DTC का अपना बस बेड़ा हुआ खत्म, 4038 नंबर की आखिरी बस ने पूरी की सेवा; अब निजी कंपनियों पर निर्भरता
दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के स्वामित्व वाली आखिरी बस ने अपनी सेवा अवधि पूरी कर ली है, जिसके बाद निगम के पास अब अपनी कोई बस नहीं बची है।

डीटीसी के अपने बेड़े की अंतिम सीएनजी बस को दी गई विदाई। सौजन्य:सुधी पाठक
HighLights
डीटीसी की आखिरी स्वामित्व वाली बस ने सेवा पूरी की।
दिल्ली की बस सेवा अब निजी कंपनियों पर पूरी तरह निर्भर।
2010 राष्ट्रमंडल खेलों में डीटीसी बसों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। दिल्ली परिवहन निगम के अपने स्वामित्व वाली आखिरी बस मंगलवार को सड़कों से बाहर हो गई। राजघाट डिपो-1 से चल रही डीटीसी की बस संख्या 4038 ने मंगलवार को अपनी निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर ली। इसके साथ ही डीटीसी के पास अब यात्रियों को सेवा देने के लिए अपनी एक भी बस नहीं बची है। यानी दिल्ली की सड़कों पर डीटीसी की बस सेवा अब पूरी तरह निजी कंपनियों के माध्यम से संचालित बसों पर निर्भर हो गई है।
निगम के स्वामित्व वाली बसों का दौर खत्म
वर्तमान व्यवस्था में करीब 17 कंपनियों के माध्यम से बसों का संचालन किया जा रहा है। इनमें लगभग 5088 विद्युत बसें और करीब 1700 सीएनजी बसें शामिल हैं। ये बसें निजी कंपनियों के माध्यम से उपलब्ध कराई और संचालित की जा रही हैं। निगम के स्वामित्व वाला बस बेड़ा खत्म हो चुका है।
डीटीसी के लाल रंग की वातानुकूलित नीचे तल वाली बसें दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। वर्ष 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों से पहले बड़ी संख्या में नई बसें दिल्ली की सड़कों पर उतारी गई थीं। इन बसों में वातानुकूलित और गैर-वातानुकूलित दोनों श्रेणियां थीं।
कब-कब डीटीसी बसों का बढ़ती गई संख्या
2008-09 में डीटीसी ने 2500 बसें खरीदी थीं, जिनमें 1000 वातानुकूलित और 1500 गैर-वातानुकूलित थीं। इसके बाद 625 और बसें खरीदी गईं। इस तरह उस दौर में कुल 3125 बसें खरीदी गई थीं। अन्य अध्ययनों में वर्ष 2007 से 2011 के बीच डीटीसी में 3700 नीचे तल वाली सीएनजी बसें शामिल हुई थीं। इनमें करीब एक तिहाई वातानुकूलित थीं।
कई यात्राओं की गवाह बनी यह लाल बस
इन लाल रंग की वातानुकूलित बसों ने राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान विदेशी खिलाड़ियों, अधिकारियों, पत्रकारों और आम यात्रियों को आधुनिक सार्वजनिक परिवहन की सुविधा दी थी। उस समय इन बसों को दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन में बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया था। खेलों के दौरान करीब 600 बसों को विशेष रूप से खेलों की ड्यूटी में लगाया गया था।
