक अलग-अलग लोगों से मिलती। कोई भी सीधे मना नहीं करता था। घंटों ऑफिस में बैठाए रखने के बाद शाम ढलते ही मिलने से मना कर देते। धीरे-धीरे मन टूटने लगा। फिर ऐसा भी समय आया जब फ्लाइट पकड़ने के लिए मात्र दो दिन ही शेष रह गए।'

इसके आगे वह कहती हैं, 'मुझे स्पांसरशिप न मिलने की समस्या को एक अखबार ने छापा। अगले दिन मुझे अखबार के दफ्तर से ही फोन आया कि स्पांसरशिप मिल गया है। इस तरह मेरी सूमो पहलवान बनने की पहली यात्रा वर्ष 2008 में शुरू हुई।' वह कहती हैं कि मेरे कॅरियर में प्रिंट मीडिया का बड़ा सहयोग रहा है।

विश्व की शीर्ष 8 खिलाड़ियों में हुईं शामिल

अपने कॅरियर के बारे में बताते हुए हेतल कहती हैं कि शुरुआती मैच में मुझे जूडो की खिलाड़ी होने का भरपूर लाभ मिला, क्योंकि दोनों ही खेलों में कुछ बातें कॉमन हैं। फिर भी सूमो की तकनीकी बारीकियों को न जानने के कारण उन्हें उतनी सफलता नहीं मिली, जितनी की उम्मीद थी। फिर देखते ही देखते आने वाले वर्षों में मुझे पोलैंड, चीन के ताइपेई में खेलने का अवसर मिला। इन तीनों ही टूर्नाटमेंट में वह विश्व की शीर्ष 8 खिलाड़ियों में शामिल हुईं।

प्रोफेशनल प्रशिक्षण की अखरती थी कमी

हालांकि, हेतल यह भी कहती हैं कि सूमो खेल की प्रोफेशनल ट्रेनिंग न मिलने के कारण उनका संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा था, लेकिन तीसरे टूर्नामेंट में ही उन्हें एक गुरू मिल गया। बकौल दवे ताइपेई में जापान से आए सूमो खिलाड़ियों के दल में शामिल एक शख्स की उन पर नजर पड़ी। वह उन्हें हर मैच में देखता था। वह जानता था कि लड़की अकेले ही संघर्ष कर रही है। उसने सारा प्रयास तो कर लिया है, लेकिन खेल संबंधी कुछ तकनीकी बारीकियों को न सीख पाने के कारण वह बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही है।

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परिवार के साथ खुशी से बिता रहीं जीवन। सौ. सोशल मीडिया 

'मुझे उस शख्स ने सूमो की बारीकियां सिखाईं'

हेतल बताती हैं, 'इसके बाद उस इंसान ने उन्हें सूमो खेल का वह गुर सिखाया, जो मेरे प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए जरूरी था। टूर्नाटमेंट के आयोजन तक वह निरंतर उनसे सबक लेती रहीं। फिर भारत आकर कड़ा अभ्यास कर उस तकनीकियों को आत्मसात कर लिया।'

फिर साल 2012 में उन्हें चीन के ताइपेई में ही फिर से खेलने का अवसर मिला, लेकिन एक बड़ी समस्या थी। सूमो की भारत में कम लोकप्रियता को देखते हुए स्पांसरशिप मिल ही नहीं पा रहा था। बहुत प्रयास किया। कई जगहों से निराश होकर मन टूटने लगा। 

'मुझे परेशान देख पिता ने भेजा चीन'

सूमो की पूर्व खिलाड़ी ने बताया, 'मुझे परेशान देख पिताजी ने अपनी बचत की रकम से मुझे चीन भेजा। प्रशिक्षण ने अच्छा परिणाम दिलाया और मेरी विश्व रैंकिंग इस बार पांचवीं दर्ज की गई। यह बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन अपर्याप्त साधनों और स्पांसरशिप पाने की जद्दोजहद ने मन तोड़ दिया। इस तरह मुझे न चाहते हुए भी इस खेल को हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा।' 

'मैं देश के लिए कुछ करना चाहती हूं, बशर्ते मौका तो मिले'

आज हेतल दवे फेसबुक फ्रेंड से पति बने सुजीत शर्मा के साथ मुंबई में ही रहकर विभिन्न स्कूलों में छात्रों को कुश्ती और जूडो का प्रशिक्षण देती हैं। हालांकि, वह इसकी भी राह देख रही हैं कि कभी भारत में सूमो जैसे महान खेल को वैसी लोकप्रियता मिल सकेगी, जिसकी वह हकदार है। वह चाहती हैं कि अपने अनुभव और फेडरेशन के सहयोग से वह देश के लिए कुछ करें, बशर्ते उन्हें एक मौका तो दिया जाए। इसी उम्मीद के साथ वह अनेक हुनर लिए हुए आज भी एक नौकरी का इंतजार कर रही हैं

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